Independance Day 2026/हर साल 15 अगस्त की सुबह जब सूरज की पहली किरणें दिल्ली के आसमान को छूती हैं, तो पूरा देश अपनी नजरें पुरानी दिल्ली स्थित लाल किले की प्राचीर पर टिका देता है। तिरंगे का लहराना, प्रधानमंत्री का देश के नाम संबोधन और सेना की औपचारिक सलामी—यह दृश्य हर भारतीय के दिल में गर्व और जोश भर देता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत की आजादी के इस सबसे भव्य और गौरवशाली समारोह के लिए आखिर लाल किले को ही क्यों चुना गया?

यह चुनाव महज इत्तेफाक नहीं था, बल्कि इसके पीछे सदियों पुराना इतिहास, सत्ता का संघर्ष और राष्ट्रीय स्वाभिमान की एक लंबी गाथा छिपी है। लाल किला केवल एक इमारत नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता के हस्तांतरण का सबसे बड़ा जीवंत गवाह है।

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लाल किले की कहानी मुगल बादशाह शाहजहां से शुरू होती है, जिन्होंने 1639 में अपनी नई राजधानी शाहजहानाबाद के केंद्र के रूप में इसे बनवाया था। लगभग एक दशक में बनकर तैयार हुआ यह किला यमुना के किनारे मुगल सत्ता का सबसे शक्तिशाली केंद्र बना। इसकी विशाल लाल बलुआ पत्थर की दीवारें न केवल स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना थीं, बल्कि वे इस बात का प्रतीक थीं कि जो दिल्ली के इस किले पर काबिज है, वही पूरे देश पर शासन कर रहा है। यूनेस्को के अनुसार, लाल किला सदियों तक सत्ता का सर्वोच्च केंद्र रहा और बाद में यही स्थान ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष का केंद्र बिंदु भी बना।

लाल किले का महत्व 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान और अधिक बढ़ गया। जब भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया, तो उन्होंने अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को अपना प्रतीकात्मक नेता चुना। यह विद्रोह भले ही दबा दिया गया, लेकिन इसने लाल किले को भारतीय अस्मिता और विदेशी शासन के खिलाफ प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया।

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अंग्रेजों ने भी इसकी अहमियत को समझा और विद्रोह के बाद बहादुर शाह जफर को यहीं से गिरफ्तार किया और किले पर अपना सैन्य कब्जा जमा लिया। अंग्रेजों के लिए भी लाल किला उनकी जीत का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया था।

15 अगस्त 1947 को जब भारत को लंबी गुलामी के बाद आजादी मिली, तो देश को एक ऐसे मंच की तलाश थी जो न केवल सत्ता के बदलाव को दिखाए, बल्कि करोड़ों भारतीयों के स्वाभिमान का प्रतिनिधित्व करे। लाल किला इसके लिए सबसे उपयुक्त स्थान था क्योंकि सदियों से इसे ‘दिल्ली की सत्ता’ का पर्याय माना जाता था। हालांकि, एक दिलचस्प ऐतिहासिक तथ्य यह है कि लाल किले से प्रधानमंत्री द्वारा ध्वजारोहण की यह परंपरा 15 अगस्त को नहीं, बल्कि 16 अगस्त 1947 को शुरू हुई थी।

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प्रेस सूचना ब्यूरो के रिकॉर्ड के अनुसार, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 16 अगस्त की सुबह पहली बार इस ऐतिहासिक प्राचीर से तिरंगा फहराकर स्वतंत्र भारत का शंखनाद किया था।

आज जब प्रधानमंत्री लाल किले से तिरंगा फहराते हैं, तो वह दुनिया को एक शक्तिशाली संदेश देते हैं। जिस स्थान से कभी राजा और सम्राट अपनी प्रजा पर हुकूमत करते थे, आज उसी स्थान से एक लोकतांत्रिक राष्ट्र का प्रधान सेवक जनता से संवाद करता है। यह इस बात का प्रतीक है कि अब सत्ता किसी राजघराने या साम्राज्य की नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत की जनता और उसके संविधान की है। 2007 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल होने वाला यह किला आज भारत की ऐतिहासिक विरासत और आधुनिक लोकतंत्र के बीच एक मजबूत सेतु का काम करता है।

स्वतंत्रता दिवस के इस समारोह का सबसे खास हिस्सा प्रधानमंत्री का संबोधन होता है।

लाल किले की प्राचीर से दिया गया यह भाषण देश के कोने-कोने तक पहुंचता है, जिसमें न केवल सरकार की उपलब्धियां और भावी योजनाएं होती हैं, बल्कि उन अनगिनत बलिदानों की याद भी होती है जिनकी बदौलत हमें यह आजादी मिली। यही वजह है कि 15 अगस्त की सुबह जब लाल किले पर तिरंगा लहराता है, तो वह सदियों के इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम की यादों और एक विकसित भारत के संकल्प को अपने भीतर समेटे होता है।