बिलासपुर…सरकारी स्कूलों में संस्कृत के विकल्प के रूप में शुरू किया गया व्यावसायिक पाठ्यक्रम बिलासपुर में दो साल बाद भी जमीन पर नहीं उतर सका। कक्षा 9वीं से 12वीं के विद्यार्थियों को कंप्यूटर साइंस, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, हॉस्पिटैलिटी समेत कई व्यावसायिक विषय चुनने का विकल्प दिया गया था। इन विषयों के लिए शिक्षा विभाग ने सीधे भर्ती करने के बजाय ठेका कंपनी के माध्यम से 90 से 100 से अधिक शिक्षकों को नियुक्त कराया। शिक्षकों के वेतन का भुगतान करीब दो साल से चलता रहा, लेकिन जिस व्यावसायिक कोर्स के लिए यह पूरी व्यवस्था खड़ी की गई थी, वह कोर्स ही शुरू नहीं हुआ। बच्चे संस्कृत पढ़ते रहे और व्यावसायिक शिक्षा के नाम पर शिक्षक और वेतन की व्यवस्था चलती रही।

संस्कृत नहीं लेने पर व्यावसायिक विषय 

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योजना में 9वीं से 12वीं तक के उन विद्यार्थियों को विकल्प दिया गया था, जो संस्कृत नहीं पढ़ना चाहते थे। कंप्यूटर साइंस, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और हॉस्पिटैलिटी जैसे विषय इसी विकल्प का हिस्सा थे।

व्यवस्था के तहत ठेका कंपनी को शिक्षकों की उपलब्धता का जिम्मा दिया गया। कंपनी के माध्यम से शिक्षकों की नियुक्ति हुई। लेकिन स्कूलों में व्यावसायिक पाठ्यक्रम शुरू नहीं हुआ। न विद्यार्थियों को इन विषयों की नियमित पढ़ाई मिली, न कोर्स जमीन पर उतरा।

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परीक्षा शुरू, लेकिन कोर्स गायब

सरकारी स्कूलों में त्रैमासिक परीक्षाएं शुरू हो चुकी हैं। शैक्षणिक सत्र आगे बढ़ चुका है। इसके बावजूद व्यावसायिक पाठ्यक्रम के संचालन की स्थिति वही है—कोर्स शुरू नहीं हुआ।

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योजना के नाम पर शिक्षक नियुक्त हुए और भुगतान चलता रहा। लेकिन विद्यार्थियों के लिए निर्धारित विषय की पढ़ाई शुरू नहीं हुई। ऐसे में दो साल तक शिक्षकों की नियुक्ति और वेतन भुगतान किस आधार पर चलता रहा, यह इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है।

ठेका कंपनी के शिक्षक कहां हैं?

90 से 100 से अधिक शिक्षकों को ठेका कंपनी के माध्यम से रखा गया। अब सवाल यह नहीं है कि कक्षाएं कितनी नियमित लगीं। सवाल सीधा है—जब कोर्स ही शुरू नहीं हुआ तो ये शिक्षक किस काम के लिए रखे गए थे?

किस शिक्षक को किस स्कूल के लिए रखा गया? उनकी उपस्थिति कहां दर्ज हुई? किस अधिकारी ने उनके काम का सत्यापन किया? कितने शिक्षकों को कितने महीनों का वेतन दिया गया? और जब विद्यार्थियों को व्यावसायिक विषय पढ़ाए ही नहीं गए तो भुगतान किस आधार पर जारी रहा?

यदि रिकॉर्ड में शिक्षक मौजूद और भुगतान जारी है, लेकिन संबंधित कोर्स जमीन पर शुरू ही नहीं हुआ, तो यह संभावित वित्तीय अनियमितता की जांच का सीधा मामला बनता है।

किताबे पाठ्यपुस्तक निगम ने दी : राजा पांडेय

छत्तीसगढ़ पाठ्यपुस्तक निगम के अध्यक्ष राजा पांडेय ने कहा कि व्यावसायिक पाठ्यक्रम की जिन पुस्तकों की मांग संबंधित विभाग ने की, निगम ने उसके अनुसार किताबें उपलब्ध कराई हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जो भी पुस्तक मांगी गई, उसे निगम ने उपलब्ध कराया है।

राजा पांडेय ने यह भी स्पष्ट किया कि व्यावसायिक पाठ्यक्रम शुरू होना नीतिगत और शिक्षा विभाग से जुड़ा विषय है। यानी किताब की मांग होने पर निगम ने अपनी ओर से आपूर्ति की, लेकिन कोर्स शुरू क्यों नहीं हुआ और कक्षाएं क्यों नहीं चलीं, यह शिक्षा विभाग की व्यवस्था से जुड़ा मामला है।

कंपनी को शिक्षक देने थे, बच्चों को कोर्स मिलना था

पूरी व्यवस्था में ठेका कंपनी की भूमिका सीधे सामने आती है। कंपनी ने शिक्षकों को रखा, शिक्षकों के माध्यम से व्यावसायिक विषयों की पढ़ाई होनी थी। लेकिन पढ़ाई शुरू ही नहीं हुई।

ऐसे में कंपनी के साथ हुए अनुबंध की शर्तें, प्रति शिक्षक भुगतान, कुल भुगतान, शिक्षकवार उपस्थिति और स्कूलवार तैनाती महत्वपूर्ण दस्तावेज बन जाते हैं। यदि अनुबंध में कक्षाएं संचालित करना शामिल था और कोर्स शुरू ही नहीं हुआ, तो कंपनी को हुए भुगतान और वास्तविक काम के बीच का अंतर जांच का विषय बनता है।

कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए यह व्यवस्था बनी या विभागीय स्तर पर निगरानी पूरी तरह फेल रही—इसका जवाब रिकॉर्ड और जांच से ही सामने आएगा।

विभाग को अब पता चलेगा कि कोर्स चला भी या नहीं

नव पदस्थ शिक्षा अधिकारी ने कहा कि मामले को गंभीरता से लिया जाएगा। बैठक कर स्थिति की समीक्षा की जाएगी और शासन को भी अवगत कराया जाएगा।

यानी करीब दो साल से चल रही योजना की वास्तविक स्थिति अब समीक्षा के जरिए सामने आएगी। शिक्षक नियुक्त हुए, वेतन का भुगतान हुआ, लेकिन जिस पाठ्यक्रम को विद्यार्थियों के लिए शुरू किया जाना था, वह शुरू ही नहीं हुआ।

दो साल का भुगतान, 100 से ज्यादा शिक्षक,कोर्स शून्य

अब पूरे मामले की तस्वीर तीन आंकड़ों से सामने आएगी—कितने शिक्षक रखे गए, दो साल में कितना भुगतान हुआ और कितने विद्यार्थियों को वास्तव में व्यावसायिक शिक्षा मिली।

इसके साथ ठेका कंपनी के अनुबंध, शिक्षकवार उपस्थिति, स्कूलवार तैनाती और भुगतान रिकॉर्ड सामने आने पर यह भी स्पष्ट होगा कि बिना कोर्स शुरू किए वेतन भुगतान कैसे चलता रहा।

संस्कृत के विकल्प के रूप में विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा देने की योजना थी। विद्यार्थी संस्कृत पढ़ते रहे। ठेका कंपनी ने 90 से 100 से अधिक शिक्षक रखे। करीब दो साल से वेतन भुगतान चलता रहा। लेकिन व्यावसायिक कोर्स शुरू ही नहीं हुआ। परीक्षा भी शुरू हो गई और अब विभाग समीक्षा की बात कर रहा है। दो साल की इस पूरी व्यवस्था में पैसा कहां गया, शिक्षक कहां रहे और बच्चों तक पढ़ाई क्यों नहीं पहुंची—इन तीन सवालों का जवाब ही पूरे मामले की असली तस्वीर सामने रखेगा।