दिल्ली। भारत में बचत और सुरक्षित निवेश की जब बात आती है, तो फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी (FD) आज भी मध्यम वर्ग की पहली पसंद बनी हुई है। ज्यादातर लोग इसे लंबी अवधि के लिए इस भरोसे के साथ करवाते हैं कि उनका पैसा सुरक्षित रहेगा और मैच्योरिटी पर एक निश्चित रिटर्न मिलेगा। लेकिन, जीवन की अनिश्चितताएं कभी भी दस्तक दे सकती हैं।

अचानक आई मेडिकल इमरजेंसी, घर की मरम्मत या किसी बड़े खर्च के लिए अक्सर लोग अपनी एफडी को समय से पहले (Premature Withdrawal) तोड़ने का फैसला लेते हैं। हालांकि, यह फैसला आपकी जेब पर भारी पड़ सकता है क्योंकि बैंक इस पर न केवल जुर्माना वसूलते हैं, बल्कि आपके ब्याज के गणित को भी पूरी तरह बदल देते हैं।

अक्सर निवेशकों को लगता है कि बैंक सिर्फ आधा या एक फीसदी की पेनल्टी काटकर बाकी पैसा लौटा देगा, लेकिन हकीकत में नुकसान इससे कहीं अधिक होता है। जब आप एफडी समय से पहले तोड़ते हैं, तो बैंक ब्याज की गणना उस दर पर नहीं करता जिस पर आपने निवेश शुरू किया था। इसकी जगह, बैंक उस अवधि की ब्याज दर लागू करता है, जितने समय तक आपका पैसा वास्तव में बैंक के पास रहा।

उदाहरण के लिए, यदि आपने 5 साल के लिए 8% की दर पर एफडी करवाई और उसे मात्र 1 साल बाद ही तोड़ दिया, तो बैंक आपको 8% ब्याज नहीं देगा। बैंक उस समय की 1 साल वाली एफडी दर (जो संभवतः 6% या 6.5% हो सकती है) को आधार मानेगा। इसके बाद, उस कम दर पर भी 0.5% से 1% तक की अतिरिक्त पेनल्टी काटी जाएगी। नतीजा यह होता है कि आपको मिलने वाला अंतिम रिटर्न उम्मीद से काफी कम रह जाता है।

हर बैंक के नियम इस मामले में थोड़े अलग होते हैं। कुछ बैंक वरिष्ठ नागरिकों को पेनल्टी में थोड़ी राहत देते हैं, तो कुछ खास योजनाओं के तहत ‘नो पेनल्टी एफडी’ का विकल्प भी देते हैं।

हालांकि, ध्यान देने वाली बात यह है कि नो-पेनल्टी वाली एफडी में सामान्य एफडी की तुलना में ब्याज दर पहले से ही थोड़ी कम रखी जाती है। इसके अलावा, एक बड़ी बात जो निवेशक अक्सर भूल जाते हैं, वह है टैक्स का प्रभाव। एफडी तोड़ने के बाद जो भी ब्याज आपको मिलता है, वह आपकी इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार कर योग्य होता है। यानी पेनल्टी कटने के बाद बचे हुए मुनाफे पर भी सरकार को टैक्स देना पड़ सकता है।

वित्तीय विशेषज्ञ इस नुकसान से बचने के लिए ‘लैडरिंग’ (Laddering) की सलाह देते हैं। इसका मतलब है कि एक बड़ी रकम की एक ही एफडी करवाने के बजाय, उसे कई छोटी-छोटी एफडी में बांट देना चाहिए।

जैसे कि 5 लाख की एक एफडी के बजाय 1-1 लाख की पांच एफडी करवाएं। इससे जरूरत पड़ने पर आप सिर्फ एक एफडी तोड़ेंगे और बाकी पर ब्याज मिलता रहेगा। इसके अलावा, ‘स्वीप-इन’ (Sweep-in) सुविधा भी एक शानदार विकल्प है, जिसमें जरूरत पड़ने पर सिर्फ उतनी ही राशि निकाली जाती है जितनी आवश्यक हो, और शेष राशि पर एफडी का लाभ जारी रहता है