नाम ही नौका , नाम ही सेतु” — रामकथा के अंतिम दिन..विजय कौशल ने कहा..—नाम ही जीवन, नाम ही मुक्ति..भावुक हुए अमर
राजतिलक के साथ श्रद्धा, संस्कृति और संवेदना पर्व का महासमापन

बिलासपुर…कलियुग में मोक्ष का मार्ग कठिन तपस्या या दुष्कर साधना नहीं, बल्कि प्रभु के नाम का सतत स्मरण है। नाम की महिमा को जिसने समझ लिया, वह भवसागर पार कर गया—यह संदेश रामकथा के अंतिम दिन जन-जन के हृदय में उतर गया। आठ दिवसीय रामकथा के अंतिम दिवस पर कथा स्थल श्रद्धा, भाव और भक्ति के महासागर में बदल गया, जहाँ हजारों श्रोता शब्द नहीं, अनुभूति सुन रहे थे।
सुप्रसिद्ध कथावाचक संत विजय कौशल जी महाराज ने कहा कि कलियुग में नाम ही आधार है। भगवान के असंख्य नाम हैं, किंतु एक नाम का भी यदि श्रद्धा से स्मरण हो, तो जीवन धन्य हो जाता है। उन्होंने रामकथा के अंतिम प्रसंगों का वर्णन करते हुए बताया कि जब रावण से युद्ध निश्चित हुआ, तो प्रभु श्रीराम ने पहले शांति का मार्ग चुना और अंगद को समझौते के लिए भेजा। किंतु अहंकार में डूबा रावण नहीं माना।
अंगद द्वारा सभा में पैर जमाकर दी गई चुनौती केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि धर्म की अडिगता का प्रतीक थी। जब कोई भी उस चरण को हिला न सका, तब भी रावण का अहंकार नहीं टूटा। संत श्री ने कहा—जहाँ अहंकार होता है, वहाँ विनाश निश्चित होता है।
समुद्र तट पर रामेश्वरम पहुँचकर प्रभु श्रीराम ने शिवलिंग की स्थापना की। यही वह क्षण था जहाँ यह संदेश स्पष्ट हुआ कि नाम का महत्व शक्ति से बड़ा होता है। नल-नील द्वारा डाले गए पत्थरों पर जब राम नाम अंकित हुआ, तब वे डूबे नहीं—और जब स्वयं प्रभु ने नाम बिना पत्थर डाले, तो वे जल में समा गए। यह केवल कथा नहीं, जीवन का दर्शन है।
लंका युद्ध, लक्ष्मण मूर्छा, संजीवनी प्रसंग, हनुमान की अपार भक्ति, कुंभकर्ण का अहंकार और अंततः रावण वध—इन सभी प्रसंगों में संत श्री ने बार-बार यही रेखांकित किया कि जहाँ धर्म होता है, वहीं विजय होती है। रावण वध के बाद भी प्रभु श्रीराम का करुण स्वरूप सामने आया, जब उन्होंने विभीषण को अपने भाई का अंतिम संस्कार करने का आदेश दिया।
अयोध्या वापसी का प्रसंग श्रोताओं की आँखों को नम कर गया। प्रभु का भरत से मिलन, केवट का प्रेम, अयोध्यावासियों की प्रतीक्षा और पुष्पवर्षा—यह केवल राज्याभिषेक नहीं था, यह लोक और लोकधर्म का पुनर्स्थापन था। संत श्री ने कहा कि राम राजा बने, क्योंकि वे पहले सेवक थे।
कथा विश्राम के पश्चात मुख्य संरक्षक अमर अग्रवाल ने भावुक स्वर में कहा—“यह रामकथा केवल आयोजन नहीं थी, यह संस्कारों का पुनर्जागरण था। यदि एक भी व्यक्ति प्रभु के नाम से जुड़ गया, तो हमारा प्रयास सार्थक है।” उन्होंने नगरवासियों, श्रद्धालुओं और सहयोगी संस्थाओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि रामकथा ने समाज को जोड़ा ही नहीं, अंदर से संस्कारित किया है।
कार्यक्रम के प्रारंभ से अंत तक श्रद्धा, अनुशासन और सहभागिता का जो दृश्य देखने को मिला, उसने यह सिद्ध कर दिया कि जब कथा होती है, तो केवल मंच नहीं सजता—मनुष्य का अंतर्मन जागता है।
रामकथा का यह अंतिम दिन केवल समापन नहीं था, यह स्मृति बन गया—ऐसी स्मृति, जो समय के साथ धुंधली नहीं होगी, बल्कि आने वाले वर्षों तक लोगों की जुबान और जीवन में बनी रहेगी।





