प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देश के लॉ कॉलेजों में कानूनी शिक्षा के गिरते स्तर पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए एक बड़ा कदम उठाया है। एक मामले की सुनवाई के दौरान छात्र की उत्तर पुस्तिका में विषय की समझ का पूर्ण अभाव देख कोर्ट ने निर्देश दिया है कि संबंधित छात्र की आंसर बुक (जिसमें उसे शून्य अंक मिले थे) और प्रश्न पत्र की प्रतियां बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और भारत के विधि आयोग (Law Commission of India) को भेजी जाएं।

कोर्ट ने इन संस्थाओं से कानूनी शिक्षा के मौजूदा मानकों और संस्थानों को दी जाने वाली मान्यता की प्रक्रिया को और अधिक मजबूत बनाने पर विचार करने का आग्रह किया है ताकि भारतीय कानूनी शिक्षा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सके।

यह मामला तब सामने आया जब एक बी.ए. एलएल.बी. (B.A. LL.B.) छात्र ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर अपनी ‘बायो-डायवर्सिटी प्रोटेक्शन लॉ’ विषय की उत्तर पुस्तिका के दोबारा मूल्यांकन की मांग की थी।

छात्र का दावा था कि उसने सभी प्रश्नों के उत्तर सही ढंग से दिए हैं और उसे कम से कम 50 अंक मिलने चाहिए थे, लेकिन उसे शून्य (0) अंक दिए गए। मामले की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने मूल उत्तर पुस्तिका और प्रश्न पत्र मंगवा लिया। सुनवाई के दौरान जब कोर्ट ने छात्र द्वारा लिखे गए उत्तरों की जांच की, तो स्थिति चौंकाने वाली निकली।

अदालत में जब छात्र के उत्तरों को पढ़ा गया, तो सरकारी वकील (स्टैंडिंग काउंसिल) और स्वयं न्यायाधीश इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि उत्तरों में विषय की कोई कानूनी समझ नहीं थी।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि छात्र के जवाब पूरी तरह से तर्कहीन थे और उनमें ‘बायो-डायवर्सिटी प्रोटेक्शन लॉ’ से संबंधित कोई भी तथ्य या कानूनी बिंदु मौजूद नहीं था। ऐसे में परीक्षक द्वारा शून्य अंक दिए जाने को कोर्ट ने बिल्कुल सही ठहराया और छात्र की याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने इस घटना को केवल एक छात्र की विफलता नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा प्रणाली के लिए एक चेतावनी माना।

जस्टिस दिवाकर ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि कानूनी शिक्षा न्याय वितरण प्रणाली की नींव होती है। यदि शैक्षणिक संस्थानों के स्तर में गिरावट आती है, तो इसका सीधा असर भविष्य की न्याय व्यवस्था पर पड़ेगा। कोर्ट ने कहा कि छात्र ने जिस तरह के उत्तर लिखे, उसके लिए केवल उसे ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

यह उस संस्थान की भी विफलता है जहां वह पढ़ रहा था। कोर्ट के अनुसार, यदि कॉलेज ने सही ओरिएंटेशन प्रोग्राम चलाया होता और छात्र को उचित मार्गदर्शन दिया होता, तो एक प्रोफेशनल डिग्री के छात्र से ऐसे उत्तरों की उम्मीद नहीं की जा सकती थी।

इस पृष्ठभूमि में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को निर्देश दिया कि वह संबंधित संस्थान के शैक्षणिक और इंफ्रास्ट्रक्चर मानकों की जांच करे। साथ ही, BCI और विधि आयोग से यह सुनिश्चित करने को कहा कि क्या वर्तमान निरीक्षण प्रणाली पर्याप्त है या इसमें सुधार की आवश्यकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन टिप्पणियों का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ कार्रवाई करना नहीं, बल्कि कानूनी शिक्षा में सुधार की दिशा में संबंधित निकायों का ध्यान आकर्षित करना है। रजिस्ट्रार (अनुपालन) को छात्र की पहचान छिपाते हुए उसकी आंसर शीट की कॉपी BCI के प्रधान सचिव को भेजने के निर्देश दिए गए हैं।