रायपुर…छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाले में आबकारी अधिकारी आशीष श्रीवास्तव का निलंबन आखिरकार हो गया, लेकिन इस कार्रवाई ने सरकार और आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल यह नहीं कि उन्हें निलंबित क्यों किया गया, बल्कि सवाल यह है कि जब इसी घोटाले में दूसरे अधिकारियों पर कार्रवाई हो रही थी, तब आशीष श्रीवास्तव के मामले में इतनी देर क्यों हुई? क्या कार्रवाई के लिए अदालत में अभियोजन पत्र पेश होने का इंतजार किया जा रहा था, या फिर उन्हें अब तक पद पर बनाए रखने के पीछे कोई दूसरी वजह थी?

17 अक्टूबर 2026 को जारी शासन के आदेश के अनुसार, राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण एवं एंटी करप्शन ब्यूरो की जांच में दर्ज अपराध क्रमांक 04/2024 के मामले में आशीष श्रीवास्तव के विरुद्ध प्रथम दृष्टया आरोप सामने आने के बाद निलंबन की कार्रवाई की गई है। उनके खिलाफ पूरक अभियोजन पत्र 13 अक्टूबर को तैयार हुआ और 14 अक्टूबर को रायपुर की विशेष अदालत में पेश किया गया। निलंबन आदेश में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की विभिन्न धाराओं के साथ भारतीय दंड विधान की धाराओं का भी उल्लेख है। निलंबन अवधि में उनका मुख्यालय आबकारी आयुक्त कार्यालय, नवा रायपुर रहेगा।

तब आशीष श्रीवास्तव पर फैसला क्यों नहीं?

इस मामले में कार्रवाई के अलग-अलग समय ने पहले भी सवाल खड़े किए थे। जुलाई 2025 में शराब घोटाले से जुड़े 29 आबकारी अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन पत्र पेश होने के बाद 22 सेवारत अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया था। उस समय आशीष श्रीवास्तव को लेकर भी सवाल उठे थे कि जब उनका नाम घोटाले की जांच से जुड़ रहा है, तो उनके खिलाफ वैसी कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

15 जुलाई 2025 को प्रकाशित एक रिपोर्ट में भी इस बात पर सवाल उठाया गया था कि शराब दुकानों की निगरानी व्यवस्था और होलोग्राम से जुड़े कामकाज की जिम्मेदारी निभाने वाले आशीष श्रीवास्तव का नाम जांच की शुरुआती चर्चाओं के बाद आगे की कार्रवाई में स्पष्ट रूप से सामने क्यों नहीं आ रहा था। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख था कि उनसे पूछताछ हुई थी, लेकिन उस समय उनके खिलाफ कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं थी।

बाद में दिसंबर 2025 में प्रवर्तन निदेशालय की ओर से अदालत में पेश शिकायत में भी उनका नाम सामने आने की खबरें प्रकाशित हुईं। अब अक्टूबर 2026 में ईओडब्ल्यू-एसीबी का पूरक अभियोजन पत्र अदालत में पेश होने के बाद राज्य शासन ने निलंबन का आदेश जारी कर दिया है।

कार्रवाई में देरी का भी है

शराब घोटाले की जांच में पहले से कई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो चुकी थी। ऐसे में आशीष श्रीवास्तव के मामले में निलंबन का फैसला देर से सामने आने पर यह पूछना स्वाभाविक है कि विभाग और शासन ने पहले क्या कदम उठाए थे। क्या संबंधित अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार उपलब्ध नहीं थे, या जांच की प्रक्रिया में कोई ऐसी अड़चन थी जिसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई?

यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी अधिकारी का नाम जांच या अभियोजन पत्र में शामिल होना अपने आप में अपराध सिद्ध होना नहीं है। अंतिम फैसला न्यायालय को करना है। लेकिन प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न इससे अलग है। यदि अन्य अधिकारियों के विरुद्ध समान मामले में अभियोजन पत्र पेश होने पर तत्काल निलंबन किया गया था, तो आशीष श्रीवास्तव के मामले में कार्रवाई की समय-सीमा और उसके आधार को सार्वजनिक करना शासन की जिम्मेदारी बनती है।

अब निलंबन आदेश जारी होने के बाद एक सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है—क्या विभाग केवल निलंबन तक सीमित रहेगा, या यह भी स्पष्ट करेगा कि पहले कार्रवाई क्यों नहीं हुई? शराब घोटाले में जवाबदेही तय करने की बात तभी विश्वसनीय होगी, जब कार्रवाई के अलग-अलग पैमानों पर उठ रहे सवालों का भी जवाब मिलेगा।