सूरजपुर (मनीष जायसवाल)। मुनगा के प्लांटेशन कैसा होता इसे समझना हो तो बिलासपुर के दयालबंद रपटा पुल पर खड़े होकर अरपा नदी के दोनों किनारों को देखा जा सकता है। दूर तक लहलहाते मुनगा के पेड़ पहली नजर में किसी बड़े खेत जैसे दिखाई देते हैं। शहर के बीच इतना बड़ा प्लांटेशन पर्यावरण के लिए अपनी अलग जगह बना चुका है। जिन लोगों ने यह काम किया है, उसने पौधा लगाने से आगे उसे पेड़ बनाने की दिशा में काम किया है। इसे एक केस स्टडी की तरह देखा जा सकता है…। महतारी वंदन योजना भी इसी तरह एक अलग केस स्टडी बन चुकी है, जिसमें हर महीने महिलाओं के खाते में एक हजार रुपये पहुंच रहे हैं और उसका सबसे बड़ा असर घर से लेकर गांव के छोटे बाजार तक दिखाई देता है…। अब हर घर मुनगा, घर-घर मुनगा अभियान के जरिए महिला एवं बाल विकास विभाग पौधे को घर और आंगन तक ले जाने की तैयारी में है। खास बात यह है कि इसमें पौधा लगाने के साथ उसकी निगरानी का मॉडल भी रखा गया है..। विभाग की कमान लक्ष्मी रजवाड़े के पास है। ऐसे में इन दोनों योजनाओं का जमीनी असर उनके मंत्री कार्यकाल की पहचान बनाने वाली बातों में शामिल हो सकता है..।

 

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मोदी की गारंटी के तहत् शुरू हुई महतारी वंदन योजना में पात्र महिलाओं को हर महीने एक हजार रुपये सीधे खाते में भेजे जाते हैं। योजना शुरू होने के समय करीब 70 लाख महिलाओं को इससे जोड़ने की बात सामने आई थी और पहली किश्त में 655 करोड़ रुपये जारी हुए थे। अब तक 31 किस्त जारी हो चुकी है। गांव में इस रकम का असर सिर्फ खाते में पैसे आने तक नहीं है..। किराना दुकान, हाट बाजार, बच्चों की पढ़ाई, दवा या घर की छोटी जरूरतों में खर्च होने वाला पैसा स्थानीय बाजार में भी घूमता है। यही वजह है कि किसी योजना का असर आंकड़ों से आगे तब समझ आता है जब उसका संबंध परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ता है।

 

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अब इसी सोच को हर घर मुनगा, घर-घर मुनगा अभियान आगे ले जाता दिखाई देता है। 13 सितंबर को शुरू किए गए इस अभियान में प्रदेश के 52,553 आंगनबाड़ी केंद्रों और करीब 7.88 लाख परिवारों को जोड़ने की बात कही गई है…। हर आंगनबाड़ी केंद्र क्षेत्र में 15 मुनगा के पौधे लगाने की योजना है और पौधों की निगरानी के लिए डिजिटल डैशबोर्ड भी बनाया जा रहा है।

 

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पौधा लगा देना इस अभियान का आखिरी काम नहीं है। असली तस्वीर तब सामने आएगी जब पौधा गर्मी, पानी की कमी और दूसरे दबावों के बीच बचा रहेगा…। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से लेकर पर्यवेक्षक, परियोजना अधिकारी और जिला स्तर तक जिम्मेदारी जोड़ने की व्यवस्था इसी वजह से महत्वपूर्ण है। पौधा लगाया गया या नहीं, बचा या नहीं और जरूरत पड़ी तो दोबारा लगाया गया या नहीं, इसकी निगरानी योजना को सामान्य पौधारोपण अभियान से अलग करती है..!

 

मुनगा को यहां पर्यावरण के साथ पोषण से जोड़ा गया है। इसकी पत्तियां और फल घर के आसपास उपलब्ध हों तो परिवार को स्थानीय स्तर पर पोषण का एक साधन मिल सकता है। एक पौधा घर तक पहुंचता है, परिवार उसकी देखभाल करता है और पेड़ बड़ा होने पर उसका लाभ भी उसी घर को मिलता है। अगर यह मॉडल बड़ी संख्या में घरों तक टिकता है तो इसका असर हरियाली और पोषण दोनों स्तर पर देखा जा सकता है।

 

लक्ष्मी रजवाड़े के लिए इन योजनाओं का महत्व यहीं से शुरू होता है। वे भटगांव से विधायक हैं और महिला एवं बाल विकास तथा समाज कल्याण विभाग की मंत्री हैं। महतारी वंदन सरकार की बड़ी योजना है, इसलिए इसका श्रेय किसी एक मंत्री के खाते में डालना ठीक नहीं होगा…। यह भारतीय जनता पार्टी की सरकार के मोदी की गारंटी वाले संकल्प पत्र में शामिल योजना है और इसकी 31वीं किस्त भी जारी हो चुकी है..। मुख्यमंत्री से लेकर विभाग और जिला स्तर के प्रशासन तक पूरी व्यवस्था इसके संचालन में लगी है। इसके बावजूद जिस विभाग के जरिए यह योजना महिलाओं तक पहुंच रही है, उस विभाग के मंत्री के कामकाज और पहचान का इससे जुड़ना स्वाभाविक है..। ऐसे में महतारी वंदन के बाद हर घर मुनगा, घर-घर मुनगा जैसा अभियान भी उनके विभाग की दिशा और कामकाज को अलग पहचान देने वाला बन सकता है।

कहते है कि राजनीति में किसी नेता की पहचान पद से ज्यादा काम से बनती है। किसी महिला के खाते में हर महीने पहुंचने वाला पैसा और किसी परिवार के घर खड़ा मुनगा का पेड़ दो अलग तरह के अनुभव है..। एक तत्काल जरूरत में काम आता है, दूसरा समय के साथ घर का अपना संसाधन बन सकता है..। अगर दोनों योजनाओं का असर लोगों को लगातार दिखाई देता है तो उनका उल्लेख लक्ष्मी रजवाड़े के मंत्री कार्यकाल के साथ होना स्वाभाविक है..।

 

यहीं उनके राजनीतिक सफर का एक महत्वपूर्ण पहलू भी सामने आता है। किसी नेता का इतिहास पहले से तय नहीं होता। वह काम और उसके असर से दर्ज होता है। महिला बाल विकास के जरिए एक बड़ा नेटवर्क पहले से जमीन पर है, जबकि हर घर मुनगा अभी शुरुआत में है..। आने वाले समय में इसकी असली कसौटी पौधों की संख्या नहीं, बचे हुए पेड़ों की संख्या और परिवारों को मिला लाभ होगा..। अगर अभियान अपने तय लक्ष्य तक पहुंचता है तो यह लक्ष्मी रजवाड़े के विभागीय कार्यकाल की एक अलग पहचान बन सकता है।

 

बिलासपुर के दयालबंद रपटा पुल से दिखाई देने वाला मुनगा का प्लांटेशन यही बात अपने तरीके से समझाता है। पौधा लगाने का काम एक दिन में हो जाता है, पेड़ बनने में समय लगता है..। राजनीति में भी किसी योजना की घोषणा एक दिन की खबर होती है, उसका असर लंबे समय तक दिखाई दे तो वही काम पहचान बनता है। महतारी वंदन और हर घर मुनगा के मामले में भी यही फर्क महत्वपूर्ण है..। इन योजनाओं का जमीन पर असर जितना टिकाऊ होगा, लक्ष्मी रजवाड़े के राजनीतिक रिकॉर्ड में उनका स्थान उतना ही अलग दिखाई दे सकता है।