बिलासपुर : (मनीष जायसवाल) पूरे देश के लाखों शिक्षकों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ में अस्सी हजार से अधिक शिक्षक टीईटी के निर्णय से प्रभावित हो रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे शिक्षकों की है जो 15 साल से ज्यादा समय से सेवा दे रहे हैं। प्राथमिक और मिडिल स्कूलों में पढ़ाने वाले वे शिक्षक, जो 1998 में नियुक्त शिक्षा कर्मियों से लेकर 2001, 2003, 2005, 2008 से लेकर 2011 तक नियुक्त हुए और इसके बाद के नियुक्त शिक्षको के लिए टेट अनिवार्य हुआ लेकिन जिनका 2018 में संविलियन हुआ वो आज बड़ी संख्या में कार्यरत हैं। जब इनकी नियुक्ति हुई तब तक शिक्षक बनने के लिए T E T की योग्यता का जिक्र न राज्य सरकार ने की न केंद्र सरकार ओर से किया गया तो आज 20 ,25 साल सेवा देने के बाद ऐसी शर्त रखना न्यायसंगत नही लगता है। ऐसा शिक्षकों की ओर से कहा जा रहा है।

इस विषय पर अपनी बात रखते हुए संयुक्त शिक्षा कर्मी संघ के प्रदेश अध्यक्ष केदार जैन बताते है कि शिक्षकों ने सालों तक स्कूलों में बच्चों को पढ़ाया। कभी गांव के स्कूल के मैदान में, कभी कम संसाधनों के बीच, तो कभी स्थानीय हालात से जूझते हुए और व्यवहारिक अनुभव के आधार पर अपनी एक अलग पहचान बनाई, लेकिन अब एक फैसले के बाद अनिवार्य शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) उत्तीर्ण न कर पाने के कारण वे आज असमंजस की स्थिति में खड़े हैं। इस पूरी व्यवस्था में राज्य सरकार के अलावा इसकी निगरानी और दिशा तय करने वाली संस्था National Council for Teacher Education (NCTE) की जिम्मेदारी भी इस संदर्भ में सवालों के घेरे में है, क्योंकि इतने लंबे समय में व्यवस्था को पूरी तरह लागू और संतुलित रूप से व्यवस्थित नहीं किया जा सका।

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संघ के प्रदेश अध्यक्ष केदार जैन का कहना है कि दिल्ली में चार अप्रैल को राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन होने वाला है, क्योंकि मामला सिर्फ एक राज्य का नहीं है, यह पूरे देश का है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से इतना तो तय है कि बिना किसी प्रकार के मूल्यांकन के पूरी छूट देना संभव नहीं है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि केवल एक लिखित परीक्षा के आधार पर सालों के अनुभव को नजर अंदाज करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता..। इस मामले में केंद्र सरकार बहुत कुछ कर सकती है। अब गेंद उनके पाले में है। लेकिन किया कुछ नहीं जा रहा है।

केदार जैन की बातों और चर्चाओं से एक बात तो निकाल कर आती है की सवाल यह है कि क्या कागज की परीक्षा जमीन की हकीकत को माप सकती है..? इसी बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से दिया गया हालिया बयान इस बहस को और तेज कर देता है, जिसमें उन्होंने टीईटी की अनिवार्यता से जुड़े निर्णय के संदर्भ में शिक्षकों का पक्ष रखते हुए शिक्षा विभाग को पुनर्विचार याचिका दायर करने का निर्देश दिया है..। उन्होंने साफ कहा कि प्रदेश के शिक्षक अनुभवी हैं, उन्हें समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाता रहा है, ऐसे में उनकी योग्यता और वर्षो की सेवा को नजर अंदाज करना उचित नहीं है, और उनका यह बयान टीईटी परीक्षा में पूछे गए एक साधारण से सवाल से भी मेल खाता है..।

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शिक्षक नेता केदार बताते है कि टीईटी में पूछा गया सवाल था। सीखना एक सामाजिक प्रक्रिया है, जो कि Lev Vygotsky के सिद्धांत पर आधारित है, और अब यह पूरे विवाद का प्रतीक बनकर सामने आया है..। सवाल यह नहीं है कि इसका सही जवाब क्या है, बल्कि यह है कि क्या ऐसे सैद्धांतिक सवालों के आधार पर यह तय किया जा सकता है कि शिक्षक कक्षा में कितना सक्षम है…। शिक्षण केवल किताबों का ज्ञान नहीं, असल में यह बच्चों के साथ जुड़ाव, उनके मनोविज्ञान को समझना और स्थानीय परिस्थितियों में सीखने का माहौल बनाना है..। जो शिक्षक सालों से यह काम कर रहे हैं, और कई बार अपने स्तर पर नए-नए तरीके अपनाकर बच्चों को समझा रहे हैं, उन्होंने इस सिद्धांत को पढ़कर नहीं, इसे जीकर अपने अनुभव से सीखा है..।

यही वजह है कि अब समाधान की दिशा में सोचने की जरूरत महसूस हो रही है। बिना मूल्यांकन के रास्ता संभव नहीं है और केवल परीक्षा का रास्ता पर्याप्त नहीं है। ऐसे में एक संतुलित मॉडल की चर्चा तेज हो रही है, जिसमें प्रशिक्षण और सरल, व्यवहारिक मूल्यांकन को साथ लेकर चला जाए..। ऐसा मॉडल, जिसे National Council for Teacher Education (NCTE) राज्यों की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर तैयार करे, ताकि हर क्षेत्र की जरूरतों के अनुसार शिक्षकों को परखा और तैयार किया जा सके..!

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आखिर में बात बिल्कुल सरल है जो शिक्षक दस ,बीस सालों से बच्चों के बीच खड़ा है, जो हर दिन कक्षा में उनके सवालों का सामना करता है, उनकी कमजोरियों को समझकर उन्हें आगे बढ़ाता है, उसकी काबिलियत केवल एक परीक्षा से नहीं आंकी जा सकती..। शिक्षा केवल कागज पर लिखे अंकों से तय नहीं होती, वह अनुभव, समझ और बच्चों के साथ जीवंत जुड़ाव से बनती है। अगर हम परीक्षा को ही अंतिम पैमाना मान लें, तो यह उस किसान की मेहनत को सिर्फ उसके औजारों से तौलने जैसा होगा, जिसने सालों तक अपनी जमीन में पसीना बहाकर फसल उगाई है। सच यही है कि असली काबिलियत कागज पर नहीं, कक्षा के भीतर दिखाई देती है..।