बिलासपुर… बारिश के तीन दिनों ने नेहरू नगर स्थित बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। नंद विहार, अमलताश कॉलोनी, महावीर नगर और मंगला चौक के आसपास कई परिवार पिछले दो दिनों से बिजली संकट झेल रहे हैं। रहवासियों का कहना है कि खराबी की सूचना विभाग तक पहुंचाने के बावजूद समय पर मरम्मत दल नहीं पहुंचा। शिकायतें होती रहीं, फोन किए जाते रहे, लेकिन बिजली बहाली की कार्रवाई का इंतजार खत्म नहीं हुआ।

इन शिकायतों का एक सिरा नेहरू नगर स्थित बिजली कार्यालय में पदस्थ इंजीनियर गिरीश श्रीवास्तव तक पहुंचता है। नंद विहार के रहवासियों के अनुसार पिछले दो दिनों में उन्हें तीन से पांच बार फोन किया गया। शुरुआत में समस्या देखने के लिए टीम भेजने और जल्द बिजली बहाल कराने का आश्वासन दिया गया। लेकिन बिजली नहीं लौटी तो लोगों ने फिर संपर्क करने की कोशिश की। रहवासियों का कहना है कि लगातार फोन करने के बाद गिरीश श्रीवास्तव ने फोन उठाना ही बंद कर दिया।

रहवासियों का यह भी कहना है कि श्रीवास्तव से संपर्क हो भी जाए तो शिकायत सुनने के बाद आश्वासन मिल जाता है, लेकिन उसके बाद उस शिकायत का क्या हुआ, इसकी जानकारी लेने के लिए फिर उपभोक्ता को ही फोन करना पड़ता है। शिकायत दर्ज कराने वाला व्यक्ति अधिकारी को ढूंढता रहे और अधिकारी के स्तर पर शिकायत की निगरानी न हो, तो शिकायत निवारण व्यवस्था का मतलब ही क्या रह जाता है?

अधिकारी ही नहीं, कार्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल

नंद विहार की बिजली समस्या अकेली घटना नहीं है। अमलताश कॉलोनी, महावीर नगर और मंगला चौक के आसपास भी बिजली कटौती और फाल्ट को लेकर शिकायतें सामने आई हैं। इससे सवाल सिर्फ एक लाइन या एक फाल्ट का नहीं रह जाता, बल्कि नेहरू नगर स्थित बिजली कार्यालय की शिकायत लेने से लेकर मौके पर टीम भेजने और बिजली बहाल कराने तक की पूरी व्यवस्था पर उठता है।

यदि किसी इलाके में दो दिन से बिजली बंद है तो विभागीय स्तर पर यह स्पष्ट होना चाहिए कि शिकायत कब मिली, किस अधिकारी ने उसे देखा, किस कर्मचारी को मौके पर भेजा गया और सुधार कब तक हुआ। उपभोक्ताओं को इन सवालों का जवाब फोन पर आश्वासन के रूप में नहीं, जमीन पर कार्रवाई के रूप में चाहिए।

कंट्रोल रूम का फोन भी सवालों में

रहवासियों के अनुसार बिजली कंट्रोल रूम की शिकायत शाखा से संपर्क करने पर कई बार फोन व्यस्त मिलता है। ऐसे में शिकायत दर्ज कराने के लिए लोगों को बार-बार प्रयास करना पड़ता है।

एक तरफ कंट्रोल रूम से संपर्क मुश्किल होने की शिकायत है और दूसरी तरफ संबंधित अधिकारी से बार-बार संपर्क के बाद फोन नहीं उठने का आरोप। ऐसे में उपभोक्ता के लिए शिकायत दर्ज कराने और उसका पीछा करने के बीच का पूरा रास्ता ही परेशानी बन जाता है।

अंबष्ट तक शिकायत, फिर भी लाइनमैन का इंतजार

मामले की शिकायत संबंधित प्रमुख अधिकारी अंबष्ट तक भी पहुंचाई गई। रहवासियों के अनुसार वहां से समस्या दूर कराने का आश्वासन मिला। इसके बावजूद प्रभावित क्षेत्र में लाइनमैन कब पहुंचा और फाल्ट की वास्तविक स्थिति क्या थी, इसे लेकर रहवासियों को स्पष्ट जानकारी नहीं मिली।

यहीं से विभाग की जवाबदेही का सवाल और गंभीर हो जाता है। अगर शिकायत उच्च अधिकारी तक पहुंच गई थी तो नीचे के स्तर पर कार्रवाई किसने सुनिश्चित की? और यदि कार्रवाई हुई थी तो उसका परिणाम उपभोक्ताओं को क्यों नहीं मिला?

पोल,ट्रांसफार्मर की व्यवस्था,फाल्ट पर बेबसी क्यों?

बिजली विभाग शहर में ट्रांसफार्मर और 33 केवी के पोल लगाने जैसी व्यवस्थाओं को लगातार आगे बढ़ा रहा है। लेकिन उपभोक्ताओं के सामने सवाल यह है कि बुनियादी ढांचा बढ़ने के साथ खराबी दूर करने की व्यवस्था कितनी तेज हुई।

बारिश में फाल्ट होना असामान्य नहीं है। असामान्य तब लगता है, जब फाल्ट की शिकायत के बाद भी उपभोक्ता को लंबे समय तक अंधेरे में रहना पड़े और उसे यह तक पता न हो कि उसकी शिकायत पर कार्रवाई कौन कर रहा है।

फटकार .. शिकायतें खत्म क्यों नहीं हुईं?

बिजली व्यवस्था को लेकर अधिकारियों को पहले भी मंत्री और विधायकों की नाराजगी और फटकार का सामना करना पड़ा है। इसके बावजूद बारिश के साथ फिर वही शिकायतें सामने आना विभाग की तैयारी पर सवाल खड़ा करता है।

नेहरू नगर स्थित बिजली कार्यालय से जुड़े इन मामलों में अब विभाग को सिर्फ यह नहीं बताना होगा कि बारिश के कारण फाल्ट हुआ। उसे यह भी बताना होगा कि फाल्ट की सूचना मिलने के बाद कितने समय में टीम रवाना हुई, किसने निगरानी की और बिजली बहाल करने में कितना समय लगा।

क्योंकि उपभोक्ता के लिए बिजली विभाग की कार्यक्षमता का पैमाना पोलों की संख्या या ट्रांसफार्मरों की स्थापना नहीं है। उसके लिए पैमाना यह है कि बिजली जाने के बाद शिकायत कितनी जल्दी सुनी गई और अंधेरा कितनी जल्दी दूर हुआ।

नंद विहार और आसपास के रहवासियों की शिकायतों ने फिलहाल नेहरू नगर स्थित बिजली कार्यालय की इसी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया है। फोन नहीं उठना, उठे तो आश्वासन और फिर शिकायत की निगरानी का पता नहीं—अगर यही शिकायत निवारण की प्रक्रिया है तो विभाग को अपने ही सिस्टम का जवाब देना होगा।