मुंगेली..सरकारी संपत्ति के इस्तेमाल को लेकर नियम-कायदे भले ही स्पष्ट हों, लेकिन मुंगेली खनिज विभाग की सरकारी गाड़ी को लेकर सामने आई तस्वीरें और स्थानीय स्तर पर मिल रही शिकायतें कई गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। आरोप है कि खनिज अधिकारी योगेश साहू के ड्राइवर राकेश दुबे सरकारी वाहन सीजी 10 एयू 0149 को निजी उपयोग में लेकर रतनपुर क्षेत्र के भैंसामुड़ा स्थित अपने घर तक ले जाते हैं। स्थानीय सूत्रों का दावा है कि वाहन आए दिन सुबह और शाम उनके घर के सामने खड़ा नजर आता है। इसकी तस्वीर भी सामने आई है।

 निजी ठिकाना, सरकारी वाहन का रोज आना-जाना?

रतनपुर, मुंगेली से करीब 50-60 किलोमीटर दूर है। सवाल यह है कि खनिज विभाग का सरकारी वाहन इतनी दूरी पर ड्राइवर के घर तक नियमित रूप से क्यों पहुंचता है? आरोप है कि राकेश दुबे अक्सर वाहन अपने घर ले जाते हैं और छुट्टी अथवा अवकाश के दिनों में भी सरकारी वाहन उनके पास रहने की बात सामने आ रही है। यदि यह सही है तो वाहन के निजी इस्तेमाल, ईंधन खर्च और सरकारी संसाधन के उपयोग का हिसाब जांच के दायरे में आना चाहिए।

निजी सफर को कागजों में ‘सरकारी दौरा’

मामला केवल वाहन को घर ले जाने तक सीमित नहीं बताया जा रहा। सूत्रों का आरोप है कि मुंगेली से भैंसामुड़ा तक आने-जाने की दूरी को सरकारी दौरे के रूप में दर्ज कराने की व्यवस्था भी कथित रूप से की जाती है। इसमें अधिकारी की सहमति अथवा सहयोग की बात भी सामने आ रही है। हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।

ऐसे में वाहन की लॉगबुक, जीपीएस रिकॉर्ड, ड्यूटी चार्ट, टूर आदेश, ईंधन पर्चियां और अवकाश रिकॉर्ड की जांच बेहद अहम हो जाती है। इन दस्तावेजों से यह साफ हो सकता है कि वाहन कब, कहां और किस सरकारी कार्य के लिए चला तथा वास्तविक दूरी कितनी तय हुई।

ड्राइवर ही कर रहा खनिज मामलों की फील्ड कार्रवाई?

सूत्रों के मुताबिक राकेश दुबे की भूमिका वाहन चलाने तक सीमित नहीं होने की भी चर्चा है। आरोप है कि वे स्वयं खनिज संबंधी जांच और कार्रवाई के लिए फील्ड में जाते हैं और ठेकेदारों तथा अन्य संबंधित लोगों के बीच उनका कथित दबदबा है। कुछ लोगों के बीच उनके रवैये को लेकर असहजता और दबाव की चर्चा भी सामने आ रही है। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

साहब-ड्राइवर की जुगलबंदी’ भी चर्चा में

पूरे मामले में खनिज अधिकारी योगेश साहू और ड्राइवर राकेश दुबे के बीच कथित नजदीकी और ‘जुगलबंदी’ की चर्चा भी स्थानीय स्तर पर है। आरोपों के मुताबिक सरकारी वाहन के नियमित निजी इस्तेमाल से लेकर कथित सरकारी दौरे के रिकॉर्ड तक, कई सवाल इसी रिश्ते के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं। यदि दोनों पक्षों के बीच कोई वैध प्रशासनिक अनुमति या विभागीय व्यवस्था है तो उसे भी जांच में सामने आना चाहिए।

अब कलेक्टर की जांच से साफ होगा सच

सरकारी वाहन किसी अधिकारी या कर्मचारी की निजी सुविधा के लिए है या सरकारी कामकाज के लिए, इसका जवाब दस्तावेजों से मिल सकता है। इसलिए जिला प्रशासन यदि इस मामले की जांच करता है तो वाहन की लॉगबुक से लेकर जीपीएस, ईंधन खपत, टूर डायरी, ड्यूटी चार्ट और अवकाश अवधि के रिकॉर्ड की जांच करनी होगी। साथ ही भैंसामुड़ा स्थित घर के सामने वाहन के नियमित खड़े होने की तस्वीर और इसकी तारीखों का भी मिलान किया जा सकता है।

फिलहाल तस्वीर में सरकारी वाहन ड्राइवर के भैंसामुड़ा स्थित घर के सामने नजर आ रहा है। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या यह महज संयोग है या सरकारी वाहन के कथित निजी इस्तेमाल की नियमित व्यवस्था? जिला प्रशासन की जांच ही इन आरोपों की वास्तविकता सामने ला सकती है।