दिल्ली। देश भर के लाखों शिक्षकों के सिर पर मंडरा रहे नौकरी जाने के खतरे की गूंज अब संसद के उच्च सदन तक पहुंच गई है। मंगलवार को राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता का मुद्दा जोर-शोर से उठाया गया।

खास बात यह रही कि इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सुर एक जैसे नजर आए। भाजपा और कांग्रेस, दोनों दलों के सांसदों ने एक स्वर में सरकार से मांग की है कि दशकों से पढ़ा रहे शिक्षकों को इस उम्र में परीक्षा देने के तनाव से मुक्ति दिलाई जाए और उनकी नौकरी सुरक्षित करने के लिए बीच का रास्ता निकाला जाए।

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राज्यसभा में यह मामला उस वक्त गरमाया जब सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया आदेश पर चर्चा शुरू हुई, जिसके तहत 27 जुलाई 2011 से पहले नियुक्त कक्षा एक से आठवीं तक के सभी शिक्षकों को अपनी सेवा बरकरार रखने के लिए दो साल के भीतर टीईटी परीक्षा पास करना अनिवार्य कर दिया गया है। इस फैसले ने उन शिक्षकों की नींद उड़ा दी है जो पिछले 15-20 सालों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

सदन में कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने आंकड़ों के जरिए स्थिति की गंभीरता को बयां किया। उन्होंने सरकार को चेताया कि इस फैसले से देश भर के करीब 25 लाख शिक्षकों के भविष्य पर तलवार लटक गई है।

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उन्होंने बताया कि अकेले उत्तर प्रदेश में ही ऐसे शिक्षकों की संख्या लगभग दो लाख है, जिनकी स्थायी नौकरी पर अब अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। तिवारी ने कहा कि ये शिक्षक भारी असमंजस में हैं और सरकार को तत्काल दखल देकर उनके हितों की रक्षा करनी चाहिए।

Exemption from TET- 4 लाख शिक्षकों की नौकरी पर मंडराया संकट, सांसद ने शिक्षा मंत्री को पत्र लिखकर की TET से मुक्ति की मांग

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इससे पहले, भारतीय जनता पार्टी की सांसद सीमा द्विवेदी ने शून्यकाल में सबसे पहले इस संवेदनशील मुद्दे को उठाया। उन्होंने सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि सालों से स्कूलों में अध्यापन कार्य कर रहे शिक्षकों के लिए अचानक टीईटी पास करने की शर्त ने पूरी शिक्षा व्यवस्था और शिक्षक परिवारों में हड़कंप मचा दिया है।

न्होंने कहा कि यह शिक्षक भारी मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं, क्योंकि जीवन के इस पड़ाव पर परीक्षा की तैयारी करना उनके लिए बेहद कठिन है। सीमा द्विवेदी ने मांग की कि सरकार को इस पूरे मामले में लाखों शिक्षकों की मानवीय स्थिति को देखते हुए तत्काल जरूरी कदम उठाने चाहिए और उन्हें राहत देनी चाहिए।

सांसदों की इस चिंता से स्पष्ट है कि यह मुद्दा अब केवल कानूनी नहीं, बल्कि एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा बन चुका है, जिस पर सरकार को जल्द ही कोई नीतिगत फैसला लेना पड़ सकता है।

विपक्ष के उपनेता प्रमोद तिवारी ने पहले से कार्यरत शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य किए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए इसके समाधान की मांग की।

शून्यकाल के दौरान प्रमोद तिवारी ने केंद्र सरकार को बताया कि सक्षम न्यायालय के निर्णय के अनुसार, 1 सितंबर 2025 से कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों के लिए टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा, भले ही उनकी नियुक्ति किसी भी वर्ष में हुई हो।

उन्होंने बताया कि इस निर्णय से उत्तर प्रदेश के लगभग दो लाख और देशभर के लगभग पच्चीस लाख शिक्षक प्रभावित होंगे। यह स्थिति शिक्षकों में असमंजस, तनाव और सेवा को लेकर असुरक्षा की भावना पैदा कर रही है।

तिवारी के अनुसार, वर्षों से सेवा दे रहे अनुभवी शिक्षकों को अचानक सेवा से बाहर किए जाने की आशंका शिक्षा व्यवस्था की स्थिरता और बच्चों के सीखने के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है।

उन्होंने यह भी बताया कि टीईटी अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तिथियों से लागू हुआ है; उत्तर प्रदेश में यह 27 जुलाई 2011 से प्रभावी हुआ था।

न्यायालय के हालिया निर्णय के अनुसार, पुराने शिक्षकों को सेवा में बने रहने और पदोन्नति पाने के लिए दो वर्षों के भीतर टीईटी पास करना होगा। ऐसा न करने पर उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति का सामना करना पड़ेगा।

प्रमोद तिवारी ने सरकार से मांग की है कि 25 अगस्त 2010 से पहले केंद्र सरकार के अधीन और 27 जुलाई 2011 से पहले उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन नियुक्त शिक्षकों को इस अनिवार्यता से मुक्त किया जाए। उन्होंने जोर दिया कि यह केवल शिक्षकों का मुद्दा नहीं, बल्कि करोड़ों बच्चों की शिक्षा और शिक्षा व्यवस्था की स्थिरता से जुड़ा एक गंभीर विषय है।

उन्होंने मानवीय आधार पर तत्काल समाधान की आवश्यकता बताते हुए कहा कि जिस समय प्रदेश में शिक्षकों की भारी कमी के कारण विद्यालय बंद हो रहे हैं, ऐसे में अनुभवी शिक्षकों को सेवा से बाहर करना न केवल शिक्षा व्यवस्था बल्कि छात्रों के हितों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

उन्होंने मानवीय आधार पर तत्काल समाधान की आवश्यकता बताते हुए कहा कि जिस समय प्रदेश में शिक्षकों की भारी कमी के कारण विद्यालय बंद हो रहे हैं, ऐसे में अनुभवी शिक्षकों को सेवा से बाहर करना न केवल शिक्षा व्यवस्था बल्कि छात्रों के हितों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।