बिलासपुर… बिल्हा विकासखंड के ग्राम पिरैया में बच्चों के स्कूल बैग का बढ़ता वजन अब शिकायत का विषय बन गया है। गांव के एक पालक ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कराते हुए कहा है कि बच्चों के बैग में किताबों का बोझ लगातार बढ़ रहा है। इससे उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है और स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। शिकायत में स्कूल में शिक्षकों की अनुपस्थिति और पढ़ाई प्रभावित होने का मुद्दा भी उठाया गया है।

21 अगस्त को दर्ज शिकायत स्कूल शिक्षा विभाग से संबंधित है। शिकायतकर्ता से दूरभाष पर संपर्क के दौरान बच्चों के बस्ते में बढ़ती पुस्तकों के वजन को लेकर चिंता सामने आई। पालक ने इस मामले में आवश्यक कार्रवाई की मांग की है।

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मामला सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब बच्चों के स्कूल बैग का वजन पहले से निर्धारित है, तो स्कूलों में उस सीमा का पालन किस हद तक हो रहा है? बच्चों को रोजाना कितनी किताबें और कॉपियां लेकर स्कूल पहुंचना पड़ रहा है और क्या स्कूल स्तर पर बस्तों के वजन की नियमित जांच हो रही है, इसकी निगरानी भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

कागज पर तय है बस्ते का वजन

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दरअसल, बच्चों को भारी बस्ते से राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2020 में स्कूल बैग नीति जारी की थी। शिक्षा मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने बस्ते के वजन को लेकर दिशा-निर्देश तैयार किए थे। 24 नवंबर 2020 को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इन दिशा-निर्देशों को भेजा गया।

नीति में कक्षा पहली से दसवीं तक के बच्चों के बस्ते का वजन उनके शरीर के वजन के अधिकतम 10 प्रतिशत तक रखने का मानक तय किया गया है। यानी बच्चे का वजन जितना कम होगा, उसके बस्ते का वजन भी उसी अनुपात में कम रहना चाहिए।

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कक्षा पहली और दूसरी के बच्चों के लिए बस्ते का वजन 1.6 से 2.2 किलोग्राम, तीसरी से पांचवीं के लिए 1.7 से 2.5 किलोग्राम, छठवीं और सातवीं के लिए 2 से 3 किलोग्राम, आठवीं के लिए 2.5 से 4 किलोग्राम तथा नौवीं और दसवीं के लिए 2.5 से 4.5 किलोग्राम तक रखने का मानक निर्धारित है।

अब निगरानी की बारी

स्कूल बैग नीति में केवल वजन की सीमा तय नहीं की गई है, बल्कि स्कूलों में बस्ते का वजन जांचने के लिए डिजिटल वजन मशीन रखने, बच्चों को अनावश्यक किताबें और सामग्री रोजाना स्कूल नहीं लाने देने तथा पाठ्यक्रम और समय-सारणी को इस तरह व्यवस्थित करने की बात कही गई है, जिससे बच्चों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।

ऐसे में पिरैया से उठी शिकायत ने स्थानीय स्तर पर नीति के क्रियान्वयन को लेकर सवाल खड़ा कर दिया है। यदि बस्ते वास्तव में निर्धारित सीमा से अधिक भारी हैं तो इसकी नियमित जांच कौन कर रहा है? स्कूल में वजन मापने की व्यवस्था है या नहीं? बच्चों को किन-किन पुस्तकों और कॉपियों को रोज साथ लाना पड़ता है? इन सवालों का जवाब स्कूल प्रबंधन और शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था से जुड़ा है।

शिकायत सिर्फ बस्ते की नहीं

इस पूरे मामले में एक और पहलू महत्वपूर्ण है। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में दर्ज शिकायत में पालक ने शिक्षकों की अनुपस्थिति और पढ़ाई नहीं होने की बात भी कही है। यानी मामला केवल बच्चों के भारी बस्ते तक सीमित नहीं है, बल्कि स्कूल में पढ़ाई की व्यवस्था और बच्चों को मिल रहे शैक्षणिक वातावरण पर भी सवाल खड़े करता है।

अब निगाह शिक्षा विभाग की कार्रवाई पर है। विभाग को यह देखना होगा कि पिरैया के स्कूल में बच्चों के बस्तों का वास्तविक वजन कितना है, निर्धारित मानकों का पालन हो रहा है या नहीं और शिक्षकों की उपस्थिति तथा पढ़ाई की व्यवस्था की स्थिति क्या है। शिकायत की जांच इन सवालों का जवाब देगी और यह भी स्पष्ट करेगी कि स्कूल बैग नीति जमीन पर बच्चों का बोझ कम कर रही है या अब भी किताबों का वजन ही उनके कंधों पर हावी है।