बिलासपुर… फरहदा स्थित JK इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल अब केवल एक निजी विद्यालय नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही पर खड़ा बड़ा सवाल बन चुका है। जिस विद्यालय की विभागीय मान्यता 31 जनवरी 2025 को समाप्त हो चुकी हो, वह यदि आज भी पूरे आत्मविश्वास के साथ विद्यार्थियों का प्रवेश ले रहा हो, फीस वसूल रहा हो और खुद को नियमों के दायरे में बता रहा हो, तो सवाल केवल स्कूल प्रबंधन पर नहीं बल्कि उन अधिकारियों पर भी खड़ा होता है जिनके कंधों पर व्यवस्था की निगरानी की जिम्मेदारी है।

मामला तब और गंभीर हो जाता है जब CBSE निरीक्षण में विद्यालय की कई व्यवस्थाएं मानकों से नीचे पाई जाती हैं। विज्ञान और गणित प्रयोगशालाओं में संसाधनों की कमी, सुरक्षा के बुनियादी इंतजामों का अभाव और दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए नियमों के अनुरूप सुविधाएं नहीं होने जैसी कमियां निरीक्षण के दौरान सामने आईं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि व्यवस्थाएं संतोषजनक थीं तो CBSE ने आपत्तियां क्यों दर्ज कीं और यदि आपत्तियां सही थीं तो फिर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

विद्यालय से जुड़े दस्तावेजों को लेकर भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं। निरीक्षण के दौरान ऑनलाइन रिकॉर्ड और वास्तविक अभिलेखों में अंतर सामने आने की चर्चा है। यदि सब कुछ पारदर्शी और नियमानुसार है तो रिकॉर्ड में यह विसंगति आखिर क्यों दिखाई दी?

सबसे बड़ा प्रश्न उस विभाग से है जो शिक्षा व्यवस्था का प्रहरी कहलाता है। जब मान्यता की अवधि समाप्त हो चुकी है तब विद्यालय किस अधिकार से संचालित हो रहा है? यदि नवीनीकरण लंबित है तो यह लंबित स्थिति कितने दिनों तक चलेगी और उसके दौरान नियमों का पालन कौन सुनिश्चित करेगा?

जिले में चर्चा इस बात की भी है कि यदि किसी छोटे स्कूल की मान्यता समाप्त होती तो क्या उसे भी इतनी ही राहत मिलती? या फिर कार्रवाई तत्काल होती? यही कारण है कि अब यह मामला केवल एक स्कूल का नहीं बल्कि शिक्षा विभाग की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली का भी बन गया है।
अब निगाहें प्रशासन और शिक्षा विभाग पर हैं। सवाल सीधा है—जब नियमों की किताब में मान्यता अनिवार्य है, तब बिना स्पष्ट स्थिति के विद्यालय का संचालन आखिर किसके भरोसे चल रहा है?