रायपुर (मनीष जायसवाल)। राज्य बनने के 25 साल के इतिहास को देखें तो गुरुजी आंदोलन के जरिए सरकार की किरकिरी करना नहीं चाहते, वे अपनी मांगों के लिए शक्ति प्रदर्शन करते हैं। मगर कई बार व्यवस्था की सुस्ती ही ऐसे हालात खड़े कर देती है, जहां सरकार को आंदोलन और विरोध का सामना करना पड़ता है। TET को लेकर भी अब कुछ ऐसी ही स्थिति बनती दिखाई दे रही है।

छत्तीसगढ़ के हजारों शिक्षक सरकार से किसी राजनीतिक वादे की मांग नहीं कर रहे हैं। उनकी मांग सरल है …कार्यरत शिक्षकों के लिए विभागीय शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी TET आयोजित की जाए। परीक्षा कराने की व्यवस्था सरकार के पास है, नियम मौजूद हैं और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश भी सामने हैं। इसके बाद भी शिक्षा विभाग की ओर से परीक्षा को लेकर कोई नीतिगत पहल या तारीख सामने नहीं आई है।

उधर, बीएड अर्हता वाले सहायक शिक्षकों की नौकरी पर संकट आया तो सरकार ने नियमों के भीतर वैकल्पिक रास्ता तलाश लिया। समायोजन की व्यवस्था बनाई गई और कर्मचारियों के भविष्य को बचाने की कोशिश हुई। सरकार का यह कदम स्वागत योग्य था…। मगर इसी फैसले ने कार्यरत शिक्षकों के बीच एक तुलना खड़ी कर दी है। जब एक मामले में नियमों के भीतर समाधान का रास्ता निकाला जा सकता है तो उन शिक्षकों के लिए विभागीय TET कराने की पहल क्यों नहीं हो सकती, जो लंबे समय से सरकारी स्कूलों में सेवा दे रहे हैं…?

यहीं से सरकार की प्राथमिकताओं को लेकर चर्चा शुरू होती है…! क्या व्यवस्था के जिम्मेदार लोग तभी सक्रिय होते है जब किसी कर्मचारी की नौकरी पर संकट आए, मामला न्यायालय तक पहुंचे या आंदोलन की स्थिति बने…? अगर समाधान का रास्ता नियमों के भीतर मौजूद है तो हजारों शिक्षकों को परीक्षा की तारीख के लिए इंतजार क्यों करना पड़ रहा है..?

छत्तीसगढ़ प्रदेश शिक्षक फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष राजेश चटर्जी का कहना है कि मामला उन शिक्षकों से जुड़ा है, जिनकी नियुक्ति ऐसे समय हुई थी जब TET भर्ती की अनिवार्य शर्त नहीं थी…! वे उस समय लागू भर्ती नियमों के आधार पर सरकारी सेवा में आए। बाद में नियम बदले और न्यायालय के निर्णयों के बाद TET पात्रता का महत्व बढ़ा..। ऐसे में बदली हुई व्यवस्था के अनुरूप पात्रता हासिल करने का अवसर देना सरकार और विभाग की जिम्मेदारी है..!

श्री चटर्जी के मुताबिक, यदि कार्यरत शिक्षकों को नई पात्रता हासिल करनी है तो उन्हें परीक्षा देने का पर्याप्त अवसर भी मिलना चाहिए। उनका कहना है कि विभागीय TET को लेकर अभी तक जिस तरह की सक्रियता दिखाई देनी चाहिए थी, वह नजर नहीं आ रही है और यह परीक्षा विभाग के एजेंडे में भी प्रमुखता से दिखाई नहीं देती..।

शिक्षक फेडरेशन ने सर्वोच्च न्यायालय के State of U.P. versus Anjuman Ishaat-e-Taleem Trust & Others मामले का हवाला देते हुए कहा है कि 29 मई 2026 के आदेश के पैरा-34 में राज्यों को अधिमानतः साल में दो बार TET आयोजित करने की बात कही गई है, ताकि कार्यरत शिक्षकों को वैधानिक पात्रता हासिल करने का पर्याप्त अवसर मिल सके..। फेडरेशन के अनुसार न्यायालय ने TET उत्तीर्ण करने की अंतिम समय-सीमा 31 अगस्त 2028 निर्धारित की है..।

प्रदेश शिक्षक फेडरेशन ने 1 सितंबर 2025 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का भी हवाला दिया है। संगठन के अनुसार TET अर्हता के बिना शिक्षक पदोन्नति के पात्र नहीं होंगे और निर्धारित समय में पात्रता हासिल नहीं करने पर सेवा भी प्रभावित हो सकती है। ऐसे में राज्य में TET के आयोजन में देरी सीधे उन शिक्षकों को प्रभावित कर सकती है, जिन्हें अब नई पात्रता हासिल करने के लिए विभाग की ओर देखना पड़ रहा है।

शिक्षक संगठनों का कहना है कि 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों की भर्ती के समय TET का प्रावधान नहीं था। बाद में व्यवस्था बदली तो इन शिक्षकों के सामने नई पात्रता हासिल करने की चुनौती आ गई। ऐसे में विभागीय TET का आयोजन उनके लिए महज परीक्षा नहीं, यह पदोन्नति और सेवा से जुड़ा महत्वपूर्ण अवसर बन गया है।

राजनीतिक नजरिए से देखें तो मामला सरकार के लिए असहज स्थिति खड़े कर सकता है..। शिक्षक समाज का बड़ा वर्ग सरकार के फैसलों को करीब से देख रहा है। एक तरफ बीएड शिक्षकों के मामले में संकट आने पर वैकल्पिक व्यवस्था तैयार की जाती है। आर्ट्स के आहर्ता धारियों को विज्ञान प्रयोगशाला सहायक बना दिया जाता है और दूसरी तरफ कार्यरत शिक्षक विभागीय TET की तारीख का इंतजार करते हैं, तो तुलना होना स्वाभाविक है…। शिक्षक संगठन अब इसी तुलना को सार्वजनिक रूप से सामने ला रहे हैं।

अब चर्चा इस बात की भी है कि क्या विभाग किसी बड़े आंदोलन से सरकार की किरकिरी का इंतजार कर रहा है…? क्या सरकार तब सक्रिय होगी जब हजारों शिक्षक सड़कों पर उतरेंगे और सरकार की इस नीतियों की धरना स्थल से फजीहत करेंगे, या आंदोलन के दबाव से पहले ही विभागीय TET की घोषणा कर शिक्षकों को राहत दी जाएगी..? फिलहाल इसका जवाब सरकार के पास है और शिक्षक तारीख का इंतजार कर रहे हैं।

शिक्षकों के लिए TET अब सिर्फ पात्रता परीक्षा नहीं रह गई है। यह उनके करियर, पदोन्नति और सेवा सुरक्षा से जुड़ चुका है। जिन शिक्षकों ने उस समय लागू नियमों के आधार पर सरकारी सेवा शुरू की थी, उनके सामने आज बदली हुई व्यवस्था के अनुरूप पात्रता हासिल करने की चुनौती है..। ऐसे में सरकार से वे अपेक्षा रखते हैं कि वह परीक्षा का रास्ता समय रहते खोले।

प्रदेश शिक्षक फेडरेशन ने सरकार से सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप शीघ्र विभागीय TET आयोजित करने की मांग की है। साथ ही प्रभावित शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण, अध्ययन सामग्री और परीक्षा की तैयारी की व्यवस्था करने की बात कही है, ताकि लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को नई पात्रता हासिल करने की प्रक्रिया में पर्याप्त सहयोग मिल सके।

एक शिक्षक का अनुभव किसी भी शिक्षा व्यवस्था की बड़ी पूंजी होता है। जिसने लंबे समय तक बच्चों को पढ़ाया है और सरकारी स्कूलों की जिम्मेदारी संभाली है, उसके अनुभव को नई पात्रता व्यवस्था के साथ जोड़कर देखना जरूरी है। विभागीय TET आयोजित करना किसी पर उपकार नहीं है। यह उन शिक्षकों को नई व्यवस्था के अनुरूप पात्रता हासिल करने का अवसर देना है, जो उस समय लागू नियमों के तहत सेवा में आए थे।

बीएड शिक्षकों के मामले में सरकार ने दिखाया है कि संकट आने पर नियमों के भीतर समाधान निकाला जा सकता है। जबकि TET मामले में गेंद सरकार के पाले में शुरू से है…। NCTE ने 11 फरवरी 2011 की अधिसूचना के जरिए TET परीक्षा आयोजित करने के लिए गाइडलाइन जारी की थी। वहीं NCTE के 23 अगस्त 2010 के राजपत्र के प्रावधानों के अनुसार इससे पहले नियुक्त शिक्षकों के लिए TET अर्हता अनिवार्य नहीं थी। छत्तीसगढ़ में TET परीक्षा का आयोजन जुलाई 2011 के बाद क्रमशः शुरू हुआ।

इसके बाद बच्चों के नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 में संशोधन के लिए शिक्षा का अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2017 की अधिसूचना 9 अगस्त 2017 को जारी हुई। बदली हुई पात्रता व्यवस्था के बीच अब उन शिक्षकों के सामने TET हासिल करने की चुनौती है, जो अपनी नियुक्ति के समय लागू नियमों के आधार पर सेवा में आए थे..! अब देखना यह है कि पुराने शिक्षकों के मामले में सरकार संकट गहराने का इंतजार करती है या समय रहते विभागीय TET की तारीख घोषित कर देती है।