बिलासपुर…सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी जिन शिक्षकों पर है, उनका बड़ा हिस्सा इन दिनों मोबाइल, लैपटॉप, ऑनलाइन पोर्टल और विभागीय रिपोर्टिंग में उलझा हुआ है। छात्रवृत्ति के आवेदन से लेकर जाति प्रमाण पत्र के दस्तावेज जुटाने, विद्यार्थियों की डिजिटल पहचान बनाने, योजनाओं की जानकारी भरने और ऑनलाइन प्रशिक्षण पूरा करने तक की जिम्मेदारियों ने शिक्षकों पर गैर-शिक्षकीय कामों का बोझ बढ़ा दिया है। सवाल सीधा है—शिक्षक कक्षा में बच्चों को पढ़ाएं या दिनभर सरकारी पोर्टलों पर जानकारी दर्ज करते रहें?

छत्तीसगढ़ की सरकारी स्कूल व्यवस्था में जुलाई से अक्टूबर के बीच ऑनलाइन कामों का दबाव लगातार बढ़ने की शिकायतें सामने आ रही हैं। शिक्षकों के सामने एक साथ कई पोर्टलों पर जानकारी दर्ज करने, दस्तावेज जुटाने और तय समय-सीमा में काम पूरा करने की चुनौती है। इसका असर नियमित अध्यापन पर पड़ने की आशंका है। जिन विद्यालयों में पहले से शिक्षकों की कमी है, वहां अतिरिक्त विभागीय कामकाज बच्चों की पढ़ाई के लिए और बड़ी समस्या बन सकता है।

20 से अधिक काम, पढ़ाई के लिए कितना समय?

शिक्षकों को एपीएएआर आईडी, यू-डाइस 2026-27, पौधारोपण की तस्वीरें अपलोड करने और जियो टैगिंग, गणवेश व पाठ्यपुस्तक वितरण की जानकारी, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, निपुण भारत, मध्यान्ह भोजन योजना, सरस्वती साइकिल योजना, परीक्षा परिणाम, पालक-शिक्षक बैठक की रिपोर्टिंग और ऑनलाइन प्रशिक्षण जैसे कई काम करने पड़ते हैं। इसके अलावा विभिन्न सरकारी योजनाओं से जुड़ी जानकारी अलग-अलग पोर्टलों पर दर्ज करनी होती है।

इनमें से कई काम योजनाओं की निगरानी और विद्यार्थियों को सुविधाएं दिलाने के लिए जरूरी हो सकते हैं। समस्या उनकी उपयोगिता से अधिक इस बात की है कि कामों की संख्या, समय-सीमा और उन्हें पूरा करने की व्यवस्था का तालमेल कितना व्यावहारिक है। जब एक ही शिक्षक को कक्षा लेने के साथ बार-बार पोर्टल पर जानकारी भरनी पड़े, दस्तावेजों का मिलान करना पड़े और अलग-अलग आदेशों की समय-सीमा पूरी करनी हो, तो पढ़ाने के लिए समय आखिर बचेगा कितना?

आवेदन में चूक.. कार्रवाई की चेतावनी

पूर्व मैट्रिक और पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति के आवेदनों में विद्यार्थियों के जाति और आय प्रमाण पत्र, आधार, बैंक खाते, समग्र आईडी तथा अंकसूची सहित जरूरी दस्तावेजों का मिलान करना पड़ता है। दस्तावेज अधूरे हों, उनमें त्रुटि हो या अभिभावकों से समय पर जानकारी नहीं मिले, तो आवेदन पूरा करने में परेशानी होती है। इंटरनेट और पोर्टल संबंधी तकनीकी दिक्कतें भी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं।

शिक्षकों के लिए चिंता की बात यह है कि विभागीय काम पूरा करने की समय-सीमा बेहद कम रखे जाने और समय पर आवेदन जमा नहीं होने पर वेतन रोकने की चेतावनी दिए जाने की बात सामने आई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 16 अक्टूबर को जारी आदेश में 19 अक्टूबर तक काम पूरा करने की समय-सीमा दी गई। इतने कम समय में विद्यार्थियों के दस्तावेज जुटाना, उनका सत्यापन करना और आवेदन पूरा करना कितना व्यावहारिक है—यह समीक्षा का विषय है।

समय-सीमा का पालन जरूरी हो सकता है, लेकिन हर देरी को शिक्षक की लापरवाही मान लेना उचित नहीं होगा। जहां दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, पोर्टल काम नहीं कर रहा या संबंधित कार्यालय से प्रमाण पत्र जारी होने में देरी हो रही है, वहां जवाबदेही तय करने से पहले वास्तविक स्थिति की जांच भी जरूरी है।

प्रक्रिया में शिक्षक ही क्यों बनें कड़ी?

जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए भी शिक्षकों को अभिभावकों से संपर्क करने, आवश्यक दस्तावेज जुटाने, प्रपत्र भरवाने और आवेदन तैयार कराने में समय देना पड़ता है। शिक्षकों की शिकायत है कि आवेदन तहसील या राजस्व कार्यालय में पहुंचने के बाद उसकी स्थिति की स्पष्ट जानकारी विद्यालयों को नहीं मिलती। पुराने दस्तावेजों का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने पर कई मामलों में प्रक्रिया दोहराने की नौबत भी आती है।

यहां सवाल केवल शिक्षकों के काम का नहीं, पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का है। विद्यालय से आवेदन तैयार कराने और दस्तावेज जुटाने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन आवेदन जमा होने के बाद प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया कहां अटकी है, इसकी जानकारी भी समय पर मिलनी चाहिए। कितने आवेदन प्राप्त हुए, कितने प्रमाण पत्र जारी हुए और कितने मामले लंबित हैं—इसका डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध हो तो अनावश्यक भागदौड़ और दोहराव दोनों कम किए जा सकते हैं।

प्रशिक्षण जरूरी, पढ़ाई की कीमत पर नहीं

शिक्षकों के लिए ऑनलाइन प्रशिक्षण, मॉड्यूल पूरा करना और प्रमाण पत्र हासिल करना भी विभागीय कामों का हिस्सा बन गया है। प्रशिक्षण से शिक्षण क्षमता बेहतर हो सकती है, लेकिन इसके लिए उचित समय और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना भी जरूरी है। एक तरफ कक्षा में बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी हो और दूसरी तरफ अलग-अलग ऑनलाइन काम तय समय में पूरे करने का दबाव, तो दोनों दायित्वों के बीच संतुलन बनाना कठिन होना स्वाभाविक है।

विभाग को यह भी देखना चाहिए कि निर्धारित समय-सीमा में काम पूरा नहीं होने के पीछे शिक्षक की लापरवाही है या तकनीकी समस्या, दस्तावेजों की कमी और दूसरे कार्यालयों में लंबित प्रक्रिया जैसी वजहें हैं। वेतन रोकने जैसी कार्रवाई की चेतावनी देने से पहले नियमों के अनुरूप स्थिति की समीक्षा और संबंधित कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।

सरकार को ही निकालना होगा

यदि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता सुधारनी है, तो शिक्षकों का समय बचाने के लिए व्यवस्था में बदलाव जरूरी है। एक ही जानकारी को अलग-अलग पोर्टलों पर बार-बार भरने की जरूरत खत्म होनी चाहिए। अलग-अलग प्रणालियों के स्थान पर एकीकृत डिजिटल व्यवस्था विकसित की जाए और जहां आवश्यकता हो, वहां डाटा एंट्री ऑपरेटर उपलब्ध कराए जाएं। छात्रवृत्ति और जाति प्रमाण पत्र के मामलों में शिक्षा तथा राजस्व विभाग की जिम्मेदारियां भी स्पष्ट होनी चाहिए।

जिला और विकासखंड स्तर के अधिकारियों की समीक्षा केवल ऑनलाइन प्रविष्टियों और रिपोर्टों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि विद्यालयों में नियमित कक्षाएं कितनी चल रही हैं, बच्चों के सीखने का स्तर क्या है और शिक्षकों का कितना समय वास्तविक अध्यापन में लग रहा है।

आखिर शिक्षक का प्राथमिक काम बच्चों को पढ़ाना है, पोर्टल भरना नहीं। ऑनलाइन व्यवस्था का उद्देश्य शिक्षा और सरकारी योजनाओं को आसान बनाना होना चाहिए, न कि शिक्षकों को कागजी और डिजिटल औपचारिकताओं में इतना उलझा देना कि कक्षा में पढ़ाई के लिए ही समय कम पड़ जाए। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता ऑनलाइन प्रविष्टियों की संख्या से नहीं, बच्चों के सीखने और आगे बढ़ने से तय होगी।