बिलासपुर (मनीष जायसवाल)। जिस विभाग के स्कूलों में बच्चों को अर्थशास्त्र में आय-व्यय और राजनीति शास्त्र में सत्ता के खेल पढ़ाए जाते हैं, आज वही स्कूल शिक्षा विभाग शिक्षक पदोन्नति के मामले में अपनी ही किताबों के सामने खड़ा दिखाई दे रहा है…। टीईटी को पदोन्नति से जोड़ने के बाद शिक्षकों के बीच दो पलड़े बन गए हैं। एक तरफ टीईटी पास शिक्षक हैं, जो अपनी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ने का इंतजार कर रहे हैं। दूसरी तरफ ऐसे वरिष्ठ शिक्षक हैं, जिनके पास लंबी सेवा, अनुभव और पुरानी वरिष्ठता है, लेकिन टीईटी की शर्त उनके आगे दीवार बनकर खड़ी हो गई है। विभाग ने दोनों पक्षों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। अब असली परीक्षा सिर्फ शिक्षक नीति की नहीं, सरकार के आर्थिक गणित की भी है। इसलिए मामला सिर्फ यह नहीं है कि किसे पदोन्नति मिलेगी। असली हिसाब तो यह है कि पदोन्नति के बाद सरकार के खजाने पर कितना अतिरिक्त भार आएगा।

इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए 2015 में नियुक्त किसी सहायक शिक्षक का मूल वेतन 28,500 रुपये है। पदोन्नति के बाद मूल वेतन 35,400 रुपये हो जाता है। यानी मूल वेतन में 6,900 रुपये की बढ़ोतरी। 58 प्रतिशत डीए के हिसाब से पहले 16,530 रुपये और बाद में 20,532 रुपये। 7 प्रतिशत एचआरए जोड़ने पर पहले कुल वेतन करीब 47,025 रुपये और पदोन्नति के बाद 58,410 रुपये बैठता है। यानी एक शिक्षक पर करीब 11,385 रुपये महीना अतिरिक्त..। अब यही गणित तीन हजार सहायक शिक्षकों पर लगाया जाए तो अंतर करीब 3 करोड़ 41 लाख 55 हजार रुपये हर महीने बैठता है। साल का आंकड़ा करीब 41 करोड़ रुपये हो जाता है..। इसी तरह किसी शिक्षक का मूल वेतन पदोन्नति से पहले 39,900 रुपये और बाद में 44,100 रुपये मानें तो मूल वेतन में 4,200 रुपये का अंतर आता है…। 58 प्रतिशत डीए और 7 प्रतिशत एचआरए जोड़ने पर पहले कुल वेतन करीब 65,835 रुपये और बाद में 72,765 रुपये होता है। यानी करीब 6,930 रुपये महीना अतिरिक्त..। ऐसे दो हजार शिक्षकों पर यह अंतर करीब एक करोड़ 38 लाख 60 हजार रुपये महीना और साल में करीब 16 करोड़ 63 लाख रुपये बैठता है। दोनों उदाहरणों को साथ रखें तो तीन हजार सहायक शिक्षकों और दो हजार शिक्षकों की पदोन्नति से वेतन में करीब चार करोड़ 81 लाख रुपये महीने का अंतर बनता है। साल में यह आंकड़ा करीब 57 करोड़ 75 लाख रुपये तक पहुंच सकता है..।

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यह सरकारी खर्च का वास्तविक आंकड़ा नहीं, समझने के लिए बनाया गया उदाहरण है। असली खर्च कितने शिक्षक पदोन्नत होते हैं, उनका मौजूदा वेतन कितना है और पदोन्नति के बाद वेतन किस तरह तय होता है, इस पर निर्भर करेगा। लंबे समय से सेवा में रहे शिक्षक पहले से ही वेतन क्रम में आगे है। ऐसे में पदोन्नति के बाद ऐसे शिक्षकों के वेतन में ज्यादा अंतर नहीं आएगा…। किसी को एक-दो इंक्रीमेंट के बाद ही अगला वेतन स्तर मिल सकता है…। इसलिए पदोन्नति का खर्च भी नए शिक्षकों के जैसा नहीं होगा। कुल मिला कर जिसकी सेवा जितनी कम होगी, उस पर वित्तीय भार उतना अधिक हो सकता है और जिसकी सेवा जितनी ज्यादा होगी, उस पर वित्तीय भार उतना कम आएगा..! यही पदोन्नति का आर्थिक गणित है। यहीं से टीईटी की पूरी बहस की दूसरी तस्वीर सामने आती है। शिक्षकों का कहना है कि टीईटी पास शिक्षक को उसकी योग्यता का लाभ मिलना चाहिए, इसमें कोई दो राय नही..। लेकिन किसी पुराने शिक्षक की सेवा और वरिष्ठता को एक झटके में पीछे कर देना भी इतना सीधा मामला नहीं है। बीच का रास्ता निकाला जा सकता है। दिक्कत यह है कि स्कूल शिक्षा विभाग शिक्षक पदोन्नति के गणित से ज्यादा ट्रांसफर, पोस्टिंग और अंदरूनी खींचतान में उलझा दिख रहा है..!

स्कूल में शिक्षक बच्चों को व्यष्टि और समष्टि अर्थशास्त्र पढ़ा रहे हैं, मगर विभाग अपने ही फैसले में इसका हिसाब भूलता दिख रहा है..। राजनीति शास्त्र में बच्चे सत्ता के समीकरण पढ़ते हैं और शिक्षक अब उन्हीं समीकरणों को अपने विभाग में देख रहे हैं। टीईटी ने दो पलड़े बना दिए हैं और दोनों तरफ की नाराजगी सरकार तक पहुंच रही है। सत्ता के समर्थकों के बीच यह चर्चा भी है कि स्कूल शिक्षा मंत्री पहली बार विधायक और मंत्री बने हैं, ऐसे में विभाग के जानकार अफसरों की टीम उन्हें लगातार गुमराह कर रही है..। कुछ लोगों का मानना है कि मंत्री तक विभाग की पूरी तस्वीर उसी तरह नहीं पहुंच रही, जैसी जमीनी स्तर पर दिखाई दे रही है। अगर ऐसा है तो ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर शिक्षक पदोन्नति तक के फैसलों का राजनीतिक नुकसान मंत्री को उठाना पड़ सकता है। सत्ता के समर्थक भी अब चिंता जाहिर करते हुए यह बात कह रहे हैं कि वित्त विभाग और खजाने का हिसाब रखने वाली सरकार में पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी जैसे वित्त मंत्री हैं।

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ऐसे में किसी विभाग में हजारों पदोन्नतियों का आर्थिक असर बिना पूरे हिसाब के तय होता दिखाई दे तो यह समझना जरूरी है कि आखिर विभाग किस गणित पर चल रहा है….। ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर विभाग की नीतियों तक अगर किसी अफसरों की लॉबी का असर बढ़ता दिखाई दे तो उसका सीधा असर मंत्री की छवि पर पड़ सकता है। शिक्षक पदोन्नति का फैसला सरकार के लिए सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश नहीं है..। इसके साथ हर महीने निकलने वाला वेतन और साल भर का बढ़ता खर्च जुड़ा है। दूसरी तरफ हजारों शिक्षकों और शिक्षक संगठनों की नाराजगी का राजनीतिक असर भी सरकार को देखना होगा। शिक्षाकर्मियों का इतिहास रहा है कि उन्हें लंबे समय तक नजरअंदाज करना सरकारों के लिए भारी पड़ा है..! शिक्षक सड़क पर आते हैं तो बात स्कूल से निकलकर राजनीति तक पहुंचती है। इसलिए टीईटी, वरिष्ठता और पदोन्नति के बीच सरकार को ऐसा रास्ता निकालना होगा जिसमें योग्यता भी बचे, सेवा का सम्मान भी रहे और खजाने का गणित भी बिगड़े नहीं।

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