( रुद्र अवस्थी )  इतवार की शाम और वह भी आईपीएल क्रिकेट का फाइनल मुकाबला……। पूरे देश के साथ शहर के तमाम लोग बल्ले और गेंद के बीच दिलचस्प मुकाबले पर नजर गड़ाए हुए अपने-अपने घरों में कैद हो गए थे।

ठीक इसी समय बिलासपुर शहर का एक हिस्सा सिम्स ऑडिटोरियम में जमा हुआ था और  महाराष्ट्र मंडल रायपुर की ओर से प्रस्तुत नाटक “मैं अनिकेत हूं” के मंचन पर पूरी दिलचस्पी के साथ अपनी नज़रें टिकाए हुए था। तपती गर्मी की ढलती शाम सिम्स का ऑडिटोरियम खचाखच भरा था….। पूरे नाटक में प्रमुख पात्र अनिकेत यह साबित करने की नाकाम कोशिश करता रहा कि मैं अनिकेत हूं…। लेकिन बिलासपुर शहर के नाट्यकला प्रेमियों ने कामयाबी के साथ यह साबित कर दिया कि “मैं बिलासपुर हूं….।” वही पुराना…. जो आज भी ऐसी प्रस्तुति का इंतजार करता है।और जब भी कला का मंचन होता है, तमाम नए – पुराने चेहरे एक सभागार में सिमटकर न सिर्फ प्रदर्शन का आनंद लेते हैं, बल्कि कला का सम्मान भी करते हैं।

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महाराष्ट्र मंडल रायपुर की प्रस्तुति हिंदी नाटक “मैं अनिकेत हूं” का मंचन जीआई हेल्थ फाउंडेशन की ओर से किया गया। जिसमें विजया श्री हेरिटेज, संस्कार भारती और बिलासपुर के सभी रोटरी क्लब प्रायोजक थे। इस नाटक में पूरा पूरे समय मंच पर एक अदालत का दृश्य दिखाई देता है। लेकिन इसका कथानक इतना दिलचस्प है और संवाद में ऐसी गर्मजोशी है कि दर्शक ऊबते नहीं.. पूरे समय मंच से बंधे रहते हैं। कहानी शुरू होती है… एक मुकदमा चल रहा है। डायस पर जज बैठे हैं….। वकील जीरह कर रहे हैं… आरोपी कटघरे में खड़े होकर खुद अपनी पैरवी भी कर रहा है….। दूसरी तरफ कटघरे में एक-एक कर कई गवाह आ रहे हैं। दोनों पक्ष की ओर से गवाहों के साथ प्रश्न -प्रति प्रश्न का सिलसिला चल रहा है। नाटक के नाम के अनुरूप कटघरे में खड़े आरोपी अनिकेत की ओर से बार-बार कहा जा रहा है कि “मैं अनिकेत हूं…” और पूरे मुकदमे में उसे यही साबित करना है कि वह अनिकेत है…।

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कहानी में प्रमुख पात्र अनिकेत किसी रेल हादसे में बुरी तरह से जख्मी हो गया है। कटघरे में खड़े होकर भी उसके सर पर पट्टी बंधी है और चेहरे पर जख्म साफ दिखाई दे रहे हैं। वह दावा करता है कि वही अनिकेत है और अपने घर लौटता है तो उसके घर के लोग उसे पहचानने से इनकार करते हैं। मुकदमे के दौरान उसे पहचानने के लिए एक-एक कर घर के नौकर, मुनीम, अनिकेत की पत्नी जैसे कई गवाहों को पेश किया जाता है। सभी उसे पहचानने से इनकार कर देते हैं। अनिकेत कई ऐसे प्रसंगों का उल्लेख करता है, जिसके बारे में सिर्फ घर से जुड़े लोगों को पता है । फिर भी कोई यह मानने को तैयार नहीं होता कि वही अनिकेत है। गवाहों की लिस्ट में एक महिला भी आती है जो दावा करती है कि यह आरोपी शख्स अनिकेत नहीं… बल्कि शशिकांत जाधव है। जिससे कुछ समय के लिए मुकदमा उलझता हुआ दिखाई देता है। अनिकेत चीख – चीखकर कहता है कि वह शशिकांत जाधव नहीं है और दुखी होकर कहता है कि –“जाने क्या हुआ कि मेरे लिए सब पराए हो गए।”

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आखिर में एक न्यूरो सर्जन को गवाह के रूप में पेश किया जाता है । इसके बाद कहानी में नया मोड़ आता है और इस बात का खुलासा होता है कि रेल हादसे में कई लोग घायल हुए थे । जिसमें से दो लोगों को गंभीर हालत में न्यूरोसर्जन के अस्पताल पहुंचाया गया था। इन दो लोगों में से एक शख्स के शरीर में सारे अंग खराब हो चुके थे सिर्फ ब्रेन ही सही था। यही शख्स अनिकेत था। दूसरी तरफ एक शख्स के शरीर में बाकी अंग सही काम कर रहे थे । लेकिन ब्रेन काम नहीं कर रहा था। वह शशिकांत जाधव था। न्यूरो सर्जन ने बताया कि ऐसे समय में उन्होंने दुनिया में अपने तरह का पहला प्रयोग किया और ब्रेन ट्रांसप्लांट कर दिया । पहली बार ब्रेन ट्रांसप्लांट का जोखिम उठाया। जिसमें अनिकेत का ब्रेन निकालकर शशिकांत जाधव के शरीर में ट्रांसप्लांट किया गया। डॉक्टर का कहना था कि कानून की नजर में शायद यह अपराध हो। लेकिन उसे इस बात का कोई पछतावा नहीं है। चूंकि जब दो जिंदगी खत्म हो रही थी तो उसमें से एक को बचा लिया गया । अब यह सवाल खड़ा हुआ कि ब्रेन ट्रांसप्लांट के बाद इस व्यक्ति को किस नाम से जाना जाएगा। आखिर में अनिकेत का संवाद बहुत मार्मिक है। जिसमें वह कहता है कि “मैं मर कर भी जिंदा हूं और जिंदा होकर भी मरा हुआ हूं..।” लेकिन “मैं अनिकेत हूं…।” इसके साथ ही पर्दा गिरता है ।

नाटक का कथानक काल्पनिक तो है। लेकिन बहुत दिलचस्प है। जिसमें मुख्य पात्र अनिकेत सहित सभी ने ईमानदारी के साथ अपना किरदार निभाया। संवाद के दौरान समाज के भीतर की कई विसंगतियां भी सामने आती हैं। जिसमें व्यंग भी है और हास्य भी है। आज के दौर में जब शरीर में हार्ट, किडनी, लीवर जैसे अंगों का प्रत्यारोपण हो रहा है। इसे देखते हुए इस नाटक के लेखक ने कल्पना की है कि यदि ब्रेन ट्रांसप्लांट भी संभव हुआ तो कभी किसी किरदार के साथ ऐसी विसंगति भी आ सकती है । इस मायने में यह कल्पना शीलता अद्भुत है। जिसे नाटक के जरिए सभी पात्रों ने जीवंत कर दिया ।

महाराष्ट्र मंडल रायपुर की ओर से प्रस्तुत इस नाटक के डायरेक्टर पीडीजी शशि वरवंडकर ने खुद अनिकेत की भूमिका निभाई है। अन्य कलाकारों में दिलीप लांबे, चेतन दंडवते, विनोद राखुंडे, पंकज सराफ, रविंद्र ठेंगड़ी, प्रकाश खांडेकर, समीर टल्लू, श्याम सुंदर खंगन, डॉ. अभया जोगलेकर, भारत पलसोदकर. डॉ. अनुराधा दुबे, डॉ. प्रीता लाल, आचार्य रंजन मोदक की भूमिका सराहनीय रही ।

इस मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में सिम्स के एमएस डॉ. रमणेश मूर्ति सहित शहर के नाट्य कला प्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।इस यादगार आयोजन के लिए परदे के पीछे अहम भूमिका निभाने वालों में डॉ. देवेन्दर सिंह प्रमुख थे। नाटक और कला को चाहने वाले बिलासपुरिया लोगों की उपस्थिति ने इस आयोजन को उम्मीद से अधिक सफल बनाया। परदा गिरने के बाद सिम्स ऑडिटोरियम के हाल में जहां बेहतरीन नाटक के मंचन की तारीफ हो रही थी । वहीं मंच से नाटक के डायरेक्टर शशि वरवंडकर ने इस बात के लिए बिलासपुर के लोगों को दिल से धन्यवाद दिया कि इतनी बड़ी तादाद में उपस्थित होकर इस नाटक के नौंवे मंचन को सार्थक कर दिया । जो इस बात की ओर भी इशारा है कि शहर के लोग आज भी नाटक के बेहतरीन मंचन का इंतजार करते हैं और आगे भी ऐसे आयोजनों का इंतजार रहेगा।

( सभी तसवीरें श्री संदीप चोपड़े के सौजन्य से )