बिलासपुर… तंबाकू उत्पादों की बिक्री रोकने के लिए जिले में अब तक करीब 285 चालानी कार्रवाई की जा चुकी है। स्कूल-कॉलेजों के 100 गज के दायरे में तंबाकू उत्पाद बेचने वालों पर कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए हैं। यह पहल जरूरी है, लेकिन नशे के खिलाफ अभियान की असली जरूरत इससे कहीं व्यापक है। सवाल यह है कि स्कूलों के आसपास की दुकानों की जांच तो हो रही है, लेकिन शहर के दूसरे हिस्सों में चल रही पान दुकानों और छोटे बिक्री केंद्रों में बिकने वाले नशीले उत्पादों की नियमित जांच कौन करेगा?

राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम की जिला स्तरीय समन्वय समिति की बैठक में सिगरेट एवं अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 के प्रभावी क्रियान्वयन की समीक्षा की गई। जिले के करीब 850 शैक्षणिक संस्थानों में धूम्रपान निषेध बोर्ड लगाए जाने की जानकारी दी गई है। सार्वजनिक स्थलों और शैक्षणिक संस्थानों के आसपास नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई जारी रखने के निर्देश भी दिए गए हैं।

लेकिन शहर में नशे की तस्वीर केवल स्कूलों के आसपास तक सीमित नहीं है। कलेक्ट्रेट और दूसरे सरकारी कार्यालयों के आसपास, बाजारों में और शहर के अलग-अलग हिस्सों में संचालित पान दुकानों की भी नियमित जांच की जरूरत है। खासकर ऐसी दुकानों को जांच के दायरे में लाना जरूरी है, जहां तंबाकू के अलावा दूसरे नशीले उत्पादों की बिक्री की शिकायतें सामने आती रही हैं।

मधु-मुनक्का जैसे उत्पाद भी जांच के दायरे में आएं

स्थानीय स्तर पर पान दुकानों में मधु-मुनक्का जैसी हल्के नशे वाली गोलियों अथवा उत्पादों की बिक्री की शिकायतें सामने आती रही हैं। इन उत्पादों में किसी नशीले या प्रतिबंधित पदार्थ की मिलावट है या नहीं, इसकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है। इसलिए केवल शिकायतों को नजरअंदाज करने के बजाय संबंधित विभागों को ऐसे उत्पादों के नमूने लेकर उनकी जांच करनी चाहिए। क्योंकि स्कूल से दूर के पान दुकानदार अपने पान के घूमती में बाग में मधु मुनक्का जैसे जहरीला उत्पाद छुपा कर रखते हैं जिनकी कीमत बहुत कम होती है और यह सहज में कम कीमत में उपलब्ध है नशे का सबसे जहरीला उत्पाद पीडिया को बर्बाद कर रहा है

यही जांच यह भी स्पष्ट कर सकती है कि दुकानों पर वास्तव में कौन-कौन से नशीले उत्पाद बिक रहे हैं और उनमें किसी प्रतिबंधित अथवा स्वास्थ्य के लिए खतरनाक पदार्थ का इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है। यदि कहीं मिलावट या प्रतिबंधित पदार्थ की पुष्टि होती है तो उसके बाद कानून के तहत कार्रवाई का रास्ता भी साफ होगा।

स्कूलों से बाहर भी उतनी ही सख्ती जरूरी

स्कूलों और महाविद्यालयों के 100 गज के दायरे में कार्रवाई जरूरी है, क्योंकि वहां बच्चों और किशोरों की आवाजाही रहती है। लेकिन केवल इसी दायरे में कार्रवाई कर अभियान को सफल नहीं माना जा सकता। यदि स्कूलों से दूर बेशक तंबाकू की उत्पादन पर प्रतिबंध न लगे तो भी कम से कम जांच पड़ताल कर यह तो सुनिश्चित किया जाए कि दुकानदार मधु मुनक्का या भांग की गोली तो नहीं बेच रहे हैं । इसलिए शहर की सामान्य पान दुकानों, घूमती दुकानों, ठेलों और दूसरे बिक्री केंद्रों को भी जांच के दायरे में लाना होगा।

कई बार अभियान के दौरान कार्रवाई तेज होती है, चालान काटे जाते हैं और कुछ समय तक निगरानी भी दिखाई देती है। इसके बाद अभियान की रफ्तार कम होते ही व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौटने की शिकायतें सामने आती हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि कहीं कार्रवाई कुछ समय की रस्म अदायगी बनकर तो नहीं रह जाती? कार्रवाई के बाद उसी जगह पर फिर वही उत्पाद बिकने लगें तो अभियान का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

285 चालान से आगे भी देखना होगा

285 चालानी कार्रवाई निश्चित रूप से कार्रवाई का एक आंकड़ा है, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी सामने आना चाहिए—इन कार्रवाई के बाद कितनी दुकानों की दोबारा जांच हुई? कितने स्थानों पर फिर उल्लंघन मिला? कितनी दुकानों पर बार-बार कार्रवाई करनी पड़ी? और शहर के उन पान दुकानों की कितनी जांच हुई, जहां स्कूल या कॉलेज आसपास नहीं हैं? वहां क्या बेचा जा रहा है इसका तो पता लगाया जा सकता है।

नशे के खिलाफ अभियान को केवल स्कूलों के 100 गज के दायरे तक सीमित रखने के बजाय पूरे शहर में बिक्री केंद्रों की जांच का दायरा बढ़ाना जरूरी है। पान दुकान चाहे स्कूल के सामने हो, कलेक्ट्रेट के आसपास हो, बाजार में हो या किसी गली-मोहल्ले में—यदि वहां  किसी गंभीर किस्म की नशीले उत्पाद की बिक्री हो रही है तो नियमों के अनुसार उसकी जांच होनी चाहिए। कहीं दुकानदार मधु मुनक्का जैसी जहरीला उत्पाद तो नहीं बेच रहा है।

आखिर नशा स्कूल की सीमा देखकर असर नहीं करता, फिर निगरानी की सीमा केवल स्कूलों तक क्यों रहे? यही वह सवाल है जिसका जवाब प्रशासनिक अभियान को जमीन पर देना होगा।