MP News।सिंगरौली: सिंगरौली में जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) की कुर्सी संभालते ही प्रभारी डीईओ कविता त्रिपाठी ने सरकारी स्कूलों में पत्रकारों के प्रवेश पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का एक विवादित आदेश जारी कर दिया।

हालांकि, इस तुगलकी फरमान के निकलते ही सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय जनता और मीडिया जगत में ऐसा जोरदार बवाल मचा कि मैडम को महज 24 घंटे के भीतर बैकफुट पर आना पड़ा और नया संशोधित आदेश जारी कर सफाई पेश करनी पड़ी।

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​पूरे घटनाक्रम की बात करें तो मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग ने बीते 23 जून को एक आदेश जारी कर जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय सिंगरौली में पदस्थ अतिरिक्त जिला परियोजना समन्वयक कविता त्रिपाठी को सहायक संचालक के पद पर पदस्थ किया था।

इसके साथ ही उन्हें जिले के डीईओ (DEO) का अतिरिक्त प्रभार भी सौंप दिया गया। कविता त्रिपाठी ने अगले ही दिन 24 जून को पूरे उत्साह के साथ पदभार ग्रहण किया। लेकिन जिले की शिक्षा व्यवस्था की कमान हाथ में आते ही उन्होंने अगले ही दिन 25 जून 2026 को एक ऐसा विवादित आदेश जारी कर दिया, जिसने पूरे प्रदेश का ध्यान खींच लिया।

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डीईओ कविता त्रिपाठी ने अपने पहले आदेश में छात्र-छात्राओं की सुरक्षा और शैक्षणिक माहौल का हवाला देते हुए सरकारी स्कूलों में आम जनता के साथ-साथ मीडिया (पत्रकारों) की एंट्री को भी पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया। आदेश में बकायदा यह गंभीर बात लिखी गई कि ‘पत्रकारों और सामान्य जन का विद्यालयों में अनावश्यक निरीक्षण शासकीय कार्य में अवरोध (व्यवधान) पैदा करता है।’

इस आदेश के सार्वजनिक होते ही स्थानीय मीडिया और आम जनता भड़क उठी। लोगों ने इसे पूरी तरह से तानाशाही और तुगलकी फरमान मानते हुए सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया और यह आदेश स्थानीय अखबारों की सबसे बड़ी सुर्खी बन गया।

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इस प्रतिबंधात्मक आदेश के बाद मीडिया और स्थानीय जागरूक नागरिकों ने शिक्षा विभाग पर तीखे सवालों की बौछार कर दी। सोशल मीडिया पर यह चर्चा तेज हो गई कि क्या पिछले जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यकाल में हुई करोड़ों रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं और घोटालों को छिपाने के लिए जनता और मीडिया का मुंह बंद करने की यह साजिश है?

स्थानीय लोगों ने साफ शब्दों में कहा कि सरकारी विद्यालय जनता के टैक्स के पैसे से चलते हैं, शिक्षकों को वेतन भी जनता के पैसे से मिलता है और उनके ही बच्चे इन स्कूलों में पढ़ते हैं; ऐसे में उन्हें यह पूरा विधिक अधिकार है कि वे जाकर देखें कि स्कूलों में कैसी पढ़ाई और व्यवस्था हो रही है। लोगों ने कड़ा ऐतराज जताते हुए पूछा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया को इस तरह कैसे प्रतिबंधित किया जा सकता है?

चारों तरफ से घिरने और मामले को गंभीर रूप से तूल पकड़ता देख नव नियुक्त डीईओ मैडम के होश उड़ गए और वे तुरंत बैकफुट पर आ गईं। अपनी भूल का अहसास होने पर उन्होंने अगले ही दिन 26 जून को आनन-फानन में एक नया स्पष्टीकरण आदेश जारी किया।

इस नए आदेश में उन्होंने सफाई देते हुए लिखा कि उन्होंने विभिन्न स्कूलों के प्राचार्यों (प्रिंसिपल्स) की पूर्व शिकायतों के आधार पर वह आदेश जारी किया था, उनका उद्देश्य मुख्यधारा की मीडिया की भूमिका को सीमित करना कभी नहीं था।

​जिला शिक्षा अधिकारी ने अपने नए पत्र में लिखा कि पूर्व आदेश का वास्तविक आशय केवल विद्यालय में छात्र-छात्राओं की सुरक्षा और शैक्षणिक वातावरण को निर्बाध बनाए रखने के लिए बिना अनुमति के बाहरी अज्ञात व्यक्तियों के प्रवेश को रोकना था।

सरकार से मान्यता प्राप्त और वास्तविक पत्रकारों को प्रवेश से कतई नहीं रोका गया है, वह आदेश केवल तथाकथित सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और अराजक तत्वों के लिए था। उन्होंने आगे जोड़ा कि जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय विद्यालयों में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।