Cg news ।छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के फिंगेश्वर विकासखंड में शिक्षा विभाग से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितता का गंभीर मामला सामने आया है।

आरोप है कि वर्ष 2018 में योजना बंद होने के बाद भी उससे जुड़े बैंक खाते संचालित होते रहे और अगले सात वर्षों में अलग-अलग किस्तों में करीब 63 लाख रुपये निकाल लिए गए। हैरानी की बात यह है कि निकाली गई इस राशि का उल्लेख विभागीय कैशबुक, कैश रजिस्टर और अन्य सरकारी अभिलेखों में नहीं मिला है। शिकायत के बाद कलेक्टर ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं।

जानकारी के मुताबिक, सर्व शिक्षा अभियान के तहत वर्ष 2015-16 और 2016-17 में शिक्षाकर्मियों के एरियर्स भुगतान के लिए करीब तीन करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे।

एक जुलाई 2018 को शिक्षाकर्मियों का संविलियन होने के बाद संबंधित बैंक खातों में लगभग एक करोड़ 35 लाख रुपये शेष रह गए थे। नियमानुसार योजना से बची राशि शासन को वापस लौटाई जानी थी और इसके बाद संबंधित बैंक खाते बंद किए जाने थे। लेकिन आरोप है कि न तो राशि शासन को लौटाई गई और न ही बैंक खाते बंद किए गए।

शिकायत में सामने आए विवरण के अनुसार, वर्ष 2018 से 2025 के बीच इन खातों से अलग-अलग तारीखों में कई किस्तों के जरिए करीब 63 लाख रुपये की निकासी हुई। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब योजना बंद हो चुकी थी, तब उसके बैंक खाते किसके निर्देश पर संचालित होते रहे?

किसकी अनुमति से लाखों रुपये निकाले गए और इन लेन-देन का हिसाब विभागीय रिकॉर्ड में क्यों दर्ज नहीं किया गया?

इस मामले को लेकर शिकायतकर्ता ने कलेक्टर जनदर्शन में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत को गंभीरता से लेते हुए गरियाबंद कलेक्टर ने जांच के निर्देश दिए हैं। वहीं, जिला शिक्षा अधिकारी ने भी मामले की पड़ताल के लिए पांच सदस्यीय जांच टीम गठित किए जाने की जानकारी दी है।

जिला शिक्षा अधिकारी के मुताबिक, टीम पूरे मामले की बारीकी से जांच कर रही है। जांच पूरी होने के बाद रिपोर्ट कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी।

अधिकारियों का कहना है कि जांच में यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है और वित्तीय अनियमितता की पुष्टि होती है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की जाएगी। फिंगेश्वर विकासखंड में संबंधित अवधि के दौरान पदस्थ रहे जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। फिलहाल जांच रिपोर्ट का इंतजार है, जिसके बाद ही 63 लाख रुपये की निकासी और सरकारी रिकॉर्ड में उसका हिसाब नहीं मिलने की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।