बिलासपुर… बिलासपुर के प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी रामेश्वर जायसवाल की नियुक्ति को लेकर चल रहा विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। जिस नियुक्ति पर हाई कोर्ट ने अंतरिम रोक लगाई थी, अब उसी मामले में अदालत ने वरिष्ठता के आधार पर प्रभारी पद पर दावा करने के सवाल को साफ कर दिया है। अदालत ने कहा कि सिर्फ वरिष्ठता किसी अधिकारी को प्रभारी पद पाने का कानूनी अधिकार नहीं देती। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका वापस लेने का आग्रह किया, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही जायसवाल के प्रभारी डीईओ के रूप में काम करने का रास्ता साफ हो गया।

कनिष्ठ को प्रभार देने पर उठे थे सवाल

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स्कूल शिक्षा विभाग ने 10 जून 2026 को प्राचार्य रामेश्वर जायसवाल को बिलासपुर का प्रभारी डीईओ नियुक्त किया था। नियुक्ति के बाद यह मामला विवाद में आ गया। प्राचार्य राघवेंद्र गौराहा और कामेश्वर बैरागी ने अधिवक्ता जितेंद्र पाली के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि बिलासपुर जिले में 100 से अधिक ऐसे प्राचार्य हैं, जो रामेश्वर जायसवाल से 18 वर्ष या उससे अधिक वरिष्ठ हैं। इसके बावजूद अपेक्षाकृत कनिष्ठ प्राचार्य को जिले के सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा प्रशासनिक पद का प्रभार सौंप दिया गया।

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याचिका में शासन के पुराने सर्कुलर का हवाला देते हुए यह भी सवाल उठाया गया कि यदि कनिष्ठ अधिकारी को प्रभारी डीईओ बनाया जाता है तो उसके अधीन वरिष्ठ अधिकारियों की गोपनीय चरित्रावली लिखे जाने जैसी प्रशासनिक स्थिति पैदा हो सकती है।

पहले हाई कोर्ट ने लगा दी थी रोक

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इस चुनौती पर प्रारंभिक सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने 10 जून के नियुक्ति आदेश के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी थी। उस समय अदालत के समक्ष मुख्य सवाल यही था कि वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में कनिष्ठ अधिकारी को प्रभारी डीईओ बनाने का निर्णय शासन के नियमों और पूर्व परिपत्रों के अनुरूप है या नहीं। नियुक्ति पर रोक की खबर जुलाई में सामने आई थी।

इसके बाद मामला अगली सुनवाई तक पहुंचा और याचिकाकर्ताओं तथा शासन का पक्ष अदालत के सामने आया।

अदालत ने वरिष्ठता के दावे पर खींची लकीर

सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रभारी पद को स्थायी पदोन्नति अथवा नियमित नियुक्ति से अलग प्रशासनिक व्यवस्था माना। अदालत का रुख यह रहा कि जब तक किसी नियम में वरिष्ठता को अनिवार्य आधार नहीं बनाया गया है, केवल वरिष्ठ होने के आधार पर कोई अधिकारी प्रभारी पद पर नियुक्ति का अधिकार नहीं मांग सकता।

अदालत ने पूर्व के एक मामले का संदर्भ देते हुए भी प्रशासनिक प्रभार के फैसले में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा पर सवाल उठाया। यही बिंदु इस मामले में अहम साबित हुआ।

याचिका वापस, रास्ता साफ

सुनवाई के दौरान जब अदालत ने याचिका पर अपना रुख स्पष्ट किया तो याचिकाकर्ताओं ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। अदालत ने आग्रह स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही पहले लगाई गई अंतरिम रोक का आधार भी समाप्त हो गया और रामेश्वर जायसवाल के प्रभारी डीईओ के रूप में काम जारी रखने का रास्ता खुल गया।

इस घटनाक्रम से शिक्षा विभाग में पिछले करीब दो माह से चल रही वरिष्ठता बनाम प्रशासनिक अधिकार की बहस को भी फिलहाल विराम मिल गया है।

सवाल नियुक्ति से ज्यादा प्रशासनिक अधिकार का

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाद सिर्फ एक अधिकारी को डीईओ का प्रभार देने तक सीमित नहीं रहा। इसके केंद्र में यह सवाल आ गया कि क्या किसी वरिष्ठ अधिकारी को केवल वरिष्ठता के आधार पर प्रभारी पद पर नियुक्ति का अधिकार हासिल हो जाता है?

हाई कोर्ट की सुनवाई से फिलहाल इसका जवाब स्पष्ट नजर आता है—सिर्फ वरिष्ठता अपने आप में प्रभारी पद का कानूनी अधिकार नहीं बनाती। हालांकि विस्तृत लिखित आदेश सामने आने के बाद अदालत की टिप्पणी और उसके कानूनी आधार की तस्वीर पूरी तरह साफ होगी।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद फिलहाल रामेश्वर जायसवाल के बिलासपुर डीईओ के रूप में प्रभार पर छाया कानूनी संकट टल गया है। अब निगाहें विस्तृत आदेश और शिक्षा विभाग की आगामी प्रशासनिक कार्रवाई पर रहेंगी।