बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के दीपका स्थित लाइफ केयर हॉस्पिटल में करीब 15 साल पहले मिले भ्रूण के मामले में बिलासपुर हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को आंशिक रूप से पलट दिया है। जस्टिस एनके व्यास की सिंगल बेंच ने तीन डॉक्टरों को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी (MTP) एक्ट और भारतीय दंड संहिता की धारा 315 के तहत दोषी ठहराया है। कोर्ट ने सजा तय करने के लिए 12 अक्टूबर 2026 की तारीख निर्धारित की है और तीनों आरोपियों को अपने अधिवक्ताओं के साथ उस दिन उपस्थित रहने का निर्देश दिया है।

मामला वर्ष 2011 का है। जानकारी के अनुसार, 7 अगस्त 2011 को कोरबा के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) और कटघोरा के अनुविभागीय अधिकारी (SDM) की टीम ने पाली रोड, दीपका स्थित लाइफ केयर हॉस्पिटल में जांच और छापे की कार्रवाई की थी। निरीक्षण के दौरान अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर के अलावा अलग-अलग बोतलों में 16 से 32 सप्ताह की गर्भावस्था से संबंधित भ्रूण पाए गए थे। कार्रवाई के दौरान एक्सपायरी दवाएं और गर्भपात में इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरण भी मिलने की बात सामने आई थी।

इस मामले में कटघोरा के अपर सत्र न्यायाधीश ने 31 अगस्त 2016 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद रविदास, डॉ. मिथलेश प्रसाद और रेणू श्रीवास्तव को आरोपों से बरी कर दिया था। निचली अदालत के इस फैसले को राज्य शासन ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। इसी अपील पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने अब निचली अदालत के फैसले को कुछ धाराओं के संबंध में पलट दिया है।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अस्पताल में मिले भ्रूण को वहां रखने की परिस्थितियों के संबंध में आरोपियों को स्पष्टीकरण देना था। कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 111 का उल्लेख करते हुए कहा कि आरोपी यह साबित नहीं कर सके कि अस्पताल में मिले 16 से 32 सप्ताह के भ्रूण किसी वैध चिकित्सीय आवश्यकता के तहत और सद्भावपूर्वक रखे गए थे।

इसी आधार पर हाई कोर्ट ने MTP एक्ट, 1971 की धारा 5 तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 315 के तहत तीनों चिकित्सकों को मिली दोषमुक्ति को रद्द कर दिया और उन्हें इन प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया। हालांकि, कोर्ट ने अभी सजा की अवधि तय नहीं की है। इसके लिए आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 235(2) के तहत 12 अक्टूबर 2026 को सुनवाई होगी।

कोर्ट ने तीनों दोषियों और उनके अधिवक्ताओं को निर्धारित तारीख पर उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। सजा पर सुनवाई के दौरान अदालत दोषसिद्धि के बाद आरोपियों को अपना पक्ष रखने का अवसर देगी, जिसके बाद संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत सजा तय की जाएगी।

हालांकि, हाई कोर्ट ने प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स (PC-PNDT) एक्ट के तहत तीनों चिकित्सकों को मिली दोषमुक्ति को बरकरार रखा है। इस पहलू पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले का हवाला देते हुए कहा कि PC-PNDT कानून के तहत पुलिस द्वारा सीधे FIR दर्ज कर चार्जशीट दाखिल करना पर्याप्त नहीं है। इस कानून के तहत सक्षम प्राधिकारी की शिकायत आवश्यक है।

इस कानूनी प्रक्रिया से जुड़ी कमी के आधार पर हाई कोर्ट ने PC-PNDT एक्ट की धारा 22(3) के तहत निचली अदालत द्वारा दी गई दोषमुक्ति में हस्तक्षेप नहीं किया। इस तरह 15 साल पुराने इस मामले में हाई कोर्ट ने MTP एक्ट और IPC की धारा 315 से संबंधित दोषमुक्ति को पलटते हुए तीनों डॉक्टरों को दोषी ठहराया है, जबकि PC-PNDT एक्ट से जुड़े आरोपों में निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा है।