रामानुजगंज (पृथ्वी लाल केशरी)…जनपद पंचायत रामचंद्रपुर के ग्राम पंचायत तेतरडीह में कृषि विभाग के बांध के टूटने से आसपास के किसानों की धान की फसल बर्बाद हो गई। ग्रामीणों का आरोप है कि बांध में दरार पड़ने की जानकारी संबंधित विभाग को समय रहते दे दी गई थी, लेकिन मरम्मत नहीं कराई गई। अब बांध टूटने के बाद प्रशासन नुकसान का आकलन कराने की बात कह रहा है। सवाल यह है कि जब खतरे की सूचना पहले ही मिल चुकी थी, तब प्रशासन ने खतरा टालने के लिए क्या किया?

बारिश के बाद बांध में पानी भरने से दरार बढ़ती गई। ग्रामीणों ने इसकी सूचना विभाग तक पहुंचाई, लेकिन मौके पर जरूरी मरम्मत नहीं हुई। आखिरकार बांध टूट गया और पानी आसपास के खेतों में फैल गया। किसानों की खड़ी धान की फसल बर्बाद हो गई। अब प्रशासनिक अमला नुकसान का आकलन करने पहुंच रहा है, जबकि किसानों का सवाल है कि समय रहते बांध की मरम्मत करा दी जाती तो नुकसान की नौबत ही क्यों आती?

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मानसून से पहले तैयारी आखिर किस बात की ?

तेतरडीह की घटना ने जिला प्रशासन की मानसून पूर्व तैयारियों पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। हर साल बारिश से पहले जिला स्तर पर बैठकें होती हैं। बांध, जलाशय, नालों, सड़कों और संवेदनशील स्थानों की स्थिति की समीक्षा होती है। अधिकारियों को आवश्यक तैयारियां पूरी करने के निर्देश दिए जाते हैं। फिर सवाल उठता है कि इन बैठकों का जमीन पर असर आखिर कहां दिखाई देता है?

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क्या मानसून पूर्व बैठकें सिर्फ कागजों में तैयारियां पूरी दिखाने, फोटो खिंचाने और नाश्ता-पानी तक सीमित रह गई हैं? यदि वास्तव में तैयारी होती है तो जिस बांध में बारिश के बाद दरार दिखाई दे रही थी, उसकी जानकारी मिलने के बाद भी मरम्मत क्यों नहीं हुई? जिला प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि मानसून से पहले ऐसे जलस्रोतों और बांधों का निरीक्षण किस स्तर पर हुआ था और उनकी सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए थे।

नुकसान के बाद आकलन, रोकथाम क्यों नहीं?

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प्रशासन का कहना है कि नुकसान का वास्तविक आंकड़ा आकलन के बाद सामने आएगा। यह प्रक्रिया जरूरी है, लेकिन इससे बड़ा सवाल रोकथाम का है। किसान जब पहले ही खतरे की सूचना दे रहे थे, तब प्रशासन और संबंधित विभाग ने उस चेतावनी को गंभीरता से क्यों नहीं लिया? अब यदि फसल बर्बाद होने के बाद केवल मुआवजे और आकलन तक कार्रवाई सीमित रहती है तो उस लापरवाही की जवाबदेही कौन तय करेगा?

ग्रामीणों का आरोप है कि एक ओर सरकार किसानों के हित में बेहतर कृषि व्यवस्था और सिंचाई सुविधाओं का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर अफसरशाही और कथित लापरवाही के कारण किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। तेतरडीह की घटना इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यहां नुकसान अचानक आई किसी प्राकृतिक आपदा का ही परिणाम नहीं, बल्कि ग्रामीणों के अनुसार पहले से दिखाई दे रहे खतरे पर समय रहते कार्रवाई नहीं होने का नतीजा है।

अब जिला प्रशासन के सामने दोहरी जिम्मेदारी है—एक तरफ प्रभावित किसानों को तत्काल राहत और फसल नुकसान का उचित आकलन, दूसरी तरफ यह तय करना कि दरार की सूचना मिलने के बाद बांध की मरम्मत क्यों नहीं हुई और मानसून पूर्व तैयारियों के बावजूद यह स्थिति क्यों बनी। आखिर बैठकों में तय तैयारियां जमीन पर कब उतरेंगी, यह सवाल तेतरडीह के किसान जिला प्रशासन से पूछ रहे हैं।