बिलासपुर। हिंदी पखवाड़े के उपलक्ष में सांईआनंदम में “काव्य संध्या “का आयोजन किया गया ।इसमें शहर के जाने-माने कवि एवं कवयित्रियों ने काव्य पाठकर काव्य संध्या को सुरभित किया।

 

अध्यक्ष की आसंदी से वरिष्ठ साहित्यकार विजय कल्याणी तिवारी ने कहा- यह छोटी-छोटी गोष्ठियांँ ,हिंदी की संपत्ति को संचय करने का बड़ा माध्यम है।

इस अवसर पर उन्होंने पितृ पक्ष पर अपने पूर्वजों को याद करते हुए करुणा पूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की:-

 

आज सुबह से भाव

जगा है रोने का।

जो अपने थे

दुख है उनके खोने का।

 

व्यंगकार ओमप्रकाश भट्ट ने हिंदी से छद्म प्रेम करने वालों पर गहरा कटाक्ष किया:-

” साल भर में एक दिन

हिंदी दिवस जरूर मानाओ।

पर अपने बच्चों को

इंग्लिश मीडियम स्कूल में ही पढ़ाओ।”

वरिष्ठ कवि बुधराम यादव ने भारत-भूमि की वंदना करते हुए भाव व्यक्त किए कि जगतगुरु कहलाने वाली धरती, जहांँ वेद गीता ,रामायण जैसे स्वर फूटे इसका कण कण चंदन के समान है:-

“विश्व गुरु की अभिव्यक्ति का हिय से वंदन ।

जिस धरती से स्रव फूटे कण-कण उसका चंदन।”

 

वरिष्ठ कवि अमृतलाल पाठक ने राजनीतिज्ञों की धोखेबाज- नीतियों पर करारा प्रहार किया:-

 

” राजसत्ता हो किसी की

हम ठगे जाते रहे,

छूटता है धैर्य

जनता की हताशा देखिए ।”

 

गीत और गजल की कवयित्री श्रीमती मनीषा भट्ट ने हिंदी को महिमा मण्डित करते हुए अपनी रचना प्रस्तुत की:-

 

” भाषाओं के गगन में

सितारों सी तुम ।

दुनिया के चमन में

बहारों सी तुम ।”

 

गीतकार विनय पाठक ने अपने मधुर कण्ठ से गीत के माध्यम से संस्कारहीन होती नई पीढ़ी में संस्कार जागृत करने का आवाहन किया:-

 

” संस्कारों की कलम लगाएंँ

किरण बिखेरें नील गगन है ।

दीप स्नेह का जलता रहे

होगा तभी फिर दर्पदलन है।°

 

श्रृंगार के नवोदित गीतकार राकेश पाण्डेय ‘अयोध्या’ ने नायिका को संबोधित करते हुए कहा प्रेम एक से होता है वह हो चुका अब मेरे मन में किसी अन्य के लिए कोई अरमान नहीं।

 

” अंतिम था वह प्रेम निवेदन

अब कोई अरमान नहीं।

कितना प्रेम किया है तुमसे

यह तुमको अनुमान नहीं। ”

 

लोकप्रिय गीतकार जगतारण डाहिरे ने हिंदी के प्रति अपने हृदय का प्रेम इन शब्दों में प्रकट किया:-

 

” हमारी आन है हिंदी

हमारी शान है हिंदी।

हृदय में वास करती है

हमारी जान है हिंदी।”

 

कवि दिनेश तिवारी ने हिंदी के प्रति सौतेला व्यवहार करने वालों पर गहरा कटाक्ष किया जो हिंदी पर लच्छेदार भाषण देते हैं परंतु अपने बच्चों को विदेश में पढ़ाते हैं:-

 

” अदालत में अंग्रेजी में

वहस होती है ।

तब हिंदीकी आत्मा रोती है ।

वे हिंदी के वकालत करते हैं

पर बच्चे लंदन में पढ़ते हैं।”

 

डॉ.श्रीमती सर्वेश पाठक ने नेपाल में आए जल प्रलय पर वर्षा को फटकार लगाते ये पंक्तियां पढ़ीं-

 

” जग तो छलता है

तू भी छलती है ।

बादल को छोड़

पर्वत पर बरसती है।”

 

गोष्टी के अंत में अध्यक्ष विजय तिवारी जी ने सभी रचनाकारों की रचनाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणी की।

कार्यक्रम का सफल संचालन ओम प्रकाश भट्ट ने और आभार प्रदर्शन राकेश पांडेय ने किया।