रामानुजगंज (पृथ्वी लाल केशरी)। सुशासन तिहार के मंच से सरकार भले ही त्वरित समाधान और जनसुनवाई के दावे कर रही हो, लेकिन जनपद पंचायत रामचंद्रपुर की ग्राम पंचायत विजयनगर में आयोजित जन समस्या निवारण शिविर ने इन दावों पर सवाल खड़े कर दिए। फर्जी ऋण के बोझ तले दबा एक किसान पूरे पंडाल में अपनी फरियाद लेकर भटकता रहा, लेकिन उसे राहत नहीं मिली।

ग्राम विजयनगर निवासी किसान सहदेव पिता लट्टू अपने नाम पर दर्ज कथित फर्जी ऋण को हटाने की मांग लेकर शिविर पहुंचा था। किसान का आरोप है कि उसने वर्ष 2024-25 में कोई नगद ऋण नहीं लिया, फिर भी बैंक रिकॉर्ड में उसके नाम पर ऋण दर्ज है और करीब 92 हजार रुपये बकाया बताया जा रहा है। इतना ही नहीं, ऋण राशि जमा करने के बाद ही धान बिक्री का भुगतान जारी करने की बात कही जा रही है।

समिति ने दिया प्रमाणपत्र, फिर भी नहीं हटा ऋण

किसान ने दस्तावेज दिखाते हुए बताया कि आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित महावीरगंज के प्रभारी ने लिखित प्रमाणपत्र जारी कर स्पष्ट किया है कि वर्ष 2024-25 में सहदेव को किसी प्रकार का नगद ऋण नहीं दिया गया। इसके बावजूद बैंक रिकॉर्ड में दर्ज ऋण को हटाने की कार्रवाई नहीं हुई।

सहदेव का कहना है कि वह महीनों से बैंक और संबंधित कार्यालयों के चक्कर काट रहा है, लेकिन हर जगह सिर्फ आश्वासन मिल रहा है, समाधान नहीं।

पंडाल में सवाल—मेरी सुनवाई कौन करेगा?

शिविर में पहुंचे किसान ने अपनी पीड़ा कई अधिकारियों और मौजूद लोगों को बताई। समाधान न मिलने पर वह पूरे पंडाल में घूम-घूमकर अपनी समस्या सुनाता रहा। आखिरकार उसकी व्यथा मीडिया तक पहुंची। किसान का दर्द साफ था—जिस व्यवस्था से न्याय की उम्मीद लेकर आया, वहीं उसकी शिकायत अनसुनी रह गई।

बैंक स्टॉल गायब, जिम्मेदार मौन

सबसे बड़ा सवाल उस समय खड़ा हुआ जब लोगों ने बताया कि शिविर में विभिन्न विभागों के स्टॉल तो लगे थे, लेकिन जिस बैंक पर फर्जी ऋण का आरोप है, उसका स्टॉल नजर नहीं आया। हैरानी की बात यह रही कि शिविर में मौजूद प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने भी इस कमी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

किसानों के नाम पर राजनीति, समस्याओं पर चुप्पी?

स्थानीय लोगों का कहना है कि किसानों के नाम पर बड़ी-बड़ी घोषणाएं और राजनीतिक बयान तो खूब दिए जाते हैं, लेकिन जब कोई किसान दस्तावेज लेकर न्याय मांगने पहुंचता है तो उसे भटकने के लिए छोड़ दिया जाता है। फर्जी ऋण का मामला कोई नया नहीं है, जिले में पहले भी ऐसे कई आरोप सामने आ चुके हैं।

  किसान की सुनवाई उसके टूटने के बाद होगी?

सुशासन तिहार का उद्देश्य जनता की समस्याओं का मौके पर समाधान बताकर प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन विजयनगर का यह मामला पूछ रहा है कि यदि प्रमाणपत्र के बावजूद किसान को राहत नहीं मिलती, तो ऐसे शिविरों का वास्तविक उद्देश्य क्या है? फर्जी ऋण के आरोपों से घिरा किसान आज भी जवाब और न्याय का इंतजार कर रहा है, जबकि प्रशासनिक दावे मंचों से लगातार गूंज रहे हैं।