दिल्ली: देश भर में तेज़ी से फैल रहे निजी कोचिंग संस्थानों की मनमानी, भारी-भरकम फीस और उन पर नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 32 के तहत ऐसे मुद्दों पर अदालत का हस्तक्षेप उचित नहीं है।

याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि अनियंत्रित कोचिंग प्रणालियों को विनियमित किया जाए और विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए कड़े दिशा-निर्देश तय किए जाएं, लेकिन शीर्ष अदालत ने इस पर कोई भी आदेश जारी करने से मना कर दिया।

यह याचिका अधिवक्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी द्वारा स्वयं पेश होकर दायर की गई थी। याचिका में देशभर के छात्रों के मौलिक अधिकारों का हवाला देते हुए तर्क दिया गया था कि निजी कोचिंग संस्थानों की अनियंत्रित कार्यप्रणाली छात्रों पर भारी मानसिक और आर्थिक दबाव डाल रही है।

याचिकाकर्ता ने केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) द्वारा वर्ष 2024 में जारी की गई भ्रामक विज्ञापनों की रोकथाम संबंधी गाइडलाइन और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की रिपोर्टों को आधार बनाकर कोचिंग सेंटरों की जवाबदेही तय करने की मांग की थी।

याचिका में राजस्थान के कोटा जैसे कोचिंग हब का विशेष उल्लेख किया गया था, जहां प्रतिस्पर्धा के दबाव के कारण छात्रों द्वारा आत्महत्या की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

इसके साथ ही ‘डमी स्कूलों’ के बढ़ते चलन पर भी गहरी चिंता जताई गई थी, जहां छात्र सिर्फ बोर्ड परीक्षा के लिए नामांकन कराते हैं और पूरा समय कोचिंग संस्थानों में बिताते हैं। याचिकाकर्ता की मुख्य मांगों में से एक यह थी कि JEE, NEET, CLAT और CUET जैसी कठिन राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाओं के पाठ्यक्रम को राज्यों के स्कूली पाठ्यक्रम के अनुरूप बनाया जाए, ताकि छात्रों को अलग से भारी-भरकम कोचिंग न लेनी पड़े।

इसके अलावा, याचिका में निजी कोचिंग संस्थानों के लिए एक समान राष्ट्रीय कानूनी ढांचा बनाने, कोचिंग के घंटों की सीमा तय करने, संस्थानों में अनिवार्य रूप से मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और परामर्शदाता नियुक्त करने तथा छात्रों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने वाली शिक्षण पद्धतियों पर रोक लगाने के निर्देश देने की गुहार लगाई गई थी।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन मांगों पर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) या अन्य संस्थाओं को नोटिस जारी करने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता को राहत नहीं दी।