Cg news ।छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राज्य पुनर्गठन के बाद परस्पर तबादले के जरिए छत्तीसगढ़ आए लोक निर्माण विभाग (PWD) के कार्यपालन अभियंता बृजेश कुमार पटोरिया को बड़ी राहत दी है। जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की सिंगल बेंच ने वर्षों पुरानी वरिष्ठता में बदलाव कर उन्हें पदावनत करने के राज्य सरकार के फैसले को रद्द कर दिया है।

कोर्ट ने कहा कि जब अधिकारी ने किसी धोखाधड़ी या गलत जानकारी के आधार पर पदोन्नति हासिल नहीं की थी, तो विभाग की प्रशासनिक गलती का खामियाजा वर्षों बाद अधिकारी को नहीं भुगताया जा सकता।

मामले के अनुसार बृजेश कुमार पटोरिया की नियुक्ति वर्ष 1993 में अविभाजित मध्य प्रदेश के लोक निर्माण विभाग में उप अभियंता के पद पर हुई थी। राज्य पुनर्गठन के समय वे जगदलपुर में पदस्थ थे। वर्ष 2002 में अंतिम कैडर आवंटन में उन्हें मध्य प्रदेश संवर्ग मिला।

उन्होंने इस आवंटन को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। इसी दौरान केंद्र सरकार की नीति के तहत वर्ष 2005 में मलय कुमार श्रीवास्तव के साथ परस्पर सहमति के आधार पर उनका छत्तीसगढ़ संवर्ग में तबादला हुआ।

छत्तीसगढ़ आने के बाद विभाग ने पटोरिया की पूर्व सेवा को ध्यान में रखते हुए उनकी वरिष्ठता निर्धारित की। इसी वरिष्ठता के आधार पर उन्हें वर्ष 2007 में सहायक अभियंता और सितंबर 2008 में कार्यपालन अभियंता के पद पर पदोन्नति दी गई। लंबे समय तक विभाग ने इसी वरिष्ठता और पदोन्नति व्यवस्था को लागू रखा।

वर्ष 2013 और 2015 में एक अन्य अधिकारी की आपत्ति के बाद मामले ने नया मोड़ लिया।

राज्य सरकार ने वर्ष 2005 के परिपत्र के नियम 9 का हवाला देते हुए माना कि परस्पर तबादले के जरिए किसी संवर्ग में आने वाले कर्मचारियों को संबंधित संवर्ग में नियुक्ति के वर्ष के आधार पर वरिष्ठता सूची में सबसे नीचे रखा जाना चाहिए।

इसके बाद 9 दिसंबर 2015 को पटोरिया की वरिष्ठता सूची संशोधित कर दी गई। फिर 15 जुलाई 2016 को पुनरीक्षण पदोन्नति समिति (DPC) की बैठक में उनकी सहायक अभियंता पद पर पदोन्नति को वर्ष 2003 के बजाय वर्ष 2008 से माना गया।

वरिष्ठता में इस बदलाव का असर उनकी कार्यपालन अभियंता पद की पदोन्नति पर पड़ा और उन्हें पदावनत कर दिया गया।

इस फैसले के खिलाफ बृजेश कुमार पटोरिया ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने अपनी वरिष्ठता या पदोन्नति हासिल करने के लिए कोई गलत तथ्य प्रस्तुत नहीं किया था। उनके खिलाफ धोखाधड़ी का भी कोई मामला नहीं था।

कोर्ट ने माना कि विभाग ने स्वयं उनकी वरिष्ठता निर्धारित की थी और उसी के आधार पर कई वर्षों तक उन्हें पदोन्नति का लाभ दिया गया। ऐसी स्थिति में लंबे समय बाद विभागीय स्तर पर अपनी व्यवस्था को बदलकर अधिकारी से पहले से प्राप्त वरिष्ठता और पद छीनना उचित नहीं माना जा सकता।

हाई कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि जिस अधिकारी की आपत्ति के आधार पर वरिष्ठता में बदलाव किया गया था, वह अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। ऐसे में पटोरिया को पदावनत करने से कोई व्यावहारिक उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

कोर्ट ने 9 दिसंबर 2015 को वरिष्ठता संशोधन और 15 जुलाई 2016 को पुनरीक्षण DPC से जुड़े संबंधित आदेशों को रद्द कर दिया। साथ ही याचिकाकर्ता की पूर्व वरिष्ठता और उसके आधार पर प्राप्त पदोन्नति की स्थिति बहाल करने का निर्देश दिया है।

हाई कोर्ट के इस फैसले से वर्षों बाद वरिष्ठता में बदलाव के कारण पदावनत किए गए PWD अधिकारी को राहत मिली है।