डबल यू-डाइस, डबल रोल नंबर… नारायण ई-टेक्नो स्कूल पर ‘शिक्षा घोटाले’ के गहरे साए, सिस्टम खामोश या साझेदार?
शिक्षा व्यवस्था के भीतर का ‘डार्क ज़ोन’ उजागर.. शुरू हुआ मांडवली दबली का खेल

बिलासपुर/रायपुर…बिलासपुर समेत प्रदेश के रायपुर, दुर्ग और भिलाई में संचालित नारायण ई-टेक्नो स्कूल अब महज एक निजी शिक्षण संस्था नहीं रहा। हालात ऐसे बन चुके हैं कि यह भ्रष्टाचार, प्रभाव और प्रशासनिक ढिलाई का पर्याय बनता जा रहा है। जिस तरह कभी डॉल्फिन स्कूल प्रकरण ने शासन-प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया था, वैसी ही तस्वीर एक बार फिर उभर रही है—फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार जिम्मेदार विभाग सब कुछ जानते हुए भी खामोश है।
डबल पंजीयन, नियमों की अनदेखी
दस्तावेज बताते हैं कि बिलासपुर शाखा को अगस्त में मान्यता मिलने के बाद करीब 250 छात्रों का यू-डाइस पंजीयन यहीं किया गया। इसी दौरान रायपुर शाखा को मान्यता नहीं मिली, जिसके चलते वहां पढ़ने वाले लगभग 250 छात्रों को भी बिलासपुर के यू-डाइस में दर्ज कर दिया गया। यानी जिन छात्रों का वास्तविक प्रवेश रायपुर में हुआ, उन्हें बिलासपुर की प्रवेश संख्या दी गई, ताकि वे परीक्षा प्रक्रिया में शामिल हो सकें। यह सीधे-सीधे नियमों का उल्लंघन है—एक छात्र का दो स्थानों पर पंजीयन संभव ही नहीं।
प्रवेश रायपुर में, पहचान बिलासपुर—सिस्टम झुका?
सबसे बड़ा सवाल यही है—जब दाखिला रायपुर में हुआ, तो पहचान बिलासपुर की क्यों दी गई? किस आधार पर प्रवेश संख्या जारी हुई? और क्या यह पूरा तंत्र सिर्फ इसलिए मोड़ा गया ताकि बिना मान्यता के भी परीक्षा दिलाई जा सके? यह स्थिति प्रशासनिक निगरानी की विफलता नहीं, बल्कि सिस्टम के झुकने का संकेत देती है।
24 दिन की मान्यता, ‘डबल रोल नंबर’ का खेल
मामला तब और गंभीर हो जाता है जब रायपुर शाखा को महज 24 दिनों की अस्थायी मान्यता दी जाती है। इसके बाद कलेक्टर स्तर से कक्षा 5वीं के छात्रों को रायपुर से परीक्षा देने की अनुमति मिलती है।
विरोधाभास साफ है कि छात्र बिलासपुर यू-डाइस में दर्ज हैं। लेकिन परीक्षा रायपुर से,और रोल नंबर भी रायपुर से जारी है। यानी एक ही छात्र के लिए दो प्रशासनिक पहचान—यह सिर्फ त्रुटि नहीं, व्यवस्थित हेरफेर का संकेत है।
यहां एब्सेंट, वहां प्रेजेंट—रिकॉर्ड गवाही दे रहा
पांचवीं बोर्ड परीक्षा के दौरान रोजाना करीब 28 छात्र बिलासपुर में अनुपस्थित दर्ज हो रहे हैं, जबकि वही छात्र रायपुर में परीक्षा दे रहे हैं। सीधा मतलब—एक ही छात्र को दो रोल नंबर जारी। यह परीक्षा प्रणाली का मजाक ही नहीं, बल्कि यू-डाइस जैसे डिजिटल सिस्टम के दुरुपयोग का खुला उदाहरण है।
दो रोल नंबर कैसे? तकनीक खामोश
नियम साफ हैं—एक छात्र को दो संस्थानों से प्रवेश संख्या और रोल नंबर जारी नहीं हो सकते। और बिना बिलासपुर से नाम हटाए रायपुर में दोबारा पंजीयन तकनीकी रूप से संभव नहीं।णऐसे में यह केवल गलती नहीं हो सकती।
यह बिना प्रशासनिक स्तर पर समन्वय के संभव ही नहीं।
दाखिल-खारिज रजिस्टर भी कटघरे में
सवाल और गहरे हैं कि क्या ये छात्र बिलासपुर के उपस्थिति रजिस्टर में दर्ज हैं? क्या दाखिल-खारिज रजिस्टर में उनका नाम है? अगर दर्ज हैं तो रायपुर में परीक्षा कैसे? अगर दर्ज नहीं हैं तो पंजीयन किस आधार पर? यह पूरी रिकॉर्ड प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।
जांच समिति: कार्रवाई नहीं, औपचारिकता
बताते चले कुछ दिन पहले ही खबर प्रकाशित की गई थी कि नारायण ई टेक्नो स्कूल की मान्यता गलत तरीके से ली गई है और यहां बोर्ड की जगह सीबीएसई का पाठ पढ़ाया जा रहा है और परीक्षा बोर्ड के लिए जा रही है । मामले को जिला शिक्षा विभाग निगम वीरता से लिया और जांच के लिए तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया । लेकिन जांच की पूरी प्रक्रिया औपचारिकता बनकर रह गई। सूत्रों के अनुसार समिति स्कूल पहुंची, औपचारिकता निभाई और लौटते वक्त साफ कह दिया—फीस और सिलेबस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं। यह बयान कार्रवाई नहीं, जिम्मेदारी से बचाव का संकेत देता है।
मान्यता 9वीं-12वीं की, पढ़ाई 1वीं से 7वीं तक
नारायण ई-टेक्नो स्कूल को 9वीं से 12वीं तक की मान्यता दी गई है। वह भी 1 अप्रैल से प्रभावी होनी है। इसके बावजूद 1 से 7वीं तक सीबीएसई सिलेबस चलाया जा रहा है, जबकि ये कक्षाएं राज्य बोर्ड के अधीन हैं। राज्य की पुस्तकों को लागू नहीं किया गया, लेकिन छात्रों को बोर्ड परीक्षा दिलाई जा रही है। यह सीधा नियम उल्लंघन है, जिसे जांच में नजरअंदाज कर दिया गया।
मान्यता की समयरेखा भी संदेह में
मान्यता अगस्त में दी गई, जबकि जांच समिति जनवरी में गठित हुई। इस बीच क्या हुआ, कैसे पंजीयन हुए, किस आधार पर संचालन चला—इन अहम सवालों को जांच में शामिल ही नहीं किया गया। यानी सबसे महत्वपूर्ण अवधि को ही नजरअंदाज कर दिया गया।
बंद कमरे की बैठक, क्लीन सिटी की तैयारी
लगातार संकट में गिरते नजर आने के बाद नारायण प्रबंधन की एक दिन पहले यानी गुरुवार को जिला शिक्षा विभाग के बीच बंद कमरे में बैठक हुई। इसके बाद विभाग ने स्पष्ट जवाब देने के बजाय एक सामान्य दस्तावेज थमा दिया, जिसमें सिर्फ इतना कहा गया कि मान्यता शासन से जुड़ी है। जबकि असली सवाल मान्यता के दुरुपयोग का था—जिस पर चुप्पी साध ली गई।
प्रभाव, दबाव और मिलीभगत की आशंका
पूरे घटनाक्रम से संकेत साफ हैं—प्रबंधन ने प्रभाव और संसाधनों के जरिए सिस्टम को प्रभावित किया। जिला शिक्षा विभाग का रवैया, जांच की औपचारिकता और लगातार अनदेखी—ये सब मिलकर मिलीभगत की आशंका को मजबूत करते हैं।
शिक्षा की साख दांव पर
यह मामला अब एक स्कूल तक सीमित नहीं है। यह शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है। डबल यू-डाइस, डबल रोल नंबर, बिना मान्यता संचालन और प्रशासन की चुप्पी—ये सभी संकेत एक बड़े घोटाले की ओर इशारा करते हैं।
सवाल सीधा है कि क्या शासन इस पर सख्त कार्रवाई करेगा, या यह मामला भी डॉल्फिन स्कूल की तरह फाइलों में दफन हो जाएगा?





