नवा रायपुर… वाणिज्यिक कर विभाग में वर्ष 2022 में लिपिक वर्ग से वाणिज्यिक (राज्य) कर निरीक्षक बनाने के लिए आयोजित सीमित प्रतियोगिता परीक्षा अब सवालों के घेरे में नहीं, बल्कि पूरी तरह निरस्त हो गई है। करीब चार साल बाद हुई जांच में परीक्षा से लेकर चयन प्रक्रिया तक कई गंभीर अनियमितताएं सामने आने के बाद राज्य कर आयुक्त कार्यालय ने परीक्षा को मूलतः शून्य घोषित कर दिया। इसके साथ ही इसी परीक्षा के आधार पर जारी चयन और नियुक्ति आदेश भी निरस्त कर दिए गए हैं। सबसे बड़ा असर उन कर्मचारियों पर पड़ा है, जो चार साल से इसी चयन के आधार पर वाणिज्यिक कर निरीक्षक के पद पर काम कर रहे थे।

26 जून 2022 को आयोजित सीमित प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर चयनित कर्मचारियों को जुलाई 2022 में वाणिज्यिक कर निरीक्षक के पद पर नियुक्ति दी गई थी। बाद में परीक्षा और चयन प्रक्रिया में अनियमितताओं की शिकायतें सामने आईं। इसके बाद जांच समिति गठित की गई और समिति ने 3 जुलाई 2026 को अपनी विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की।

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जांच में सबसे पहला बड़ा सवाल आरक्षण रोस्टर को लेकर सामने आया। परीक्षा से पहले पदों का वर्गवार आरक्षण रोस्टर के अनुसार वर्गीकरण नहीं किया गया था। आदेश में माना गया कि इससे आरक्षण संबंधी प्रावधानों के पालन के साथ पात्र अभ्यर्थियों को समान अवसर देने का सिद्धांत भी प्रभावित हुआ।

परीक्षा केंद्र पर परीक्षार्थियों की उपस्थिति का मूल रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं मिला। यानी परीक्षा में वास्तव में कौन-कौन अभ्यर्थी शामिल हुए, इसकी पुष्टि करने वाला मूल अभिलेख ही सामने नहीं आया। इसके साथ परीक्षा का समेकित परिणाम और अंक तालिका भी तैयार अथवा संधारित नहीं किए जाने की बात जांच में सामने आई।

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यहीं से चयन की मेरिट पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ। जब अंकों का समेकित और सत्यापन योग्य रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं था तो अभ्यर्थियों की पारस्परिक मेरिट किस आधार पर तय की गई, इसका स्पष्ट आधार भी जांच में नहीं मिला। आदेश में इसे चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता के लिए गंभीर समस्या माना गया।

जांच में चयनित अभ्यर्थियों की उत्तर-पुस्तिकाओं में एक जैसे उत्तर लिखे जाने का तथ्य भी सामने आया। इस समानता के संबंध में कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण अथवा पर्याप्त अभिलेख नहीं मिला। इससे परीक्षा के स्वतंत्र और निष्पक्ष संचालन पर भी सवाल खड़े हुए।

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मूल्यांकन प्रक्रिया भी सवालों से घिरी मिली। उत्तर-पुस्तिकाओं में परीक्षार्थियों की पहचान छिपाने के लिए कोडिंग व्यवस्था नहीं अपनाई गई थी। जांच में यह भी सामने आया कि कुछ अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से पुनर्मूल्यांकन किया गया और कुछ चयनित अभ्यर्थियों के चयन में पुनर्मूल्यांकन के दौरान बढ़ाए गए अंकों की भूमिका रही।

सबसे गंभीर बिंदुओं में चयन सूची जारी होने से पहले पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया में चयन समिति के अध्यक्ष, सदस्य और परीक्षा नियंत्रक के शामिल होने का उल्लेख भी है। आदेश के मुताबिक इससे मूल्यांकन की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।

परीक्षा सामग्री का हिसाब भी जांच में उलझा मिला। खरीदी गई उत्तर-पुस्तिकाओं की संख्या, उपयोग की गई उत्तर-पुस्तिकाओं और बची हुई उत्तर-पुस्तिकाओं की संख्या में अंतर पाया गया। उपलब्ध अभिलेखों से इनका मिलान नहीं हो सका और इस संबंध में पर्याप्त अभिलेखीय स्पष्टीकरण भी नहीं मिला। इससे परीक्षा सामग्री के नियंत्रण और अभिरक्षा पर भी सवाल खड़े हुए।

जांच में इन गड़बड़ियों को अलग-अलग प्रक्रियागत भूल मानकर छोड़ने के बजाय उनके सामूहिक प्रभाव को देखा गया। आदेश में कहा गया कि इनका असर परीक्षा की शुचिता, गोपनीयता, पारदर्शिता, निष्पक्षता, मेरिट निर्धारण और आरक्षण व्यवस्था पर पड़ा। ऐसे में केवल कुछ कर्मचारियों पर कार्रवाई अथवा पुनर्मूल्यांकन के जरिए नई मेरिट सूची बनाने का विकल्प भी उचित नहीं माना गया।

आदेश में यह भी माना गया कि पूरी परीक्षा रद्द करने का असर उन कर्मचारियों पर पड़ेगा, जो इसी चयन के आधार पर वर्तमान में वाणिज्यिक कर निरीक्षक के पद पर काम कर रहे हैं। लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड की स्थिति में प्रभावित और अप्रभावित अभ्यर्थियों को विश्वसनीय तरीके से अलग करना संभव नहीं पाया गया। इसी आधार पर परीक्षा और चयन प्रक्रिया को बरकरार रखने के लिए कोई कम कठोर विकल्प भी उचित नहीं माना गया।

आखिरकार 26 जून 2022 को आयोजित सीमित प्रतियोगिता परीक्षा को मूलतः शून्य घोषित करते हुए निरस्त कर दिया गया। इसके आधार पर जारी नियुक्ति आदेश भी रद्द कर दिए गए हैं। आदेश का सीधा असर उन कर्मचारियों पर है, जो इस परीक्षा के जरिए वाणिज्यिक (राज्य) कर निरीक्षक बने थे। उन्हें उस मूल पद और मूल पदस्थापना पर प्रत्यावर्तित किया जाएगा, जहां वे निरीक्षक पद पर नियुक्ति से पहले पदस्थ थे। आदेश तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है।

आदेश के बाद अब कानूनी मोर्चे की तैयारी

परीक्षा निरस्त होने के बाद मामला अब विभागीय आदेश तक सीमित रहने के बजाय न्यायिक लड़ाई की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। कर्मचारियों की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक शासन ने न्यायिक चुनौती की संभावना को देखते हुए पहले ही कैविएट दाखिल कर दिया है। यानी यदि प्रभावित कर्मचारी इस आदेश को अदालत में चुनौती देते हैं तो शासन को भी अपनी बात रखने का अवसर मिले, इसके लिए कानूनी स्तर पर तैयारी पहले से की गई है।

वहीं दूसरी ओर प्रभावित कर्मचारी भी पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। कर्मचारियों का कहना है कि वे पूरे मामले में न्यायिक सलाह ले रहे हैं और आदेश के खिलाफ याचिका दायर करने का फैसला किया है। उनका अगला कदम अब अदालत में इस बात को उठाना होगा कि जिस परीक्षा के आधार पर चार साल पहले नियुक्तियां हुईं और जिसके आधार पर कर्मचारी लगातार अपने पद पर कार्य करते रहे, उसकी पूरी प्रक्रिया को इतने लंबे अंतराल के बाद निरस्त करने का उनके सेवा भविष्य पर क्या असर पड़ेगा।

इस तरह 2022 की एक परीक्षा का विवाद चार साल बाद फिर खुल गया है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब इसी परीक्षा के आधार पर चयन और नियुक्ति हुई थी, जबकि अब उसी प्रक्रिया की वैधता पर विभागीय जांच के बाद सवाल खड़े हो गए हैं। एक तरफ शासन ने परीक्षा, चयन और नियुक्तियों को निरस्त करने का फैसला लिया है, तो दूसरी तरफ प्रभावित कर्मचारी न्यायिक रास्ते से अपने पक्ष की लड़ाई लड़ने की तैयारी में हैं। अब इस मामले का अगला पड़ाव अदालत होगा, जहां विभागीय आदेश और कर्मचारियों के सेवा हित—दोनों आमने-सामने होंगे।