बिलासपुर…छत्तीसगढ़ भाजपा में नए प्रदेश अध्यक्ष की कवायद अब उस मुकाम पर पहुंचती दिखाई दे रही है, जहां किसी भी समय संगठन अपना अगला पत्ता खोल सकता है। प्रदेश में भाजपा की सरकार होने के बावजूद मैदानी स्तर पर जनता के बीच से मिल रहे फीडबैक ने संगठन की बेचैनी बढ़ाई है। सरकार के कामकाज और स्थानीय स्तर की समस्याओं को लेकर सामने आ रहे नकारात्मक संकेतों ने भाजपा के रणनीतिकारों को संगठन को और अधिक सक्रिय करने की जरूरत का अहसास कराया है। इसी बीच केंद्रीय नेतृत्व के वरिष्ठ नेताओं के लगातार प्रदेश दौरे और संगठन में बैठक दर बैठक चल रही कवायद को नए प्रदेश अध्यक्ष की तलाश से जोड़कर देखा जा रहा है।

पार्टी के भीतर से छन-छनकर सामने आ रही चर्चाओं में केंद्रीय मंत्री एवं बिलासपुर सांसद तोखन साहू का नाम अब सबसे ज्यादा मजबूती से सामने आ रहा है। परिस्थितियों और संगठन की जरूरतों को देखते हुए उनकी प्रदेश अध्यक्ष पद पर ताजपोशी लगभग निश्चित मानी जाने लगी है। हालांकि औपचारिक घोषणा अभी भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को करनी है, लेकिन संगठन के भीतर से आ रही चर्चाओं में अब यह बात लगातार सुनाई देने लगी है कि छत्तीसगढ़ भाजपा की कमान तोखन साहू को सौंपी जा सकती है।

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किरण सिंह देव की अनुपस्थिति से तेज कवायद

मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंह देव पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य कारणों के चलते संगठन की मैदानी गतिविधियों से दूर हैं और दिल्ली में उपचार करा रहे हैं। बागेश्वर धाम से लौटते समय हुए हादसे के बाद उनका उपचार चल रहा है। उनकी सक्रिय राजनीतिक वापसी में अभी समय लगने की चर्चा है। ऐसे में संगठन के सामने यह सवाल भी है कि अगले कुछ महीनों में प्रदेश भाजपा को पूरी तरह मैदानी सक्रियता के साथ कौन नेतृत्व देगा।

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भाजपा चुनावी राजनीति में संगठन को लगातार सक्रिय रखने वाली पार्टी है। विधानसभा चुनाव में अभी करीब दो वर्ष का समय जरूर है, लेकिन संगठन के स्तर पर तैयारियां पहले से शुरू हो चुकी हैं। यही वजह है कि प्रदेश अध्यक्ष का संभावित बदलाव केवल स्वास्थ्य परिस्थितियों से जुड़ा विषय नहीं रह गया है। इसे आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए संगठन की नई रणनीति के हिस्से के रूप में भी देखा जा रहा है।

मैदान से नकारात्मक फीडबैक.. संगठन की बेचैनी

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प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में संगठन के वरिष्ठ नेताओं के लगातार दौरे हो रहे हैं। कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद किया जा रहा है। जिलों और मंडलों की बैठकों में संगठन की स्थिति, सरकार के कामकाज और जनता के बीच पार्टी की पकड़ को लेकर फीडबैक लिया जा रहा है।

यहीं से भाजपा की चिंता का एक दूसरा पहलू सामने आता है। मैदानी स्तर से मिल रहे फीडबैक में सरकार के प्रति पूरी तरह सकारात्मक माहौल नहीं होने के संकेत मिल रहे हैं। स्थानीय समस्याओं, जनता की अपेक्षाओं और सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर उठ रहे सवाल संगठन तक पहुंच रहे हैं। इन नकारात्मक फीडबैक ने संगठन की बेचैनी बढ़ाई है और पार्टी अब सरकार तथा संगठन दोनों स्तरों पर अपनी मैदानी पकड़ मजबूत करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है।

लगातार बैठकें, संगठनात्मक फेरबदल और वरिष्ठ नेताओं के दौरे इसी कवायद का हिस्सा माने जा रहे हैं। भाजपा को ऐसे प्रदेश अध्यक्ष की जरूरत महसूस हो रही है जो केवल संगठनात्मक बैठकों तक सीमित न रहे, बल्कि लगातार जनता और कार्यकर्ताओं के बीच मौजूद रहे और सरकार तथा संगठन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित कर सके।

तोखन साहू पर क्यों टिक रही नजर?

तोखन साहू के पक्ष में सबसे बड़ा आधार उनका राजनीतिक सफर और वर्तमान भूमिका है। वे बिलासपुर से सांसद हैं और केंद्र सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इससे पहले छत्तीसगढ़ की राजनीति में उन्होंने लंबा समय बिताया है। लोरमी से पहली बार विधानसभा चुनाव जीतने के बाद तत्कालीन रमन सिंह सरकार में संसदीय सचिव बने। इसके बाद लोकसभा की राजनीति में पहुंचे और अब केंद्र में मंत्री के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुके हैं।

राजनीतिक तौर पर उनकी सबसे बड़ी ताकत यह मानी जाती है कि वे संगठन और सत्ता दोनों के अनुभव से गुजर चुके हैं। भाजपा के भीतर उनकी छवि सहज, मिलनसार और कार्यकर्ताओं के बीच संवाद रखने वाले नेता की रही है। प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए ऐसे चेहरे की जरूरत महसूस की जा रही है जो संगठन को लगातार मैदान में रख सके और सरकार तथा संगठन के बीच बेहतर समन्वय भी कायम कर सके। इस कसौटी पर तोखन साहू का नाम स्वाभाविक रूप से मजबूत होता दिखाई देता है।

 समीकरण में साहू चेहरा कितना महत्वपूर्ण?

छत्तीसगढ़ की राजनीति में ओबीसी मतदाताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इनमें साहू समाज का प्रभाव व्यापक माना जाता है। दूसरी ओर प्रदेश की सत्ता की कमान आदिवासी नेतृत्व के हाथ में है। ऐसे में भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव में आदिवासी और ओबीसी समीकरण को साथ साधने की रणनीति पर आगे बढ़ती है तो प्रदेश संगठन की कमान ओबीसी चेहरे को देना राजनीतिक संदेश के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

यही वजह है कि तोखन साहू का नाम केवल एक संगठनात्मक नियुक्ति के रूप में नहीं, बल्कि भाजपा की आगामी चुनावी रणनीति के व्यापक सामाजिक समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है। सत्ता में आदिवासी नेतृत्व और संगठन में ओबीसी प्रतिनिधित्व का संतुलन भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी संयोजन साबित हो सकता है।

शिवरतन शर्मा विकल्प, संतोष भी पसंद 

प्रदेश अध्यक्ष पद की संभावित कवायद में शिवरतन शर्मा का नाम भी गंभीरता से लिया जा रहा है। संगठन में लंबा अनुभव, कार्यकर्ताओं के बीच सक्रियता और राजनीतिक समझ उनकी बड़ी ताकत मानी जाती है। भाजपा की आंतरिक राजनीति में अलग-अलग नेताओं को लेकर अलग-अलग पसंद होना स्वाभाविक है और संगठन के भीतर इस स्तर पर कई नामों को लेकर चर्चा भी चल रही है।

इसी क्रम में राजनांदगांव सांसद संतोष पांडे को पसंद करने वाला एक वर्ग भी सक्रिय बताया जा रहा है। उनके समर्थकों की ओर से उनके नाम को संगठन की कमान के लिए उपयुक्त माना जाता है। हालांकि इसे किसी औपचारिक दावेदारी या केंद्रीय नेतृत्व के निर्णय के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी। भाजपा में अंतिम फैसला संगठन की शीर्ष व्यवस्था के स्तर पर ही होता है।

रमन सिंह का आशीर्वाद क्यों अहम?

प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर चल रही इस पूरी कवायद में वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की राजनीतिक भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। छत्तीसगढ़ भाजपा की राजनीति में लंबे अनुभव और व्यापक स्वीकार्यता के कारण किसी भी बड़े संगठनात्मक फैसले में उनकी राय का अपना महत्व है।

तोखन साहू की राजनीतिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय रमन सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल से जुड़ा है। लोरमी से पहली बार विधानसभा पहुंचने के बाद संसदीय सचिव की जिम्मेदारी मिलना उसी दौर की बात है। इसके बाद साहू ने लोकसभा की राजनीति में अपनी जगह बनाई और केंद्र सरकार में मंत्री तक पहुंचे।

यही राजनीतिक पृष्ठभूमि इस कवायद को और दिलचस्प बनाती है। संगठन के भीतर यदि तोखन साहू के नाम पर सहमति मजबूत होती है तो वरिष्ठ नेतृत्व के बीच उनका राजनीतिक सामंजस्य भी महत्वपूर्ण होगा। रमन सिंह का आशीर्वाद किसी औपचारिक घोषणा से पहले का ऐसा राजनीतिक संकेत हो सकता है, जिसकी अपनी अहमियत होगी। हालांकि इसे किसी गुटीय समर्थन या अंतिम निर्णय के रूप में देखना उचित नहीं होगा।

तोखन अध्यक्ष तो..केंद्र में खुलेगा नया समीकरण

भाजपा में एक व्यक्ति-एक पद और एक जिम्मेदारी की परंपरा को देखते हुए यदि तोखन साहू प्रदेश अध्यक्ष बनते हैं तो उनके केंद्रीय मंत्री पद को लेकर भी नई राजनीतिक कवायद शुरू होना स्वाभाविक है। केंद्र में उनकी जगह छत्तीसगढ़ के किसी अन्य सांसद को जिम्मेदारी मिल सकती है। मंत्रिमंडल में फेरबदल या विस्तार की स्थिति बनती है तो प्रदेश के अन्य सांसदों के नाम भी सामने आ सकते हैं।

इस तरह प्रदेश अध्यक्ष का फैसला केवल भाजपा के प्रदेश संगठन तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर केंद्र में छत्तीसगढ़ के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी पड़ सकता है। एक बदलाव के साथ कई नए समीकरण बनने की संभावना इसी कारण इस पूरी कवायद को और महत्वपूर्ण बना रही है।

गणेशोत्सव,नवरात्रि के बीच.. भाजपा का बड़ा फैसला

भाजपा संगठन में बड़े फैसलों के लिए तिथियों और अवसरों के राजनीतिक महत्व को भी ध्यान में रखा जाता है। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष के नाम की घोषणा यदि आने वाले गणेशोत्सव या इसके बाद होने वाले नवरात्रि के विशेष आयोजनों के दौरान सामने आती है तो यह भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश माना जा सकता है।

इन पर्वों के दौरान देशभर में विशेष जनमाहौल बनता है। संगठनात्मक गतिविधियां भी तेज रहती हैं। ऐसे समय में भाजपा यदि अपने नए प्रदेश अध्यक्ष का नाम सामने रखती है तो इसे महज संगठनात्मक घोषणा से आगे के संकेत के रूप में भी देखा जाएगा।

फिलहाल आधिकारिक घोषणा का इंतजार है, लेकिन संगठन के भीतर से छन-छनकर सामने आ रही चर्चाओं का स्वर अब पहले की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट है। परिस्थितियों को देखते हुए तोखन साहू की प्रदेश अध्यक्ष पद पर ताजपोशी लगभग निश्चित मानी जाने लगी है। शिवरतन शर्मा जैसे अनुभवी संगठनात्मक चेहरे और संतोष पांडे को पसंद करने वाले समर्थक वर्ग की मौजूदगी के बावजूद तोखन साहू के पक्ष में सामाजिक समीकरण, केंद्रीय मंत्री के रूप में बनी राष्ट्रीय पहचान, संगठन से संवाद और वरिष्ठ नेतृत्व के साथ उनका राजनीतिक सामंजस्य कई स्तरों पर उन्हें मजबूत स्थिति में खड़ा करता है।

अब निगाह सिर्फ इस बात पर है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व इस राजनीतिक तस्वीर को औपचारिक रूप कब देता है। क्योंकि संगठन के भीतर से छनकर सामने आ रही चर्चाओं के मुताबिक तोखन साहू के नाम पर सहमति जिस स्तर तक पहुंचती दिखाई दे रही है, उसमें अब सवाल नाम का कम और ऐलान के समय का ज्यादा नजर आ रहा है।

यानी छत्तीसगढ़ भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष के रूप में तोखन साहू की ताजपोशी की तस्वीर लगभग बन चुकी है—बस संगठन की औपचारिक मुहर बाकी है। यदि आने वाले दिनों में भाजपा इसी दिशा में अपना फैसला सामने रखती है तो यह किसी बड़े राजनीतिक आश्चर्य के बजाय पहले से बन रही तस्वीर का औपचारिक रूप लेना होगा।

अगले दो वर्षों में प्रदेश भाजपा को लगातार चुनावी मोड में रखने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने, जनता के बीच सरकार और संगठन की स्वीकार्यता मजबूत करने तथा आदिवासी-ओबीसी सामाजिक समीकरण को साधने की जिम्मेदारी नए प्रदेश अध्यक्ष के सामने होगी। ऐसे में तोखन साहू के नाम पर चल रही यह कवायद केवल संगठनात्मक नियुक्ति नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव की राजनीतिक पटकथा का पहला बड़ा संकेत बनती दिखाई दे रही है।