बिलासपुर…सरकारी स्कूलों में सोमवार से त्रैमासिक परीक्षा शुरू हो गई, लेकिन परीक्षा के साथ ही शिक्षा व्यवस्था के दो गंभीर सवाल सामने आ गए हैं। कई सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों तक पूरी पाठ्यपुस्तकें नहीं पहुंचने की शिकायत है, वहीं परीक्षा के प्रश्नपत्र प्राचार्यों को व्हाट्सएप के जरिए भेजे गए और अब यह प्रश्नपत्र मोबाइलों तक पहुंच चुका है। जिस समय देशभर में प्रश्नपत्रों की गोपनीयता और पेपर लीक को लेकर सवाल उठते रहे हैं, उस समय परीक्षा का प्रश्नपत्र इस तरह मोबाइल के जरिए प्रसारित होना परीक्षा व्यवस्था की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

दूसरी तरफ निजी स्कूलों में अर्धवार्षिक परीक्षाएं चल रही हैं, जबकि सरकारी स्कूल अभी त्रैमासिक परीक्षा में पहुंचे हैं। जिले में सरकारी और निजी स्कूलों की कुल संख्या 1453 है। इन स्कूलों के बीच परीक्षा व्यवस्था की यह अलग-अलग तस्वीर सिर्फ तारीखों का अंतर नहीं है। इसके पीछे सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की गति, पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता और अंततः विद्यार्थियों के वार्षिक परिणाम का सवाल भी जुड़ा है।

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परीक्षा शुरू, स्कूलों में पूरी किताबें नहीं

सरकारी स्कूलों में सोमवार दोपहर एक बजे से त्रैमासिक परीक्षा शुरू हुई। परीक्षा शुरू होने के समय भी कई सरकारी स्कूलों में सभी विषयों की पाठ्यपुस्तकें विद्यार्थियों तक नहीं पहुंचने की शिकायत है। कहीं किताबें आंशिक रूप से पहुंची हैं तो कहीं कुछ विषयों की किताबों का इंतजार है। ऐसे में जिस पाठ्यक्रम के आधार पर परीक्षा होनी है, उसकी पूरी किताबें विद्यार्थियों के पास हैं या नहीं, यह स्थिति एक समान नहीं है।

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राजा पांडेय—मांग पर भेजते हैं किताबें

छत्तीसगढ़ पाठ्यपुस्तक निगम के अध्यक्ष राजा पांडेय ने पाठ्यपुस्तकों की आपूर्ति की प्रक्रिया स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकारी स्कूलों से किताबों की मांग प्राप्त होने पर निगम स्तर पर उसकी प्रक्रिया पूरी की जाती है। स्कूलों से सीडी और लिखित आवेदन के माध्यम से मांग ली जाती है और उसी के आधार पर पाठ्यपुस्तकें भेजी जाती हैं। उनका कहना है कि जहां से पाठ्यपुस्तकों की मांग मिली है, वहां किताबें भेजी गई हैं। अब जिन सरकारी स्कूलों से दोबारा किताबों की मांग आ रही है, वहां पुनर्वितरण भी शुरू कर दिया गया है।

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राजा पांडेय के मुताबिक, यदि निगम से किताबें भेजे जाने के बाद भी किसी सरकारी स्कूल या विद्यार्थी तक वे नहीं पहुंची हैं तो यह देखना होगा कि वितरण व्यवस्था में कमी कहां हुई। यानी निगम स्तर पर मांग लेकर आपूर्ति की जा रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर किताबों की कमी की शिकायत मिलने पर बीच की वितरण व्यवस्था की पड़ताल जरूरी होगी।

व्हाट्सएप पर प्रश्नपत्र, मोबाइलों तक पहुंचा

परीक्षा व्यवस्था का दूसरा और अधिक गंभीर पहलू प्रश्नपत्र की गोपनीयता से जुड़ा है। प्राचार्यों को प्रश्नपत्र व्हाट्सएप के जरिए भेजे गए और उन्हें प्रिंट निकालकर विद्यार्थियों को देने की व्यवस्था की गई। अब यही प्रश्नपत्र मोबाइलों तक पहुंच चुका है।

प्रश्नपत्र का इस तरह मोबाइल के जरिए प्रसारित होना परीक्षा की गोपनीयता पर सीधा सवाल है। देश में पेपर लीक को लेकर लगातार उठते सवालों के बीच यह देखना जरूरी है कि प्रश्नपत्र कितने लोगों के मोबाइल तक पहुंच रहा है, उसकी निगरानी कैसे हो रही है और उसे आगे प्रसारित होने से रोकने की व्यवस्था क्या है। इसे सीधे पेपर लीक कहना अलग विषय है, लेकिन गोपनीय प्रश्नपत्र का इस तरह मोबाइलों तक पहुंचना व्यवस्था की सुरक्षा पर सवाल खड़ा करता है।

नए जिला शिक्षा अधिकारी ने भी मामले को गंभीरता से लिया है। उन्होंने कहा कि व्हाट्सएप के जरिए प्रश्नपत्र भेजने की व्यवस्था गलत है और इसमें जल्द सुधार किया जाएगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि प्रश्नपत्र की गोपनीयता से जुड़े मामले पर विभाग नजर रखेगा। करीब एक सप्ताह पहले ही जिम्मेदारी संभालने वाले जिला शिक्षा अधिकारी के सामने आया यह मामला अब व्यवस्था सुधारने की उनकी पहली बड़ी परीक्षा भी है।

त्रैमासिक के 35, अर्धवार्षिक के 30 प्रतिशत अंक 

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि त्रैमासिक परीक्षा के 35 प्रतिशत और अर्धवार्षिक परीक्षा के 30 प्रतिशत अंक वार्षिक परिणाम में शामिल किए जाने हैं। यानी शुरुआती दोनों परीक्षाओं के अंक विद्यार्थियों के अंतिम परिणाम में बड़ा हिस्सा तय करेंगे।

ऐसे में किताबों की उपलब्धता और प्रश्नपत्र की गोपनीयता महज परीक्षा तक सीमित विषय नहीं रह जाते। सवाल यह है कि जब परीक्षा के समय ही पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता को लेकर शिकायतें हैं और प्रश्नपत्र की सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं, तब इन परीक्षाओं के आधार पर बनने वाले वार्षिक परिणाम की प्रक्रिया कितनी विश्वसनीय रहेगी।

निजी स्कूल अर्धवार्षिक में, सरकारी त्रैमासिक में

एक ही जिले में निजी स्कूलों में अर्धवार्षिक और सरकारी स्कूलों में त्रैमासिक परीक्षा का अंतर भी सामने है। निजी स्कूल जहां अर्धवार्षिक परीक्षा तक पहुंच चुके हैं, वहीं सरकारी स्कूलों में अभी त्रैमासिक परीक्षा शुरू हुई है। परीक्षा कैलेंडर में यह अंतर क्यों है, सरकारी स्कूलों की शैक्षणिक गति निजी स्कूलों से अलग क्यों है और इसका विद्यार्थियों की पढ़ाई तथा वार्षिक परिणाम पर क्या असर पड़ेगा—यह भी शिक्षा विभाग के लिए जवाबदेही का सवाल है।

कॉपी लेकर आने को कहा, सवालों में व्यवस्था

शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में विद्यार्थियों से उत्तर पुस्तिका के लिए कॉपी लेकर आने को कहे जाने की जानकारी भी सामने आई है। इससे परीक्षा में उत्तर पुस्तिका की व्यवस्था और निगरानी पर सवाल खड़े हुए हैं। प्रश्नपत्र से लेकर उत्तर पुस्तिका तक परीक्षा के अलग-अलग चरणों में मानक व्यवस्था कितनी एकरूप है, यह भी जांच का विषय है।

जिला शिक्षा अधिकारी ने कहा कि अधिकांश स्कूलों में किताबें पहुंच चुकी हैं। जहां से शिकायत मिलेगी, वहां स्थिति दुरुस्त की जाएगी और जरूरत के अनुसार पुनर्वितरण कराया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि त्रैमासिक और अर्धवार्षिक परीक्षाओं के अंक वार्षिक परिणाम में शामिल होंगे।

बहरहाल परीक्षा शुरू हो गई है, लेकिन व्यवस्था के सामने दो सवाल पहले ही खड़े हैं—किताबें विद्यार्थियों तक पूरी क्यों नहीं पहुंचीं और प्रश्नपत्र मोबाइलों तक कैसे पहुंच गया? इन दोनों सवालों के जवाब से ही परीक्षा व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर साफ होगी।