छत्तीसगढ़ की शिक्षा सेवाओं में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल,असंतुलित व्यवस्था को दुरुस्त करने की कोशिश…. लेकिन विसंगतियां भी हैं

रायपुर (मनीष जायसवाल । )छत्तीसगढ़ की शिक्षा सेवाओं में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल हुआ है। छत्तीसगढ़ स्कूल शैक्षणिक सेवा भर्ती एवं पदोन्नति नियम 2019 में संशोधन कर राजपत्र में नया नियम जारी कर दिया गया है। इस बदलाव का सबसे अहम पहलू यह है कि अब विकासखंड शिक्षा अधिकारी / सहायक संचालक के 75 प्रतिशत पद सहायक विकासखंड शिक्षा अधिकारी संवर्ग से पदोन्नति के माध्यम से भरे जाएंगे, जबकि 25 प्रतिशत पद प्राचार्य वर्ग–2 से प्रतिनियुक्ति से दिए जाएंगे।
अब तक व्यवस्था लगभग उलटी थी। पहले 90 प्रतिशत पद प्राचार्य वर्ग–2 (न्यूनतम 5 वर्ष का अनुभव) से डेपुटेशन पर भरे जाते थे और एबीईओ को महज 10 प्रतिशत पदोन्नति का अवसर मिलता था। सीधी भर्ती से आए एबीईओ संवर्ग के लिए यह स्थिति लंबे समय से असंतोष का कारण बनी हुई थी। वर्ष 2013 में छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के माध्यम से पहली बार 268 पदों पर एबीईओ की सीधी भर्ती हुई थी, लेकिन विडंबना यह रही कि भर्ती के बाद भी उन्हें फीडिंग कैडर के रूप में सीमित अवसर ही मिल पाए। वर्ष 2019 में पदोन्नति का हिस्सा 25 प्रतिशत तक बढ़ाया गया, पर संवर्ग की मांग 90 प्रतिशत पदोन्नति की थी—ठीक उसी तर्ज पर जैसे व्याख्याता से प्राचार्य पद पर 90 प्रतिशत पदोन्नति का प्रावधान है।
नए नियम लागू होने के बाद राज्य के 186 विकासखंडों में बीईओ के 75 प्रतिशत पद एबीईओ संवर्ग से भरे जाएंगे। इसे एबीईओ कैडर की बहुप्रतीक्षित मांग पूरी होने के रूप में देखा जा रहा है। शिक्षा विभाग में बीईओ भर्ती का पैटर्न बदलना प्रशासनिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। 25 प्रतिशत एबीईओ ऐसे रह जाएंगे जिन्हें पदोन्नति का लाभ नहीं मिल पाएगा। इस संवर्ग को 10 वर्ष की सेवा के बाद भी क्रमोन्नति का लाभ नहीं मिला है। ऐसे में कई लोगों का मानना है कि जिस तरह प्राचार्य संवर्ग को 25 प्रतिशत प्रतिनियुक्ति से बीईओ बनने का अवसर दिया गया है, वैसे ही वंचित एबीईओ को भी प्राचार्य संवर्ग में अवसर देने पर विचार किया जाना चाहिए।
एबीईओ कैडर की वरिष्ठता सूची को लेकर भी सवाल उठे हैं। राज्य सेवा भर्ती नियमों के प्रावधानों के विपरीत कुछ विसंगतियों की शिकायतें सामने आई हैं, जिन पर स्कूल शिक्षा विभाग आपत्तियों का परीक्षण कर रहा है। अंतिम तस्वीर वरिष्ठता सूची के प्रकाशन और वास्तविक पदोन्नति प्रक्रिया शुरू होने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगी।
राजपत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सहायक विकासखंड शिक्षा अधिकारी के रिक्त पदों में अब 75 प्रतिशत सीधी भर्ती और 25 प्रतिशत पद प्रधान पाठक संवर्ग से प्रतिनियुक्ति द्वारा भरे जाएंगे। इससे पहले 2019 के नियम में एबीईओ पद के लिए 100 प्रतिशत सीधी भर्ती का प्रावधान था।
जिला शिक्षा अधिकारी / उप संचालक के रिक्त पदों में 25 प्रतिशत सीधी भर्ती और 75 प्रतिशत पदोन्नति का प्रावधान किया गया है। पदोन्नति एकीकृत वरिष्ठता सूची के आधार पर प्राचार्य ई/टी संवर्ग, सहायक संचालक और बीईओ से होगी। एससीईआरटी में सहायक प्राध्यापक के पदों में 25 प्रतिशत सीधी भर्ती, 50 प्रतिशत सीमित परीक्षा और 25 प्रतिशत पदोन्नति से भरे जाएंगे।
प्राचार्य के कुल 2643 पदों में 1917 पद वर्तमान में भरे हुए हैं। रिक्त पदों में 10 प्रतिशत शासकीय, निजी अनुदान प्राप्त और स्वायत्तशासी निकायों में कार्यरत शिक्षकों के लिए सीमित परीक्षा से सीधी भर्ती का प्रावधान रखा गया है, जबकि 90 प्रतिशत पद व्याख्याता एवं प्रधान पाठक (पूर्व माध्यमिक, प्रशिक्षित एवं स्नातकोत्तर) से पदोन्नति द्वारा भरे जाएंगे। व्याख्याता पदों में 50 प्रतिशत सीधी भर्ती और 50 प्रतिशत पदोन्नति का प्रावधान रहेगा। सहायक संचालक योजना के पदों पर शत-प्रतिशत सीधी भर्ती की जाएगी। कृषि, तबला और संगीत शिक्षक के पद भी 100 प्रतिशत सीधी भर्ती से भरे जाएंगे। शिक्षक संवर्ग में 50 प्रतिशत सीधी भर्ती और 50 प्रतिशत पदोन्नति का प्रावधान किया गया है, जबकि प्राथमिक एवं मिडिल प्रधान पाठक के पद 100 प्रतिशत पदोन्नति से भरे जाएंगे। सहायक शिक्षक उद्यान और स्पेशल एजुकेटर के पदों पर भी शत-प्रतिशत सीधी भर्ती होगी।
हालांकि इस संशोधन का एक असर 2005 की वरिष्ठता सूची के व्याख्याता शिक्षकों पर भी पड़ सकता है। प्राचार्य पदोन्नति में उनका क्रम अभी काफी दूर है, ऐसे में नई संरचना से उनका इंतजार और लंबा होने की आशंका जताई जा रही है। शिक्षा विभाग में वर्षो से कार्यरत अनुभवी व्याख्याता आज भी प्रदेश के कई विकासखंडों में प्रभारी बीईओ के रूप में जिम्मेदारी निभा रहे हैं और प्रशासनिक अनुभव का लाभ विभाग को मिल रहा है। ऐसे में जानकारों का मानना है कि अनुभव के आधार पर कुछ प्रतिशत पदों का पृथक प्रावधान किया जाता तो संतुलन और बेहतर बन सकता था।
कुल मिलाकर शिक्षा सेवाओं में नई पदोन्नति संरचना लागू कर सरकार ने लंबे समय से चली आ रही असंतुलित व्यवस्था को दुरुस्त करने की कोशिश की है। शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव की पहल को इस बदलाव के पीछे अहम माना जा रहा है। अब असली परीक्षा नियम बनाने की नहीं असल में उन्हें पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से जमीन पर उतारने की है। यदि वर्षो से चल रही प्रभार वाद और तदर्थ व्यवस्था पर वास्तव में अंकुश लगता है, तभी यह संशोधन शिक्षा विभाग में स्थाई प्रशासनिक सुधार के रूप में याद किया जाएगा।





