रायपुर। नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव पर शिक्षा विभाग की प्रेसवार्ता को लेकर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि सरकार ने आंकड़े गिनाकर अपनी पीठ थपथपा ली, लेकिन प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था का असली हिसाब स्कूलों में खड़े बच्चों और शिक्षकों से लिया जाना चाहिए। युक्तियुक्तकरण के नाम पर 10,538 स्कूलों को बंद कर दिया गया और 15,165 शिक्षकों के समायोजन को उपलब्धि बताया जा रहा है। बस्तर और सरगुजा से शिक्षकों को हटाकर मैदानी और शहरी क्षेत्रों में भेजा जा रहा है। सरकार बताए कि जिन स्कूलों से शिक्षक हटाए गए, वहां अब कितने शिक्षक हैं और जिन स्कूलों में भेजे गए, वहां कितने बच्चे और कितने शिक्षक हैं। बिना किसी तय ट्रांसफर नीति के, बिना आवेदन और विकल्प लिए करीब 800 शिक्षकों के प्रशासनिक ट्रांसफर का आधार क्या है? अगर सरकार इसे प्रक्रिया कहती है तो यह प्रशासनिक आतंकवाद है।

डॉ. महंत ने कहा कि शिक्षा विभाग में ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर गंभीर आरोप लग रहे हैं। चार लाख रुपये तक के लेन-देन के आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। करीब 800 तबादलों का पूरा रिकॉर्ड जनता के सामने रखा जाए और यदि हजारों तबादलों की कोई प्रस्तावित सूची है तो उसे भी सार्वजनिक किया जाए। डॉ. महंत ने आरोप लगाया कि यह मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री की जेब भरने वाले तीन अरब रुपये के घोटाला उद्योग का मोदी की गारंटी वाला नया मॉडल दिखाई दे रहा है। शिक्षा मंत्री के रिश्तेदारों और ओएसडी से जुड़े लोगों की भूमिका को लेकर आरोप हैं, फिर सरकार चुप क्यों है? यदि आरोप गलत हैं तो जांच कराने से सरकार क्यों डर रही है? शिक्षा विभाग बच्चों को पढ़ाने के लिए है, ट्रांसफर-पोस्टिंग की दुकान चलाने और पदों की खरीद-फरोख्त के लिए नहीं।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि शिक्षक पात्रता परीक्षा का मुद्दा हजारों सेवारत शिक्षकों की नौकरी और सेवा सुरक्षा से जुड़ा है। शिक्षक आंदोलन कर रहे हैं, सड़क पर उतर रहे हैं, लेकिन मंत्री की प्रेसवार्ता में इस मुद्दे पर कोई साफ रोड मैप नहीं दिया गया। सरकार बताए कि सर्वोच्च न्यायालय में उसने क्या पक्ष रखा है, विशेष अनुमति याचिका दाखिल की है या नहीं, उसकी स्थिति क्या है और सेवारत शिक्षकों को राहत देने के लिए सरकार क्या कर रही है। एक तरफ शिक्षक नौकरी बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं और दूसरी तरफ मंत्री अपनी उपलब्धियां गिना रहे हैं। डॉ. महंत ने कहा कि मंत्री को इतना तो लिहाज होना चाहिए कि हजारों शिक्षकों की नौकरी पर संकट है और उनकी प्राथमिकता शिक्षक की सेवा सुरक्षा नहीं, अपनी उपलब्धियां गिनाना है।

डॉ. महंत ने कहा कि 5000 पदों की भर्ती और 3000 से ज्यादा संविदा पदों की प्रक्रिया को उपलब्धि बताने से शिक्षक कमी खत्म नहीं हो जाती। सरकार बताए कि प्रदेश में शिक्षक के कितने पद स्वीकृत हैं, कितने खाली हैं और किस विषय में कितनी कमी है। 15,165 शिक्षकों और प्राचार्यो का समायोजन नई भर्ती नहीं है, ये पहले से विभाग में काम कर रहे लोग हैं। सरकार नई भर्ती का वास्तविक आंकड़ा और सेवानिवृत्ति के बाद कम हुई शिक्षक संख्या भी बताए। स्वामी आत्मानंद विद्यालयों में नियमित शिक्षक भर्ती क्यों नहीं की जा रही? स्कूलों के भवन और उपलब्ध संसाधनों का रखरखाव क्यों नहीं हो रहा? वंदे मातरम्, मंत्रोच्चार और एआई की बातें करने से स्कूलों में शिक्षक नहीं पहुंचेंगे। सरकार बताए कि कितने स्कूलों में गणित, विज्ञान और अंग्रेजी के शिक्षक नहीं हैं।

नेता प्रतिपक्ष ने जंबूरी कैंप और विभागीय खर्चो पर भी सरकार से जवाब मांगा। उन्होंने कहा कि अगर जंबूरी कैंप सरकार की उपलब्धि थी तो मंत्री की सूची से उसका नाम गायब क्यों है? आयोजन में कितना पैसा खर्च हुआ, किस एजेंसी या ठेकेदार को कितना भुगतान हुआ और अनियमितताओं के आरोपों पर क्या जांच हुई, यह सब सार्वजनिक किया जाए। मुख्यमंत्री शाला जतन योजना क्यों बंद की गई और उसकी राशि क्यों वापस ली गई, इसका भी जवाब दिया जाए। वीएसके पर कितना खर्च हुआ, किसे काम दिया गया, कितना भुगतान हुआ और शिक्षकों का डेटा कितना सुरक्षित है, सरकार बताए। 85 प्रतिशत ऑनलाइन उपस्थिति को उपलब्धि बताया जा रहा है तो बाकी 15 प्रतिशत क्यों दर्ज नहीं हुई? एप्पल के मोबाइल में वीएसके एप क्यों नहीं चल रहा है? सरकार यह भी स्पष्ट करे कि एंड्रॉयड फोन से लिया जा रहा शिक्षकों का व्यक्तिगत और विभागीय डेटा कहां सुरक्षित है और उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है।

डॉ. महंत ने कहा कि सरकार को सत्ता में ढाई साल से अधिक हो चुके हैं, फिर शिक्षा मंत्री दो साल की उपलब्धियां क्यों गिना रहे हैं? करीब छह महीने बृजमोहन अग्रवाल स्कूल शिक्षा मंत्री रहे और लंबे समय तक विभाग मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के पास रहा। उस समय का हिसाब कहां है? सरकार अगर अपनी उपलब्धियों को सही मानती है तो आंकड़े कागजों के रूप में जनता के सामने रखे। बीईओ से लेकर संयुक्त संचालक और संचालनालय तक प्रभार में चल रहे पदों, पदोन्नति और प्रतिनियुक्ति का भी पूरा हिसाब दिया जाए। झूठे आंकड़ों और चमकदार प्रेसवार्ता से प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था नहीं सुधरेगी। डॉ. महंत ने कहा कि जंबूरी कैंप और ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर लगाए जा रहे आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। बच्चों के भविष्य से जुड़े विभाग को विवादों और भ्रष्टाचार के आरोपों में घसीटने की जिम्मेदारी सरकार की है। यदि सरकार में थोड़ी भी नैतिकता बची है तो स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव को इस्तीफा देना चाहिए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए।