बिलासपुर…. जिला शिक्षा विभाग में युक्तियुक्तकरण और पदोन्नति की प्रक्रिया को लेकर आई जांच रिपोर्ट ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय से हासिल रिपोर्ट में तीन सदस्यीय जांच दल ने दस्तावेजों की जांच के बाद शिकायतों को सही प्रतीत माना है। रिपोर्ट में नियमों की अनदेखी, सक्षम समितियों के फैसलों के बाद मामलों को दोबारा खोलने, स्वतः निरस्त हो चुके पदोन्नति आदेशों में संशोधन और वरिष्ठता सूची व काउंसलिंग की प्रक्रिया को दरकिनार करने जैसे तथ्य दर्ज हैं।

मामला अब राजनीतिक रूप से भी गरमा गया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता अंकित गौरहा ने पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है। गौरहा के मुताबिक उन्होंने मामले की शिकायत कलेक्टर, केंद्रीय मंत्री, संभागीय आयुक्त, संयुक्त संचालक शिक्षा और सचिव स्तर तक की है। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में भी शिकायत दर्ज कराई गई और लगातार कार्रवाई की मांग की जाती रही।

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समिति ने खारिज किया.. डीईओ ने फिर कैसे खोला ?

जांच रिपोर्ट में संतोषी शर्मा, वंदना लहरे और जानकी चेलके के युक्तियुक्तकरण मामलों का उल्लेख है। रिपोर्ट के अनुसार इनके अभ्यावेदनों को जिला युक्तियुक्तकरण समिति और संभागीय युक्तियुक्तकरण समिति ने परीक्षण के बाद अमान्य कर दिया था। इसके बाद तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे ने पुनर्विचार अभ्यावेदन के नाम पर इन मामलों को फिर स्वीकार किया।

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जांच दल ने लिखा है कि इसके लिए किसी नए वैधानिक आधार या जिला युक्तियुक्तकरण समिति की मंजूरी का दस्तावेज नहीं मिला। यहां तक कि रिपोर्ट में संबंधित उच्च न्यायालय के मामलों का भी उल्लेख किया गया, लेकिन दस्तावेजों की जांच में किसी न्यायालय के पुनर्विचार आदेश के मिलने से इनकार किया गया है।

यानी सीधा सवाल है—जिस मामले को सक्षम समितियां खारिज कर चुकी थीं, उसे दोबारा खोलने का आधार क्या था?

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 11 महीने बाद आदेश में संशोधन

पदोन्नति के मूल आदेश में साफ लिखा था कि नई पदस्थापना पर 10 दिन के भीतर कार्यभार ग्रहण नहीं करने पर पदोन्नति आदेश स्वतः निरस्त माना जाएगा।

जांच रिपोर्ट के मुताबिक दिनेश कुमार तंबोली, रमेश सिंह उईके, हरिपाल सिंह पैंकरा, दिलेश कुमार धृतलहरे और पुरुषोत्तम सिंह निखर ने तय समय में कार्यभार ग्रहण नहीं किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके बावजूद तत्कालीन डीईओ विजय टांडे ने 21 नवंबर 2025 को आवेदन और 25 नवंबर 2025 को संशोधित आदेश जारी कर इन शिक्षकों को उनके मूल विकासखंड कोटा में पदस्थापना दे दी। जांच दल ने इसे पूर्णतः अवैध माना है।

रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि इन शिक्षकों के पदोन्नति आदेश 27 दिसंबर 2024 के थे और 10 दिन में कार्यभार नहीं लेने की शर्त उसमें स्पष्ट थी। बहरहाल जिस आदेश की वैधता ही 10 दिन बाद खत्म हो चुकी थी, उसमें करीब 11 महीने बाद बदलाव कैसे हुआ—यह जांच का सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

 नियम से हटकर संशोधन का लाभ देने का आरोप

जांच रिपोर्ट में हलधर प्रसाद साहू, रमेश कुमार साहू, शिप्रा बघेल, सूरज कुमार सोनी और ज्ञानचंद पांडे के पदोन्नति आदेशों में संशोधन का भी उल्लेख है। शिकायत में आरोप था कि तत्कालीन डीईओ विजय टांडे ने इन मामलों में भारी लेन-देन कर नियम विरुद्ध संशोधन किए। जांच रिपोर्ट ने संबंधित दस्तावेजों की जांच के बाद इन शिकायतों को गंभीरता से लिया और अनियमितता की उच्चस्तरीय जांच की जरूरत बताई।

3 साल पुरानी प्रतीक्षा सूची से पदोन्नति, वरिष्ठता पीछे

वर्ष 2026 की पदोन्नति प्रक्रिया भी जांच के घेरे में है। रिपोर्ट के अनुसार टंकेश्वर कुमार जगत, फूलेश्वर सिंह, ईश्वरी ध्रुव, हेमलता पटेल और आस्था गौराहा को तीन वर्ष पुरानी प्रतीक्षा सूची के आधार पर पदोन्नति दी गई।

शिकायत में आरोप था कि इस प्रक्रिया में विभागीय पदोन्नति समिति की मंजूरी और काउंसलिंग का पालन नहीं हुआ। रिपोर्ट में वरिष्ठता सूची का भी उल्लेख है। इसमें देवी नारायण पटेल 163वें, चमेली साहू 164वें, शत्रुहन कुमार जांगड़े 168वें और भानू केशरी 169वें क्रम पर थे। इसके बाद 20 मार्च 2026 को ईश्वरी ध्रुव, आस्था गौराहा, फूलेश्वर सिंह और टंकेश्वर कुमार जगत को पदोन्नति आदेश जारी किए गए।

जांच दल ने माना कि इससे यह सवाल उठता है कि वरिष्ठता सूची और निर्धारित प्रक्रिया के रहते कुछ नामों को ही लाभ कैसे मिला।

शहर और आसपास के स्कूलों में पदस्थापना

जांच रिपोर्ट में एक और गंभीर बात सामने आई है। लोक शिक्षण संचालनालय के निर्देशों के विपरीत कुछ शिक्षकों को बिना काउंसलिंग शहर और आसपास के सुविधाजनक स्कूलों में पदस्थापना देने की बात दर्ज है।

रिपोर्ट के अनुसार जिन स्कूलों में पदस्थापना होनी थी, उनमें शिक्षक विहीन, एकल शिक्षक अथवा आवश्यकता के अनुसार अधिक दर्ज संख्या वाले स्कूलों को प्राथमिकता दी जानी थी। लेकिन शिकायत में आरोप है कि इस व्यवस्था को दरकिनार कर मनचाही जगह पदस्थापना दी गई।

 सवालों के घेरे में बाबू की भूमिका

पूरे मामले में विधि शाखा प्रभारी सुनील यादव की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। शिकायत में उनके द्वारा संबंधित प्रकरणों की नोटशीट और प्रक्रिया में भूमिका निभाने का आरोप है। शुरुआती शिकायत में विजय टांडे और सुनील यादव पर मिलकर भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाया गया था।

अंकित गौरहा का कहना है कि सुनील यादव के खिलाफ पहले भी एक मामले में सजा हो चुकी है, लेकिन इसके बावजूद उनके खिलाफ शासन स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। गौरहा का कहना है कि मौजूदा मामले में भी उनकी भूमिका की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यदि जिम्मेदारी सामने आती है तो कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

जांच दल की निष्पक्षता पर उठाए सवाल

मामले की जांच तीन सदस्यीय दल ने की। इसमें शासकीय हाईस्कूल बिरकोना के प्राचार्य कामेश्वर बैरागी, शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय धमनी-नगोई के प्राचार्य सवीश कुमार कश्यप और बिल्हा विकासखंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय की एबीईओ दीप्ति गुप्ता शामिल थीं। जांच 20 से 28 अगस्त 2026 के बीच दस्तावेजों के परीक्षण के आधार पर हुई।

शिकायतकर्ताओं ने जांच दल की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि युक्तियुक्तकरण की शुरुआती प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों को ही बाद में उसी प्रक्रिया की गड़बड़ियों की जांच देना हितों के टकराव का सवाल खड़ा करता है।

हालांकि महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्हीं तीन अधिकारियों की जांच रिपोर्ट में शिकायतों के कई बिंदुओं को सही माना गया और उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए अभिमत दिया गया।

जांच रिपोर्ट.. गड़बड़ी हुई, कुछ शिक्षकों को लाभ मिला

जांच दल ने अपने निष्कर्ष में कहा है कि शिकायतकर्ताओं द्वारा दिए गए दस्तावेजों और जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय से प्राप्त दस्तावेजों के परीक्षण से युक्तियुक्तकरण और पदोन्नति प्रक्रिया में गड़बड़ी सामने आती है। रिपोर्ट में उच्च कार्यालयों के निर्देशों की अनदेखी और कुछ विशेष शिक्षकों को लाभ पहुंचाने की बात भी दर्ज है।

रिपोर्ट में तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे पर युक्तियुक्तकरण में उच्च कार्यालय के निर्देशों और नियमों की अनदेखी तथा पदोन्नति में कार्यभार ग्रहण अवधि और वरिष्ठता क्रम का पालन किए बिना आदेश जारी करने की बात कही गई है। अंत में जांच दल ने उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए अभिमत प्रस्तुत किया है।

अंकित गौरहा बोले— कागजी कार्रवाई नहीं

अंकित गौरहा ने कहा कि यह मामला केवल कुछ शिक्षकों की पदोन्नति या पदस्थापना का नहीं है। यह सवाल है कि क्या अधिकारी सक्षम समितियों के फैसले को अपनी मर्जी से बदल सकते हैं? क्या स्वतः निरस्त आदेशों को महीनों बाद फिर जीवित किया जा सकता है? क्या वरिष्ठता और काउंसलिंग को दरकिनार कर पसंद की जगह पदस्थापना दी जा सकती है?

गौरहा ने कहा कि उन्होंने इस मामले को लेकर लगातार आवाज उठाई है। कलेक्टर, केंद्रीय मंत्री, संभागीय आयुक्त, संयुक्त संचालक शिक्षा और सचिव स्तर तक शिकायत की गई है। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में भी शिकायत दर्ज कराई गई। अब जांच रिपोर्ट सामने आ चुकी है, इसलिए सरकार को जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय कर कार्रवाई करनी चाहिए।

विभाग की मौजूदा व्यवस्था पर हमला

गौरहा ने जिला शिक्षा विभाग की मौजूदा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप है कि लगातार अधिकारियों के बदलने से विभाग में प्रशासनिक अस्थिरता बनी हुई है। रामेश्वर जैसवाल के हटने के बाद अजय कौशिक के सेवानिवृत्त होने, विजय टांडे और अनिल तिवारी के हटने के बाद स्थिति और बिगड़ी है।

उन्होंने प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी वर्षा दुबे की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। साथ ही करतला के बीईओ संदीप पांडे को शासन के औपचारिक आदेश से पहले ही बिलासपुर डीईओ बनाए जाने की चर्चा पर भी सवाल खड़े किए।

गौरहा का आरोप है कि जिला शिक्षा विभाग में नियमों की जगह मनमानी हो रही है।

अब निगाह शासन पर—रिपोर्ट के बाद क्या होगा?

31 अगस्त की रिपोर्ट ने कई सवालों के जवाब देने के बजाय अब कार्रवाई का रास्ता शासन के सामने खोल दिया है। जांच दल ने दस्तावेजों के आधार पर अनियमितताओं को चिन्हित किया है और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जरूरत बताई है।

अब सवाल यह है कि निरस्त आदेशों को दोबारा किस आधार पर बदला गया, वरिष्ठता के बावजूद कुछ नाम आगे कैसे पहुंचे, काउंसलिंग के बिना सुविधाजनक स्कूलों में पदस्थापना कैसे हुई और इन फैसलों के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है?