मुंबई।बॉम्बे हाई कोर्ट ने विद्यालय में नाबालिग छात्र से यौन उत्पीड़न के मामले को लेकर अपने फैसले में कहा कि बच्चों की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी गंभीर आरोप के आधार पर भी प्रशासनिक प्राधिकारी कानून और प्राकृतिक न्याय की प्रक्रिया को दरकिनार नहीं कर सकते।

विद्यालय को किसी घटना के लिए केवल इसलिए वैधानिक रूप से दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि घटना उसके परिसर में हुई थी। अदालत ने विद्यालय की मान्यता रद्द करने के 10 मार्च 2023 के राज्य सरकार के आदेश को रद्द कर दिया।

न्यायमूर्ति आर.आई. चागला एवं न्यायमूर्ति फरहान पी. दुबाश की पीठ ने पटुक इंग्लिश मीडियम स्कूल की याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि विद्यालय में आरोप यह नहीं था कि विद्यालय के प्रबंधन, प्रधानाचार्य, शिक्षक अथवा गैर-शिक्षण कर्मचारी ने बच्चे को धारा 17(1) के अर्थ में शारीरिक दंड या मानसिक उत्पीड़न दिया।

विद्यालय परिसर में घटना होना और विद्यालय की कानूनी जिम्मेदारी अलग बातें हैं। किसी घटना का विद्यालय परिसर में होना और उस घटना के लिए विद्यालय की वैधानिक जिम्मेदारी होना दो अलग-अलग प्रश्न हैं।

केवल परिसर में घटना घट जाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि विद्यालय ने आरटीई एक्ट की धारा 17(1) का उल्लंघन किया है।

पीठ ने यह भी कहा कि बच्चों की सुरक्षा से संबंधित कानून और नियम समय के साथ अधिक कठोर हुए हैं, लेकिन बाद में बनाए गए सुरक्षा मानकों को सामान्यतः पूर्वव्यापी रूप से वर्ष 2015 की घटना पर लागू करके विद्यालय को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कानून स्वयं ऐसा करने की अनुमति न देता हो।

यदि वर्तमान समय में बच्चों की सुरक्षा की जांच करनी है, तो विद्यालय के वर्तमान अनुपालन की जांच की जानी चाहिए। वर्ष 2015 में विद्यालय परिसर में एक नाबालिग छात्र के साथ दो अन्य छात्रों द्वारा कथित यौन उत्पीड़न से संबंधित था।

छात्र के पिता ने विद्यालय प्रबंधन पर पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था न करने का आरोप लगाया था। इस वारदात में पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज हुआ और किशोर न्यायालय की कार्यवाही में संबंधित छात्रों के विरुद्ध निष्कर्ष निकाले गए थे।

आठ वर्ष बाद 2023 में क्षेत्रीय उप शिक्षा निदेशक ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की धारा 17(1) का उल्लेख करते हुए विद्यालय को घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया और विद्यालय का निरीक्षण कर उसकी मान्यता रद्द करने निर्देश दिया।

बॉम्बे हाई कोर्ट बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी संस्था द्वारा लंबे समय तक कार्यरत व्यक्ति को केवल ‘स्वयंसेवक’ या ‘मानदेय प्राप्त करने वाला’ कहकर न्यूनतम मजदूरी के वैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।

अदालत ने मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) में कार्यरत सामुदायिक स्वास्थ्य स्वयंसेवक को न्यूनतम मजदूरी का लाभ देने का आदेश दिया और औद्योगिक न्यायाधिकरण के स्वयं सेवकों को न्यूनतम मजदूरी के आदेश को बरकरार रखा है।

न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने की एकल पीठ ने बीएमसी की याचिका खारिज करते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति को उसके किए गए कार्य के बदले धनराशि दी जा रही है, तो केवल उस राशि को ‘मानदेय’ कह देने से वह न्यूनतम मजदूरी कानून के दायरे से बाहर नहीं हो जाती।

अन्यथा कोई नियोक्ता केवल भुगतान का नाम बदलकर न्यूनतम मजदूरी कानून से बच सकता है। वर्तमान समय में बीएमसी अंशकालिक सामुदायिक स्वास्थ्य स्वयंसेवक (सीएचवी) को लगभग 14000 रुपए प्रतिमाह मानदेय दे रहा है और उनसे लगभग 5 घंटे प्रतिदिन काम लिया जाता है।

पीठ ने माना कि 14000 रुपए प्रति माह को अत्यंत नगण्य राशि नहीं कहा जा सकता, फिर भी कानून के अनुसार सीएचवी को संबंधित अधिसूचना में निर्धारित न्यूनतम मजदूरी मिलनी चाहिए। बीएमसी ने वर्ष 1988 में भारत जनसंख्या परियोजना-वी के अंतर्गत मुंबई में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए अनेक स्वास्थ्य पोस्ट स्थापित किए।

इन स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से परिवार नियोजन, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण तथा विभिन्न रोगों की रोकथाम जैसे कार्य किए जाते थे।

यह योजना विश्व बैंक की आर्थिक सहायता समाप्त होने के बाद भी जारी रही और लगभग 38 वर्षों तक चलती रही। सीएचवी ने पहले बीएमसी की नियमित सेवा में स्थायी नियुक्ति की मांग की थी।

औद्योगिक न्यायाधिकरण ने उन्हें ‘कामगार’ माना था, लेकिन उन्हें नियमित सेवा में समाहित करने की मांग स्वीकार नहीं की गई। बाद में यह विवाद बॉम्बे हाई कोर्ट तक पहुंचा। 4 जनवरी 2017 को हाई कोर्ट ने बीएमसी की संबंधित याचिकाओं को खारिज किया, जिसके खिलाफ बीएमसी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

वह अपील लंबित है और उस मामले में आदेश पर स्थगन दिया गया था। वर्तमान मामले में पीठ ने स्पष्ट किया कि नियमित सेवा में समावेशन का प्रश्न और न्यूनतम मजदूरी का प्रश्न अलग-अलग हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामला न्यूनतम मजदूरी के वर्तमान विवाद के निर्णय में बाधा नहीं है।