HPV vaccine PIL।दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के एचपीवी टीकाकरण अभियान पर रोक लगाने से बुधवार को इनकार कर दिया, लेकिन साथ ही स्पष्ट चेतावनी दी कि “अधूरे परीक्षण वाले टीके” जनता को नहीं लगाए जाने चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा 14 वर्ष की बालिकाओं को 55 लाख टीके लगाए जाने संबंधी प्रस्तुत आंकड़ों से किसी भी “तत्काल नुकसान” का संकेत नहीं मिलता, इसलिए टीकाकरण अभियान पर रोक लगाने का कोई कारण नहीं दिखता।

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में “गंभीर मुद्दे” उठाए गए हैं, क्योंकि पहले भी टीकों के परीक्षण और उनके उपयोग की मंजूरी संबंधी निर्धारित प्रोटोकॉल के उल्लंघन के मामले सामने आ चुके हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहां टीकों को उपयोग में लाने से पहले आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, हालांकि इस मामले में नियमों का पालन हुआ है या नहीं, इस पर कोई टिप्पणी करने से अदालत ने परहेज किया और कहा कि इस मामले को पूरी गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

अदालत ने साफ शब्दों में कहा, “अधूरे परीक्षण वाले टीके नहीं लगाए जाने चाहिए। हमारा उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि आवश्यक प्रोटोकॉल का पालन किया जाए।”

पीठ उस जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें अधिकारियों को एचपीवी टीकों को सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करने के फैसले पर पुनर्विचार और समीक्षा करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। याचिका में इन टीकों की दीर्घकालिक सुरक्षा, टीका लगवाने वालों की सहमति न लेने और टीकाकरण के बाद होने वाली किसी भी प्रतिकूल घटना की निगरानी व्यवस्था को लेकर चिंता जताई गई थी।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने अदालत को बताया कि एचपीवी टीकाकरण को अभी सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (यूआईपी) में शामिल नहीं किया गया है। उन्होंने बताया कि 25 जुलाई तक लगाए गए 55 लाख टीकों में से 120 मामलों में प्रतिकूल प्रभावों की सूचना मिली, जिनमें से केवल 42 मामलों में ही स्थिति “थोड़ी गंभीर” हुई, जबकि टीकाकरण के बाद किसी भी मृत्यु की सूचना नहीं मिली। विधि अधिकारी ने अदालत को आश्वासन दिया कि एचपीवी टीकों को शुरू करने से पहले सभी निर्धारित प्रक्रियाओं का विधिवत पालन किया गया था। केंद्र सरकार की ओर से अधिवक्ता आशीष दीक्षित भी पेश हुए।

गौरतलब है कि जनहित याचिका के अनुसार तमिलनाडु की एक 14 वर्षीय लड़की को 30 मार्च 2026 को कनाई स्थित सरकारी अस्पताल में एचपीवी का टीका लगाया गया था। याचिका में आरोप लगाया गया कि तीन से चार दिनों के भीतर उसमें स्वास्थ्य संबंधी गंभीर लक्षण विकसित हो गए, जिनमें आवाज का चले जाना, शरीर के एक तरफ लकवा जैसी स्थिति, चलने में असमर्थता और धुंधला तथा कम दिखाई देना शामिल था। याचिका में कहा गया कि उसे गंभीर स्थिति में आईसीयू में भर्ती करना पड़ा, जहां उसे नसों के जरिए दवाएं दी गईं और वह कई दिनों तक बिस्तर पर पड़ी रही, लेकिन उसकी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया।

याचिका में यह भी दावा किया गया कि ग्वालियर और बिहार से सामने आए इसी तरह के मामलों ने टीकों की सुरक्षा और निगरानी को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। इसमें यह भी कहा गया कि इस टीके का लंबे समय तक क्या प्रभाव रहेगा, यह भी अभी “स्पष्ट नहीं है”। इस मामले की अगली सुनवाई 29 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।