CG Education News/सूरजपुर  (मनीष जायसवाल) । छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल के इस वर्ष जारी 10वीं और 12वीं बोर्ड परिणामों ने एक तरफ जहां प्रदेश की शैक्षणिक स्थिति की झलक दी है, वहीं कुछ जरूरी सवाल भी खड़े किए हैं। इस साल 12वीं में 83.04% और 10वीं में 77.15% विद्यार्थी पास हुए हैं, जो पिछले साल की तुलना में बेहतर परिणाम है।

खास बात यह रही कि दोनों ही कक्षाओं में लड़कियों ने लड़कों से अच्छा प्रदर्शन किया। 12वीं में लड़कियों का पास प्रतिशत 86.4% और लड़कों का 78.8% रहा, जबकि 10वीं में लड़कियां 81% और लड़के 72% के साथ पीछे रहे।

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इससे समझ आता है कि 22 जनवरी 2015 में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान शुरू किया गया था उसकी जमीनी हकीकत के रूप में प्रदेश की बेटियां लगातार बेहतर कर रही हैं और शिक्षा के प्रति उनकी गंभीरता बढ़ी है।

लेकिन इन आंकड़ों से आगे बढ़कर सोचने की जरूरत है। हर साल की तरह इस बार भी जहां-जहां परिणाम कमजोर रहे, वहां सबसे पहले सवाल शिक्षकों पर उठने लगे। बैठकों का दौर, नोटिस और जवाब-तलब की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, मानो पूरी व्यवस्था की कमी का कारण केवल शिक्षक ही हों। यह सोच आसान जरूर है, लेकिन पूरी सच्चाई नहीं बताती।

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सच्चाई यह है कि शिक्षा केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं होती। शिक्षक अपने तय समय और सीमित संसाधनों में पढ़ाते हैं, लेकिन छात्र का असली विकास घर और समाज के माहौल में भी होता है। 10वीं तक कई बच्चे किसी तरह पढ़ाई से जुड़े रहते हैं, लेकिन 11वीं-12वीं में पढ़ाई कठिन हो जाती है, प्रतिस्पर्धा बढ़ती है और आत्म अनुशासन जरूरी हो जाता है। ऐसे में अगर परिवार का सहयोग और मार्गदर्शन कम हो जाए, तो इसका असर सीधे परिणाम पर पड़ता है। लेकिन इन बातों पर चर्चा कम होती है, क्योंकि इनके लिए जिम्मेदारी तय करना आसान नहीं होता।

यह भी समझना जरूरी है कि शिक्षक बनने के लिए खुद कठिन परीक्षाओं और चयन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। फिर भी केवल परीक्षा परिणाम के आधार पर उनकी क्षमता पर सवाल उठाना न केवल गलत है, बल्कि उनके मनोबल को भी कमजोर करता है। कई शिक्षक ऐसे विद्यार्थियों को पढ़ा रहे होते हैं, जिनकी उपस्थिति नियमित नहीं होती, जिनके पास पढ़ाई के साधन कम होते हैं या जो पारिवारिक और आर्थिक दबाव में होते हैं।

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दरअसल समस्या यह है कि जिम्मेदारी सबकी है, लेकिन जवाबदेही सिर्फ शिक्षक पर डाल दी जाती है। प्रशासन के लिए शिक्षक पर कार्रवाई करना आसान होता है, इसलिए समीक्षा भी उसी तक सीमित रह जाती है। लेकिन जब तक अभिभावकों की भूमिका, सामाजिक परिस्थितियों और संसाधनों की कमी जैसे मुद्दों को बराबर महत्व नहीं दिया जाएगा, तब तक केवल शिक्षकों पर दबाव डालकर बेहतर परिणाम की उम्मीद करना सही नहीं होगा।

जरूरत इस बात की है कि शिक्षा को एक साझा जिम्मेदारी माना जाए, जहां शिक्षक, अभिभावक और प्रशासन तीनों मिलकर काम करें। तभी परिणामों में वास्तविक और स्थाई सुधार संभव है। सर्व शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप पाण्डेय ने भी यही बात कही है कि परीक्षा परिणाम अंत नहीं, बल्कि एक पड़ाव है।

अगर परिणाम उम्मीद के अनुसार नहीं आए हैं, तो बच्चों पर दबाव डालने के बजाय उनकी कमियों को समझकर आगे की योजना बनानी चाहिए। शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए सभी पक्षों की भूमिका उतनी ही जरूरी है, केवल शिक्षक को दोष देना समाधान नहीं है।