बिलासपुर (मनीष जायसवाल)। इस साल जून के महीने में बारिश की ज्यादातर भविष्यवाणियां फेल हो गईं। मौसम विभाग के अनुमान कई जगह बादलों तक ही सिमट गए। कुछ ऐसा ही हाल छत्तीसगढ़ की राजनीति का भी रहा। पूरे महीने मंत्रिमंडल में बड़े फेरबदल की चर्चाएं होती रहीं। गुजरात मॉडल के उदाहरण दिए गए, इस्तीफों की बातें हुई, विभाग बदलने की खबरें उड़ती रहीं, लेकिन महीना खत्म होने को है और राजनीतिक आसमान अब भी वैसा का वैसा ही है..। अब वही बादल जुलाई की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। चर्चा है कि 13 से 17 जुलाई के मानसून सत्र के बाद, 18 जुलाई से सरकार और संगठन दोनों में बड़ा फेरबदल हो सकता है..। देखा जाए तो राजनीति में ऐसी चर्चाएं यूं ही नहीं उठती..। पत्रकार अक्सर पूरी तस्वीर नहीं बनाता, कुछ रेखाएं खींच देता है। बाकी तस्वीर वक्त खुद सामने ले आता है।

मंत्रिमंडल से ज्यादा चर्चा इस समय सरकार की छवि की है। विपक्ष जितना दबाव नहीं बना पा रहा, उससे ज्यादा सरकार अपनी ही चूकों और यू टर्न से घिरती दिख रही है…। बालोद जिले की जमूरी से लेकर हाल ही में डॉ रमन सिंह के चर्चित बयान के बाद की सफाई और बिजली की आंख-मिचौली और बढ़े हुए बिल लोगों को चुभ रहे हैं। खाद की कमी किसानों की चिंता बढ़ा रही है। बीते दो हफ्तों में स्कूलों में गर्मी और उमस ने पालकों और शिक्षकों की नाराजगी भी बढ़ाई। सरकार में अफसरशाही के हावी होने की चर्चा और मंत्रियों के लगातार दिल्ली दौरे यह संदेश दे रहे हैं कि सरकार मैदान से ज्यादा गलियारों में व्यस्त है..। सरकार के खाते में कई उपलब्धियां भी हैं और कई फैसलों का सकारात्मक असर दिखाई देता है। इन उपलब्धियों के बावजूद पिछले कुछ महीनों में विवाद और प्रशासनिक फैसले ज्यादा चर्चा में रहे हैं। सरकार की पहचान अब फैसलों से कम, सफाइयों से ज्यादा जुड़ती दिखाई देने लगी है।

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सबसे ज्यादा धुआं स्कूल शिक्षा विभाग से उठ रहा है। जिला शिक्षा अधिकारी और विकासखंड शिक्षा अधिकारियों के तबादलों ने ऐसा जाल बुन दिया कि विभाग भी अपने आदेशों का हिसाब नहीं दे पा रहा। कई मामले हाईकोर्ट पहुंच चुके हैं। अदालत सवाल पूछ रही है और सरकार जवाब तलाश रही है। ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं सुनाई दे रही हैं। कई तरह के तंज भी लगाए जा रहे हैं, लेकिन ऐसी चर्चाओं का राजनीतिक असर जरूर दिखाई दे रहा है।

अब निगाहें जुलाई के दूसरे पखवाड़े पर हैं। अगर राजनीतिक बादल इस बार सचमुच बरसते हैं तो चर्चा सिर्फ बदले हुए चेहरों की नहीं होगी, वह उन कारणों की भी होगी जिनकी वजह से बदलाव की जरूरत महसूस हुई। सरकार को बने अभी ढाई साल ही हुए हैं और एंटी-इन्कम्बेंसी की फुसफुसाहट शुरू हो चुकी है..। राजनीति में मौसम बदलने से पहले उसके संकेत दिखाई देने लगते हैं। जुलाई का महीना भी ऐसे ही संकेतों के बीच खड़ा है। अब देखना यह है कि जून की तरह बादल केवल गुजर जाते हैं, या इस बार प्रदेश की राजनीति में सचमुच मौसम बदलता है।

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