बलरामपुर-रामानुजगंज (पृथ्वीलाल केशरी)। एनएच-343 पर सड़क की बदहाली को लेकर सवाल पहले से उठते रहे हैं, लेकिन अब सामने आई एक कथित कैश-बुक और वायरल ऑडियो ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है। कैश-बुक में कुल 11 लाख 39 हजार रुपए खर्च होने का हिसाब दर्ज दिखाई दे रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें जेई, एसडीओ, एक्सईएन, एसई, एई, एसडीएम, टीआई और एसपी (बलरामपुर) जैसे पदों के सामने भी रकम लिखी गई है। इन पदों के सामने दर्ज रकम करीब 9 लाख 95 हजार रुपए बैठती है।

फोटो में दर्ज हिसाब के मुताबिक 13 फरवरी को जेई और एसडीओ के सामने एक-एक लाख रुपए लिखे हैं। 23 फरवरी को एक्सईएन के सामने एक लाख और एसपी (बलरामपुर) के सामने 15 हजार रुपए दर्ज हैं। 27 फरवरी को एसई के नाम पर एक लाख रुपए तथा 28 फरवरी को टीआई (रामानुजगंज) के सामने 10 हजार और फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के नाम पर 25 हजार रुपए लिखे हैं।

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सबसे बड़ी रकम 2 मार्च की बताई गई है। इस दिन जेई, एई और एक्सईएन के सामने डेढ़-डेढ़ लाख रुपए, जबकि अकाउंटेंट के सामने 75 हजार रुपए दर्ज दिखाई देते हैं। एक मार्च की प्रविष्टि में एसडीएम के सामने 20 हजार रुपए लिखे हैं।

यानी सवाल सीधा है—अगर यह कंपनी की असली कैश-बुक है तो सरकारी पदों के नाम पर इतनी रकम किस लिए लिखी गई? पैसा किसे दिया गया? किसके कहने पर दिया गया? और उसका हिसाब किस आधार पर रखा गया?

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अफसरों के बाद ‘मीडिया’ के नाम पर भी रकम

कथित कैश-बुक में केवल अधिकारी और विभाग ही नहीं हैं। इसमें जर्नलिस्ट के नाम पर 12 हजार और मीडिया के नाम पर 12 हजार 500 रुपए भी दर्ज दिखाई देते हैं। 29 जनवरी को ‘फॉरेस्ट पेनाल्टी’ के नाम पर 1 लाख 19 हजार 500 रुपए तथा 28 फरवरी को फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के नाम पर 25 हजार रुपए का उल्लेख है।

अब सवाल यह है कि यह रकम वास्तव में खर्च हुई थी या सिर्फ हिसाब में लिखी गई? यदि भुगतान हुआ तो किसे हुआ और किस काम के लिए हुआ? बिल, रसीद और भुगतान का रिकॉर्ड सामने आने पर ही इस कथित हिसाब की असली तस्वीर साफ होगी।

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वायरल ऑडियो ने बढ़ाई सनसनी

कथित कैश-बुक के साथ वायरल ऑडियो ने मामले को और गंभीर बना दिया है। बताया जा रहा है कि ऑडियो में एनएच-343 से जुड़े एक पूर्व कर्मचारी और एक अज्ञात व्यक्ति के बीच बातचीत है। बातचीत में भुगतान को लेकर परेशानी, श्रम विभाग में शिकायत और शिकायत के बाद कुछ भुगतान होने जैसे संदर्भ होने का दावा किया जा रहा है।

ऑडियो में निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और भुगतान को लेकर भी कथित बातचीत होने की चर्चा है। ऐसे में कैश-बुक और ऑडियो एक साथ सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या दोनों के बीच कोई कड़ी है या ये अलग-अलग मामले हैं?

फिलहाल वायरल ऑडियो और कथित कैश-बुक की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए ऑडियो में कही गई बातों या कैश-बुक में दर्ज रकम को सीधे भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं कहा जा सकता। लेकिन सरकारी पदों के सामने लाखों रुपए दर्ज होने का सवाल इतना बड़ा जरूर है कि इसकी जांच से बचना आसान नहीं होगा।

सड़क पर गड्ढे, हिसाब में लाखों

वायरल दावों के बीच एनएच-343 की जमीनी हालत भी सवालों को और धार देती है। बारिश के बाद रामानुजगंज-बलरामपुर मार्ग के कई हिस्सों में गड्ढे, कीचड़ और खराब सड़क सतह से लोगों को परेशानी हो रही है। निर्माणाधीन हिस्सों में वाहनों की रफ्तार घट गई है और कई जगह आवागमन मुश्किल हो गया है।

एक तरफ सड़क की यह हालत और दूसरी तरफ 11.39 लाख रुपए के खर्च का कथित हिसाब सामने आने के बाद सवाल और तीखा हो गया है—सड़क पर पैसा कितना लगा और आखिर गया कहां?

नाली में वाइब्रेटर की जगह लकड़ी?

निर्माण कार्य से जुड़े कुछ कथित वीडियो और दावों में नाली निर्माण के दौरान कंक्रीट को दबाने के लिए वाइब्रेटर मशीन की जगह लकड़ी के इस्तेमाल की बात कही जा रही है। सीमेंट और दूसरी निर्माण सामग्री की गुणवत्ता को लेकर भी वायरल ऑडियो में कथित चर्चा होने का दावा है।

अगर मौके पर ऐसा ही काम हुआ है तो सवाल केवल निर्माण करने वाली कंपनी तक सीमित नहीं रहेगा। सवाल यह भी होगा कि काम देखने वाले जिम्मेदार लोग मौके पर क्या देख रहे थे और खराब काम को रोका क्यों नहीं गया?

खुलना चाहिए 11.39 लाख का राज

एनएच-343 पर अब तीन तस्वीरें एक साथ दिखाई दे रही हैं—बदहाल सड़क, निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल और 11.39 लाख रुपए की कथित कैश-बुक। इसके साथ वायरल ऑडियो ने मामले को और गरमा दिया है।

जांच में सबसे पहले यह साफ होना चाहिए कि कैश-बुक असली है या नहीं। अगर असली है तो जेई, एसडीओ, एक्सईएन, एसई, एई, एसडीएम, टीआई और एसपी जैसे पदों के सामने दर्ज रकम किसे और क्यों दी गई? क्या इन पैसों के बिल या रसीद हैं? क्या संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी थी? और वायरल ऑडियो में कही जा रही बातों का इस कथित हिसाब से कोई संबंध है या नहीं?

एनएच-343 की सड़क पर गड्ढे पहले से दिख रहे थे, अब कथित कैश-बुक ने हिसाब में भी गड्ढा खोजने का मौका दे दिया है। सवाल सिर्फ सड़क का नहीं है। सवाल उस पूरे सिस्टम का है, जहां सड़क की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं और दूसरी तरफ अधिकारियों व विभागों के नाम के सामने लाखों रुपए का कथित हिसाब दिखाई दे रहा है।

फिलहाल वायरल ऑडियो और कथित कैश-बुक की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन मामला इतना गंभीर जरूर है कि अब खानापूर्ति नहीं, बल्कि यह पता लगाना जरूरी है कि 11.39 लाख रुपए की इस कथित कहानी में सच कितना है और ‘हिसाब’ के पीछे छिपा खेल क्या है।