बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों बच्चों के पोषण और सेहत को लेकर बिलासपुर हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने ‘प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना’ (मिड-डे मील) की गुणवत्ता, स्वच्छता और पारदर्शिता को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को अहम निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने विशेष रूप से बच्चों को दिए जाने वाले पोषक आहार ‘मिलेट चिक्की’ के वितरण को लेकर सवाल उठाए और पूछा कि इस योजना का लाभ प्रदेश के सभी जिलों के बच्चों को क्यों नहीं मिल रहा है।

अदालत की सख्ती के बाद मुख्य सचिव द्वारा प्रस्तुत शपथ पत्र में राज्य सरकार की आगामी कार्ययोजना का विवरण दिया गया है। सरकार ने बताया कि वर्ष 2026-27 के लिए मिड-डे मील योजना को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए 783.92 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट आवंटित किया गया है।

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इस योजना के तहत प्रदेश के 56,254 स्कूलों के लगभग 27.15 लाख विद्यार्थियों को साल में 240 दिनों तक पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जाएगा। साथ ही, भोजन पकाने की व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए 93,420 रसोइया-सह-सहायकों की नियुक्ति और 16,062 स्कूलों में पुराने रसोई उपकरणों को बदलने का निर्णय लिया गया है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार से तीखा सवाल किया कि आखिर पोषण बढ़ाने वाली 20 ग्राम ‘मिलेट चिक्की’ का वितरण केवल 7 जिलों (जशपुर, रायगढ़ और नियद नेल्लानार योजना वाले 5 जिले) तक ही क्यों सीमित रखा गया है?

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न्यायमित्र की इस आपत्ति पर कि प्रदेश के बाकी जिलों के बच्चे इस पोषण से वंचित हैं, राज्य शासन के अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण दास ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि सरकार शेष जिलों में भी मिलेट चिक्की वितरण की संभावनाओं पर विचार करेगी और जल्द ही इस संबंध में आवश्यक निर्देश प्राप्त किए जाएंगे।

भोजन की स्वच्छता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने कई आधुनिक कदम उठाने का भी दावा किया है। रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, सरगुजा और धमतरी जैसे बड़े शहरों के 786 स्कूलों में एनजीओ के माध्यम से ‘सेंट्रलाइज्ड किचन सिस्टम’ चलाया जा रहा है, जिसका अब और विस्तार किया जाएगा। इसके अलावा, स्कूलों में पारंपरिक चूल्हों की जगह एलपीजी गैस कनेक्शन और स्टोव दिए जाएंगे, ताकि खाना सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण में बन सके।

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भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए अब ‘डिजिटल राशन आवंटन’ प्रणाली लागू की जाएगी और कूपन व्यवस्था को पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा। पीएम पोषण पोर्टल पर ब्लॉक-वार प्रदर्शन को सार्वजनिक किया जाएगा ताकि आम जनता भी इसकी निगरानी कर सके।

साथ ही, स्थानीय स्तर पर रोजगार को बढ़ावा देने के लिए सब्जियों और मसालों की आपूर्ति की जिम्मेदारी महिला स्व-सहायता समूहों को सौंपी जाएगी। हाई कोर्ट ने इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए अगली सुनवाई 12 अक्टूबर 2026 के लिए तय की है, जिसमें सरकार को शेष जिलों में पोषक आहार विस्तार पर अपना पक्ष रखना होगा।