दिल्ली/कांग्रेस ने रेल मंत्रालय द्वारा महापर्व छठ के दौरान 12 हजार ट्रेन चलाने के केन्द्र सरकार के ऐलान पर सवाल उठाया है।कांग्रेस सोशल मीडिया हेड सुप्रिया श्रीनेत ने सवाल किया, ‘ रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव डींगे हाँक रहे थे कि त्यौहार पर 12 हज़ार ट्रेनें चलायी जा रही हैं।

भगवान ही जानें कहाँ चलीं यह ट्रेन क्योंकि लोग अभी भी भेड़ बकरी की तरह जिस तरह से रेल के डिब्बों में लोग ठूंस कर घर जाने को मजबूर हैं।

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उन्होंने रेल मंत्री को ‘रील मंत्री’ बताते हुए कहा कि वह एसी वाले यात्रियों के लिए प्रिंटेड कंबल का अनावरण करने में व्यस्त हैं जनता परेशान हो इससे उन्हें क्या ?’

श्रीमती श्रीनेत ने कहा कि लोगों के लिए होली, दिवाली, छठ जैसे पर्व बड़े मायने रखते हैं और उनकी सरकार से क्या अपेक्षा होती है। यही ना कि आवा-गमन की उचित व्यवस्था हो जाये। पर्याप्त ट्रेन, सही दाम पर चल जाएँ जो लोगों को उनके गंतव्य तक पहुँचा दें, लेकिन सरकार बहादुर को लफ़्फ़ाज़ी से फुर्सत नहीं है।

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कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा है कि रेल मंत्री ने त्योहारी सीजन में 12000 विशेष ट्रेनें चलाने की बात कही थी लेकिन ठसाठस भरी और अमानवीय सफर ने डबल इंजन सरकार की पोल खोल कर रख दी है।

श्री गांधी ने शनिवार को सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि बिहार के लोगों के लिए त्योहारी सीजन में घर लौटना घर, परिवार और गांव से अपनेपन की लालसा का प्रतीक है लेकिन उनके लिए अपने घर जाना एक बड़ा संघर्ष बन गया है। बिहार जाने वाली हर रेलगाड़ी में क्षमता से दो गुना लोग ठूंस-ठूंस कर भेजे जा रहे हैं। घर जाने की है यह यात्रा एक तरह से अमानवीय यात्रा हो गई है और 12 000 स्पेशल ट्रेन चलाने की डबल इंजन सरकार के दावे खोखले साबित हो गए हैं।

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कांग्रेस नेता ने कहा, “त्योहारों का महीना है-दिवाली, भाईदूज, छठ। बिहार में इन त्योहारों का मतलब सिर्फ़ आस्था नहीं, घर लौटने की लालसा है-मिट्टी की खुशबू, परिवार का स्नेह, गांव का अपनापन लेकिन यह लालसा अब एक संघर्ष बन चुकी है। बिहार जाने वाली ट्रेनें ठसाठस भरी हैं, टिकट मिलना असंभव है और सफ़र अमानवीय हो गया है। कई ट्रेनों में क्षमता से 200 फीसदी तक यात्री सवार हैं- लोग दरवाज़ों और छतों तक लटके हैं।फेल डबल इंजन सरकार के दावे खोखले हैं।”

कांग्रेस नेता ने सरकार से पूछा कि कहां हैं 12,000 स्पेशल ट्रेनें। क्यों हालात हर साल और बदतर ही होते जाते हैं। क्यों बिहार के लोग हर साल ऐसे अपमानजनक हालात में घर लौटने को मजबूर हैं। अगर राज्य में रोज़गार और सम्मानजनक जीवन मिलता, तो उन्हें हज़ारों किलोमीटर दूर भटकना नहीं पड़ता। ये सिर्फ़ मजबूर यात्री नहीं, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की धोखेबाज़ नीतियों और नियत का जीता-जागता सबूत हैं। यात्रा सुरक्षित और सम्मानजनक हो यह अधिकार है, कोई एहसान नही।