बिलासपुर: बिलासपुर स्थित न्यू हॉरिजोंटल डेंटल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट की बीडीएस (BDS) अंतिम वर्ष की छात्रा शिरीन अख्तर की परीक्षा कॉपियों के मूल्यांकन में बड़ी गड़बड़ी का मामला सामने आया है।

परीक्षा में कुल 1600 में से 1002 अंक (पासिंग मार्क्स से काफी अधिक) हासिल करने के बावजूद छात्रा को चार मुख्य विषयों में फेल कर दिया गया। जब छात्रा ने उत्तरपुस्तिकाओं की फोटोकॉपी निकलवाई, तो पता चला कि 6 प्रश्नों के उत्तर पूरे लिखने के बावजूद उसे शून्य (0) अंक दिए गए हैं।

इस मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जस्टिस एके प्रसाद की एकल पीठ ने प्रथम दृष्टया गंभीर लापरवाही और विसंगतियां पाते हुए छात्रा की चारों विषयों की उत्तरपुस्तिकाओं का 독립 विशेषज्ञ समिति (Independent Expert Committee) से पुनर्मूल्यांकन (Re-evaluation) कराने का बड़ा आदेश जारी किया है।

बिलासपुर निवासी शिरीन अख्तर आयुष यूनिवर्सिटी से संबद्ध सकरी स्थित ‘न्यू हॉरिजोंटल डेंटल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट’ की छात्रा हैं। उनका अकादमिक रिकॉर्ड शुरुआत से ही बेहतरीन रहा है और उन्होंने प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय वर्ष की परीक्षाएं बिना किसी बैकलॉग के अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की थीं।

मार्च-अप्रैल 2026 में आयोजित बीडीएस अंतिम वर्ष की परीक्षा का परिणाम जब घोषित हुआ, तो छात्रा को:

  • कुल प्राप्तांक: 1600 में से 1002 अंक मिले।
  • चार विषयों में फेल: पब्लिक हेल्थ डेंटिस्ट्री, पीरियडोलॉजी, ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी, और कंजरवेटिव डेंटिस्ट्री एंड एंडोडोंटिक्स में उन्हें अनुत्तीर्ण घोषित कर दिया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि कॉपियों के निरीक्षण से कई गंभीर त्रुटियां सामने आईं। बाकी चार थ्योरी पेपरों में छात्रा को क्रमश: 39, 42, 37 और 39 अंक मिले थे, जबकि फेल किए गए चार विषयों में महज 18 से 23 अंक दिए गए।

पब्लिक हेल्थ डेंटिस्ट्री’ के 4 सवालों और ‘कंजरवेटिव डेंटिस्ट्री एंड एंडोडोंटिक्स’ के 2 सवालों में उत्तर सही और पूरे लिखे होने के बावजूद सीधे 0 नंबर दे दिए गए। पीरियोडोंटोलॉजी विषय में 10-10 अंकों वाले दो दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों में महज 2-2 अंक ही दिए गए।

यूनिवर्सिटी की ओर से तर्क दिया गया कि मूल्यांकन कार्य TCSiON डिजिटल ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम के जरिए विषय विशेषज्ञों द्वारा किया गया था। कॉपियां पूरी तरह सुरक्षित सर्वर पर स्कैन कर जांची गई थीं। साथ ही, नियमानुसार केवल अधिकतम दो विषयों में ही री-इवैल्यूएशन की अनुमति होती है।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि अदालतें सामान्यतः परीक्षाओं के पुनर्मूल्यांकन या मूल्यांकन प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करती हैं, लेकिन यदि रिकॉर्ड से प्रथम दृष्टया यह साबित हो कि सही उत्तरों को भी पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है या मूल्यांकन में गंभीर त्रुटि हुई है, तो अदालत अपने असाधारण अधिकारों का प्रयोग कर हस्तक्षेप कर सकती है।