Supreme court decision। दिल्ली।सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि कोई भी सरकारी नियोक्ता किसी कर्मचारी को केवल उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित होने के आधार पर नौकरी से बर्खास्त नहीं कर सकता.

शीर्ष अदालत ने कहा कि जब तक कर्मचारी किसी अपराध में दोषी न ठहराया गया हो और उसे अपना पक्ष रखने का उचित अवसर न दिया गया हो, तब तक ऐसी कार्रवाई पूरी तरह से गैर-कानूनी है.

Supreme court decision।जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने पंजाब पुलिस के एक कॉन्स्टेबल को नौकरी से हटाए जाने के आदेश को असंवैधानिक करार दिया.

मामले के विवरण के अनुसार, याचिकाकर्ता को वर्ष 2002 में पंजाब पुलिस की फर्स्ट इंडियन रिजर्व बटालियन में कॉन्स्टेबल के रूप में चुना गया था.

हालांकि, ड्यूटी जॉइन करने पहुंचे उम्मीदवार को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज एक पुरानी एफआईआर (FIR) लंबित होने के कारण जॉइनिंग नहीं दी गई और जनवरी 2003 में उसे सेवा से मुक्त कर दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि पुलिस बल में एक दशक से अधिक समय से काम कर रहे कर्मचारी को केवल एक लंबित आपराधिक मुकदमे के आधार पर बिना अपना बचाव करने का मौका दिए हटाना न्यायसंगत नहीं है.

हालांकि, दो दशक से भी अधिक समय बीत जाने के कारण अदालत ने याचिकाकर्ता को नौकरी पर बहाल करने का आदेश नहीं दिया. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट के तहत रिहाई से व्यक्ति की ‘दोषसिद्धि’ (Conviction) समाप्त नहीं होती और दोषसिद्धि के आधार पर सेवा से हटाया जा सकता है.

इसके बावजूद, चूंकि कर्मचारी को नौकरी से निकालते वक्त दोषी करार नहीं दिया गया था, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह पीड़ित व्यक्ति को मुआवजे के रूप में 5 लाख रुपये का भुगतान तीन महीने के भीतर करे.