बिलासपुर (मनीष जायसवाल)। केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan के इस्तीफे के बाद छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा मंत्री Gajendra Yadav उनके बचाव में सामने आए। उनका कहना है कि किसी विभाग में हुई हर गड़बड़ी के लिए मंत्री को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। बयान आया और राजनीतिक बहस शुरू हो गई।

लेकिन अगले ही दिन रायपुर में 12वीं बोर्ड के हिंदी पेपर लीक मामले को लेकर छात्रों ने गजेंद्र यादव के इस्तीफे की मांग शुरू कर दी। यहीं से पूरी तस्वीर बदल गई। अब बहस दिल्ली की नहीं, रायपुर की भी है। जिस तर्क से Dharmendra Pradhan का बचाव किया गया, अब वही तर्क Gajendra Yadav के अपने विभाग के सामने खड़ा दिखाई दे रहा है।

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12वीं बोर्ड के हिंदी पेपर लीक मामले में आखिर जिम्मेदार कौन था..? कार्रवाई कहां तक पहुंची..? समय बीतने के साथ मामला ठंडा जरूर पड़ गया, लेकिन छात्रों के मन में भरोसा अब भी नहीं लौटा है।

उन्हें यह जानना है कि अगला पेपर लीक नहीं होगा, इसकी गारंटी कौन देगा..? युवाओं के बीच राजनीतिक जवाबदेही की मांग पहले से ज्यादा मुखर दिखाई दे रही है। उन्हें यह भरोसा चाहिए कि उनकी मेहनत किसी पेपर माफिया या गिरोह के हाथों बर्बाद नहीं होगी।

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पेपर लीक अकेला मुद्दा नहीं है। शिक्षा विभाग की कार्यशैली भी लंबे समय से चर्चा के केंद्र में रही है। ट्रांसफर, पोस्टिंग और अधिकारियों की पदोन्नति को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। शिक्षक आज भी पदोन्नति का इंतजार कर रहे हैं।

टेट जैसे ज्वलंत मुद्दे पर भी सरकार कोई ठोस फैसला नहीं ले सकी, जिससे शिक्षकों में निराशा बढ़ी है। शिक्षक और कर्मचारी संगठन अलग-अलग मांगों को लेकर आंदोलन कर चुके हैं। चपरासी और सफाई कर्मी तक अपनी मांगों के लिए सड़क पर उतर चुके हैं। दूसरी तरफ सरकार शिक्षा सुधार के दावे कर रही है। ऐसे में यह समझना मुश्किल हो जाता है कि विभाग पहले व्यवस्था संभालेगा या सुधार की नई कहानी लिखेगा।

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शिक्षा विभाग में ट्रांसफर, पोस्टिंग और पदोन्नति को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं लंबे समय से चल रही हैं। विभागीय गलियारों में एडवांस पेमेंट, लाइजनिंग और तबादलों में कथित अनियमितताओं की बातें भी सुनाई देती रही हैं। इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि करना आसान नहीं है और न ही यह लेख उनका प्रमाण देता है। लेकिन सुशासन का दावा करने वाली सरकार के लिए सबसे प्रभावी जवाब पारदर्शिता ही है। यदि इन चर्चाओं में कोई सच्चाई नहीं है तो पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक कर इनका खंडन किया जाना चाहिए।

और यदि कहीं भी अनियमितता हुई है तो निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
यहीं पूरी तस्वीर साफ दिखाई देती है। जब विभाग के भीतर ही असंतोष खत्म नहीं हो रहा, तब शिक्षा में बड़ा बदलाव कैसे आएगा..?

अगर सब कुछ नियमों से हो रहा है तो ट्रांसफर, पोस्टिंग, भर्ती और पदोन्नति की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती..? पारदर्शिता बढ़ेगी तो भरोसा भी बढ़ेगा।

लेकिन विभागीय फैसलों को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। गुपचुप आदेश, मनमाने प्रभार, बिना आवेदन तबादलों के आरोप, प्रशासनिक और आपसी तबादलों को लेकर विवाद तथा कई मामलों में आदेशों का न्यायालय में टिक नहीं पाना ये सब सरकार के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं..। यदि सरकार मानती है कि पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुसार चल रही है तो उसे पूरी व्यवस्था ऑनलाइन और पूरी तरह पारदर्शी बनाने में संकोच नहीं होना चाहिए।

जब शिक्षक और कर्मचारियों की ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज कराई जा सकती है, तब ट्रांसफर, पोस्टिंग, भर्ती और पदोन्नति की पूरी प्रक्रिया भी ऑनलाइन क्यों नहीं हो सकती? आवेदन से लेकर नोटशीट, पात्रता, रिक्त पद, अनुशंसा और अंतिम आदेश तक पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती? इससे ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों की साख भी मजबूत होगी और अनावश्यक चर्चाओं पर भी विराम लगेगा।

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राष्ट्रीय शिक्षा नीति बड़े लक्ष्य तय करती है, लेकिन जमीन पर खाली पद, पदोन्नति की फाइलें, तबादलों की खींचतान और पेपर लीक जैसे विवाद आज भी हकीकत हैं। शिक्षा सुधार भाषणों से नहीं, फैसलों से दिखाई देता है।

अब नजर फिर गजेंद्र यादव के बयान पर लौटती है। धर्मेद्र प्रधान के बचाव में उन्होंने जो तर्क दिया, अब उसी तर्क की परीक्षा उनके अपने विभाग में हो रही है। प्रदर्शन का समर्थन कर रहे छात्रों का कहना है कि यदि विभाग अच्छा काम करे तो उसका श्रेय मंत्री लेते हैं, फिर पेपर लीक जैसे विवाद सामने आने पर जवाबदेही से अलग कैसे खड़े हो सकते हैं? जवाबदेही का पैमाना दिल्ली और रायपुर के लिए अलग-अलग नहीं हो सकता।

अब निगाहें युवाओं पर हैं। वे भविष्य में क्या फैसला लेते हैं, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन इतना तय है कि गजेंद्र यादव ने धर्मेंद्र प्रधान का बचाव किया है, अब जनता उनके अपने विभाग का भी जवाब चाहती है। पेपर लीक रुके, भर्ती व्यवस्था पर भरोसा लौटे, ट्रांसफर और पदोन्नति पूरी तरह पारदर्शी हो और शिक्षा विभाग में उठते विवादों का हमेशा के लिए अंत हो। क्योंकि अब युवा शिक्षा में भाषण नहीं, सिस्टम बदलने की मांग कर रहा है।

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