बिलासपुर… देश के प्रमुख केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में शामिल गुरु घासीदास विश्वविद्यालय की लगभग पांच एकड़ जमीन को लेकर अचानक ऐसा विवाद खड़ा हो गया, जिसने प्रदेश भर में चर्चा छेड़ दी। पहले यह खबर सामने आई कि विश्वविद्यालय ने अग्रवाल समाज को पांच एकड़ जमीन देने का फैसला किया है और प्रस्ताव को स्टैंडिंग कमेटी के समक्ष रखा जाना है। खबर सामने आते ही मामला तूल पकड़ गया। इसके बाद विश्वविद्यालय प्रबंधन ने स्पष्ट किया कि किसी संस्था को जमीन देने का न तो कोई निर्णय हुआ है और न ही विश्वविद्यालय के पास ऐसा अधिकार है। दूसरी ओर, अग्रवाल समाज ने कहा कि उसने जमीन स्वामित्व के लिए नहीं, बल्कि हरियाली विकसित करने और ‘अग्रसेन वाटिका’ बनाने के उद्देश्य से स्थान उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था।

गुरु घासीदास विश्वविद्यालय देश के प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शामिल है। सैकड़ों एकड़ परिसर में संचालित यह संस्थान अनेक विषयों और शोध गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है। समय-समय पर विभिन्न सामाजिक संस्थाएं विश्वविद्यालय के साथ जनहित और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यक्रमों में भागीदारी करती रही हैं। इसी बीच अग्रवाल समाज द्वारा परिसर के एक हिस्से में हरित क्षेत्र विकसित करने का प्रस्ताव चर्चा का विषय बन गया।

जमीन देने’ की खबर के बाद बढ़ी हलचल

विश्वविद्यालय परिसर की पांच एकड़ जमीन को लेकर खबर सार्वजनिक होते ही छात्र, शिक्षकों और सामाजिक संगठनों में चर्चा शुरू हो गई। सवाल उठने लगे कि क्या किसी सामाजिक संस्था को विश्वविद्यालय की भूमि उपलब्ध कराई जा सकती है। बढ़ती चर्चाओं के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन ने पूरे घटनाक्रम पर अपना पक्ष रखा।

कुलपति बोले—जमीन देने का सवाल ही नहीं

विश्वविद्यालय के कुलपति चक्रवाल ने स्पष्ट कहा कि पांच एकड़ जमीन अग्रवाल समाज को देने संबंधी खबर पूरी तरह भ्रामक है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय किसी भी संस्था को भूमि हस्तांतरित नहीं कर सकता और न ही ऐसा कोई निर्णय लिया गया है।

कुलपति ने कहा, “जब जमीन दी ही नहीं गई और विश्वविद्यालय के पास देने का अधिकार भी नहीं है, तब किसी तरह के आवंटन या सैद्धांतिक स्वीकृति का प्रश्न ही नहीं उठता।”

मीडिया प्रभारी ने बताया क्या है प्रस्ताव

विश्वविद्यालय के मीडिया प्रभारी एवं प्राध्यापक डॉ. मनीष श्रीवास्तव ने बताया कि अग्रवाल समाज ने विश्वविद्यालय की खाली पड़ी भूमि पर हरियाली विकसित करने और पौधारोपण करने का प्रस्ताव दिया था। उन्होंने कहा कि यदि किसी सामाजिक संस्था की मदद से परिसर में हरित क्षेत्र विकसित होता है तो उसका लाभ विद्यार्थियों और विश्वविद्यालय परिसर को मिलेगा।

डॉ. श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि न तो किसी प्रकार का भूमि आवंटन हुआ है, न निर्माण की अनुमति दी गई है और न ही स्वामित्व से जुड़ा कोई निर्णय लिया गया है।

अग्रवाल समाज…अग्रसेन वाटिका’ बनाएंगे

अग्रवाल महासम्मेलन के प्रांतीय महासचिव महेश अग्रवाल ने कहा कि समाज ने विश्वविद्यालय से जमीन खरीदने या अपने अधिकार में लेने की मांग नहीं की है। उनका कहना है कि समाज केवल खाली पड़ी भूमि पर पौधारोपण कर हरित क्षेत्र विकसित करना चाहता है।

महेश अग्रवाल के अनुसार, विकसित होने वाली वाटिका का नाम ‘अग्रसेन वाटिका’ रखने का प्रस्ताव रखा गया है। उन्होंने कहा कि वहां किसी भवन या अन्य स्थायी निर्माण की योजना नहीं है। हरियाली विकसित करने के बाद उसका रखरखाव विश्वविद्यालय के अधीन रहेगा।

नामकरण पर भी उठ रहे सवाल

हालांकि निर्माण से दोनों पक्षों ने इनकार किया है, लेकिन प्रस्तावित ‘अग्रसेन वाटिका’ नाम को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि यदि भूमि विश्वविद्यालय की है, तो किसी सामाजिक संस्था के नाम पर उसका नामकरण किस प्रक्रिया के तहत होगा। इस संबंध में विश्वविद्यालय की ओर से अभी कोई औपचारिक निर्णय सार्वजनिक नहीं किया गया है।

फिलहाल पांच एकड़ जमीन को लेकर शुरू हुआ यह विवाद केवल भूमि तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि केंद्रीय विश्वविद्यालय की परिसंपत्तियों के उपयोग, सामाजिक भागीदारी और प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर भी बहस का विषय बन गया है। आने वाले दिनों में विश्वविद्यालय की ओर से होने वाले किसी भी औपचारिक निर्णय पर सबकी निगाहें रहेंगी।