बिलासपुर… शिक्षा व्यवस्था सुधारने और शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त कराकर स्कूलों में वापस भेजने के लिए सरकार और डीपीआई स्तर पर निर्देश जारी होते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर प्रशासनिक व्यवस्था इन आदेशों को कितनी गंभीरता से ले रही है, इसकी तस्वीर बिलासपुर में सामने आए एक मामले से साफ होती है। एक तरफ शिक्षकों का अटैचमेंट खत्म करने के आदेश जारी किए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ कुछ ही समय बाद उन्हीं शिक्षकों को फिर कार्यालयों में बुलाकर गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगा दिया जा रहा है। सवाल यह है कि जब अटैचमेंट खत्म ही करना है तो फिर यह वापसी का रास्ता किसलिए खुला रखा गया है?

ताजा मामला तहसील कार्यालय में लंबे समय से अटैच रहे सहायक शिक्षक निशांत वर्मा का है। डीपीआई के निर्देश के बाद उन्हें मूल शाला में वापस भेजा गया था, लेकिन यह व्यवस्था डेढ़ महीने भी कायम नहीं रह सकी। बिलासपुर एसडीएम कार्यालय ने 30 अक्टूबर को आदेश जारी कर उन्हें मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण कार्य के लिए फिर कार्यालय में बुला लिया। इससे पहले निशांत वर्मा तहसील कार्यालय के रिकॉर्ड रूम का काम संभाल रहे थे। यानी जिस गैर-शैक्षणिक कार्य से शिक्षकों को मुक्त करने के लिए आदेश जारी हुए, उसी व्यवस्था में उनकी दोबारा वापसी हो गई।

इसी तरह सहायक शिक्षक बाबूलाल तिवारी को भी मूल स्कूल भेजा गया था। इसके बावजूद कार्यालयीन जरूरतों के नाम पर शिक्षकों की सेवाएं फिर लेने का सिलसिला सवाल खड़े कर रहा है। मतदाता सूची पुनरीक्षण जैसे महत्वपूर्ण कार्य के लिए कर्मचारियों की जरूरत अपनी जगह है, लेकिन क्या इसके लिए शिक्षा विभाग के शिक्षकों को ही बार-बार स्कूलों से बाहर करना जरूरी है? क्या दूसरे विभागों के कर्मचारियों से यह काम नहीं लिया जा सकता?

एक आदेश से अटैचमेंट खत्म, दूसरे से बहाल!

मामला सिर्फ दो शिक्षकों तक सीमित नहीं है। जानकारी के मुताबिक, जिले में अब भी कई शिक्षक अलग-अलग विभागों के कार्यालयों और छात्रावासों में अटैच रहकर काम कर रहे हैं। कुछ को मूल शाला भेजने के बाद भी दूसरे कार्यालयों में उनकी सेवाएं ली जा रही हैं। ऐसे में डीपीआई के निर्देशों की वास्तविक स्थिति और उनके पालन की जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है। यदि प्रशासनिक जरूरतों के नाम पर शिक्षकों को बार-बार मूल शाला से हटाया जाता रहेगा तो अटैचमेंट समाप्त करने के आदेश महज कागजी कवायद बनकर रह जाएंगे।

फायदा कार्यालयों को, नुकसान बच्चों को

शिक्षकों को स्कूलों से हटाकर कार्यालयों में बैठाने की इस व्यवस्था का सबसे बड़ा खामियाजा उन बच्चों को भुगतना पड़ता है, जिनकी पढ़ाई की जिम्मेदारी शिक्षकों पर है। एक शिक्षक जब रिकॉर्ड रूम या किसी दूसरे कार्यालय का काम संभालता है तो उसकी कक्षा खाली होती है। उसका असर सीधे विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ता है। विडंबना यह है कि जिन स्कूलों में पहले से शिक्षकों की कमी है, वहां उपलब्ध शिक्षकों को भी गैर-शैक्षणिक कामों में लगा दिया जाता है। इसका फायदा भले ही कार्यालयीन व्यवस्था को मिल जाए, लेकिन नुकसान उन बच्चों का होता है जिनका भविष्य नियमित पढ़ाई पर निर्भर है।

शिक्षक संगठनों की ओर से भी लंबे समय से शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त कर मूल शालाओं में पदस्थ करने की मांग उठाई जाती रही है। ऐसे में सरकार के निर्देशों के बावजूद अटैचमेंट का सिलसिला जारी रहना प्रशासनिक मंशा और जमीनी अमल के बीच अंतर को उजागर करता है।

अब सवाल जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग से है कि आखिर अटैचमेंट समाप्त करने के आदेशों का पालन कौन सुनिश्चित करेगा? क्या कार्यालयों में शिक्षकों की जरूरत स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई से बड़ी हो गई है? और यदि अटैचमेंट खत्म करने का फैसला लिया जा चुका है तो फिर अपवाद के नाम पर उसी व्यवस्था को दोबारा जिंदा क्यों किया जा रहा है? प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि जिले में कितने शिक्षक अब भी गैर-शैक्षणिक कार्यों में अटैच हैं और उन्हें मूल शालाओं में वापस भेजने की समयसीमा क्या है।