बिलासपुर।सड़क सुरक्षा को लेकर पुलिस कप्तान ने मंगलवार को अपनी बात रखी थी उसमें यह साफ संदेश दिया था कि नशे में ड्राइविंग और लापरवाही अब कतई बर्दाश्त नहीं होगी। उन्होंने चेताया कि सड़क को मौत का मैदान बनाने वालों के लिए सीधे जेल तय है। बयान के बाद शहर में अभियान तेज दिख रहा है—नशे में गाड़ी चलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई, बिना हेलमेट चालकों पर लगातार चालान और जागरूकता कार्यक्रम जारी है..। लेकिन इसी बीच शहर में अभियान की दिशा को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

सोशल मीडिया और AI के दौर में अभिव्यक्ति की आज़ादी पहले से कहीं अधिक है। ऐसे में शहर में यह चर्चा तेज है कि बार- रेस्टोरेंट और सरकारी शराब दुकानों के आसपास शाम ढलते ही बढ़ती भीड़ और वहां खड़े वाहनों पर पुलिस की नजर कितनी प्रभावी है..। सवाल उठ रहा है कि कप्तान की चेतावनी के बावजूद इन स्थानों से निकलने वाले वाहनों की जांच क्या मुख्य चौराहों जैसी सख़्ती से हो रही है या नही..।

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सोशल मीडिया और शहर की चर्चाओं में यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि शराब बिक्री केंद्रों के आसपास पुलिस द्वारा अल्कोहल टेस्टर या ब्रीथेलाइज़र से जांच कम ही दिखाई देती है, जबकि नशे में ड्राइविंग की संभावना सबसे ज्यादा इन्हीं स्थानों पर रहती है। इसी के साथ यह मुद्दा भी उठ रहा है कि शहर में शराब की खपत के मुकाबले नशे में पकड़े गए चालकों की संख्या इतनी कम क्यों है। वाहनों की भीड़ और कार्रवाई के आंकड़ों के बीच यह अंतर सड़क सुरक्षा अभियान के असर पर सवाल खड़ा करता है।

देखा जाए तो पुलिस की सख़्ती और अभियान की रफ्तार को शहर में एक अच्छी पहल के रूप में देखा जा रहा है। कप्तान की सक्रियता भी लोगों को नजर आ रही है, लेकिन बार- अहातों के बाहर जांच कितनी होती है और वहां से निकलने वाले वाहनों पर वास्तविक कार्रवाई कैसी है..। इसी को लेकर बहस अभी भी जारी है।

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अब शहर की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में अभियान किन इलाकों तक पहुंचेगा और सख़्ती कितनी व्यापक होगी। कप्तान ने अपनी मंशा साफ कर दी है, पर लोग यह भी देखना चाहते हैं कि यह सख़्ती केवल चौराहों पर चमकेगी या उन दरवाजो तक भी जाएगी जहां से नशे में ड्राइविंग की सबसे ज्यादा शुरुआत होती है।

पुलिस कप्तान की बातों ने शहर में उम्मीद तो जगा दी है। बस लोग यह देखना चाहते हैं कि यह उम्मीद कहीं बार- अहातों की पार्किग में ठोकर खाकर वापस तो नहीं आ जाएगी। शहर इंतज़ार में है कि कप्तान का कड़ा रुख कागज और माइक तक नहीं, बल्कि हर उस मोड़ तक पहुंचे जहां हादसों की कहानी लिखी जाती है..।

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