ssc/एसएससी भर्ती घोटाले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ‘रैंक जंपिंग’ के जरिए नौकरी पाने वाले उम्मीदवारों को नई भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह पूरा मामला भ्रष्टाचार का गंभीर उदाहरण है और पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा दिया गया निर्णय पूरी तरह से सही और वैध था। इसके साथ ही 2016 की पूरी भर्ती प्रक्रिया को रद्द कर दिया गया है, जिससे लगभग 25,752 शिक्षकों की नौकरियां चली गई हैं।

‘रैंक जंपिंग’ का अर्थ है कि परीक्षा में कम अंक या मेरिट में पीछे रहने के बावजूद किसी ने प्रभाव या भ्रष्ट तरीकों से खुद को ऊपर के पदों पर नियुक्त करा लिया। कोर्ट ने ऐसे सभी मामलों को “अयोग्यता” और “भ्रष्टाचार” की श्रेणी में रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वे लोग जो इस तरह से नौकरी पर लगे थे, वे दोबारा परीक्षा देने या नई भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने के हकदार नहीं हैं।

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति केबी विश्वनाथन की खंडपीठ ने की, जिन्होंने कहा कि पूर्व में न्यायमूर्ति संजीव खन्ना द्वारा दिए गए आदेश में कोई त्रुटि नहीं है और उसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।

अदालत ने यह भी कहा कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और योग्यता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। भर्ती प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की धांधली न सिर्फ योग्य उम्मीदवारों के अधिकारों का हनन है, बल्कि यह देश की शिक्षा व्यवस्था में जनता के विश्वास को भी चोट पहुंचाता है।

जिन अभ्यर्थियों को नौकरी मिली थी, उनमें से कुछ ने तर्क दिया कि उन्होंने परीक्षा पास की थी, पैनल में उनका नाम था और उन्होंने किसी तरह की धोखाधड़ी नहीं की है। लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भर्ती पैनल ही भ्रष्ट था, और उस पर आधारित कोई भी नियुक्ति वैध नहीं मानी जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, अब तीन महीनों के भीतर नई भर्ती प्रक्रिया शुरू की जाएगी। लेकिन अयोग्य करार दिए गए किसी भी पूर्व नियुक्त अभ्यर्थी को इसमें भाग लेने की अनुमति नहीं होगी। इसमें वे लोग शामिल हैं जिन्होंने श्वेत पत्र देकर नौकरी पाई, पैनल के बाहर या अवधि समाप्त होने के बाद नियुक्त हुए, या जिन्होंने रैंक जंपिंग के जरिए पद हासिल किए।