( रुद्र अवस्थी )दिल भी एक जिद पर अड़ा है किसी बच्चे की तरह,

                 या तो सब कुछ इसे चाहिए या कुछ भी नहीं….

रचनाकार राजेश रेड्डी की इन लाइनों को जेन जी ने दिल्ली के जंतर मंतर पर उतार दिया और जिद पर ऐसे अड़े कि “सब कुछ” ले लिया जो उन्हें चाहिए था..। और जंतर मंतर…. में जुटी भीड़ ने “वह सब” छू मंतर…. कर दिया , जो पिछले कई बरसों से मजबूत खंबे की तरह अड़ा हुआ था।1724 में बना जंतर मंतर एक खगोलीय वेधशाला है।

जिसे सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की गति नापने के लिए बनाया गया था। इसी जंतर मंतर ने आज के समय की नाप – जोख दुनिया के सामने रख दी है। इस आंदोलन में छात्रों की जीत लोकतांत्रिक तरीके से लड़ी गई लड़ाई की जीत है। इस लड़ाई का जो नतीजा सामने आया है उसे सामने रखकर मौजूदा और आने वाले समय को पढ़ा जा सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि अंग्रेजी में इस्तेमाल होने वाला पेपर “लीक” शब्द इस मुहिम के केंद्र में रहा है। और हिंदुस्तानी जुबान के एक शब्द “लीक” के अनुरूप इस मुहिम ने “लीक से हटकर” बहुत कुछ कर दिखाया। लीक से हटकर सबसे पहली बात तो यह हुई की सोशल मीडिया में मजाक के तौर पर बनी एक पार्टी कॉकरोच जनता पार्टी जमीन पर उतर आई।

आज की पीढ़ी को रील वाली पीढ़ी कहा जाता है । लेकिन उसने रियल में जमीन पर उतरकर साबित किया कि वह लीक से हटकर भी चल सकती है। लीक से हटकर बिना किसी बड़े नेता की अगुवाई के यह आंदोलन देश भर में फैल गया। लीक से हटकर छात्रों और खासकर बच्चियों पर बर्बरता से लाठी चार्ज हुआ। आंदोलन को मजबूती देने के लिए लीक से हटकर देश के तमाम हिस्सों से लोगों ने जोमैटो और स्विग्गी के जरिए जंतर मंतर तक खाना पहुंचवाया।

लीक से हटकर इंस्टाग्राम पर रील साझा की गई। केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने कभी कहा था कि – “भैया इस सरकार में इस्तीफा नहीं होते….”। लेकिन लीक से हटकर आखिर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ। घर में मौजूद कॉकरोच अक्सर कुचल दिए जाते हैं।

लेकिन लीक से हटकर आंदोलन ने इस बार साबित कर दिया कि कॉकरोच भी चाहें तो व्यवस्था के जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों का गुरूर कुचल सकते हैं।
हाल के दिनों में जो लीक बनी है उससे हटकर भी बहुत सी चीजें हुईं। इस आंदोलन के दौरान सरकार कई जगह दुविधा में नजर आई। इस आंदोलन में हिंदू मुस्लिम से लेकर ईडी सीबीआई जैसे शब्दों का कोई असर दिखाई नहीं दिया।

अलबत्ता लोगों के अंदर जिस तरह से डर की बात की जाती थी वह डर खत्म होती नजर आई और आखिर में यह बात आंदोलन के मंच से कही गई कि- “झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए….” । लीक से हटकर यह बात भी नजर आई कि जहां आंदोलन के दौरान लाठी चार्ज या पानी की बौछार पर लोग डर कर तितर बितर होते हैं ।

लेकिन इस आंदोलन में जेन जी ने मीम और रील के जरिए यह दिखाया कि वह ऐसे दमन को भी एंजॉय कर सकती है। अगर पिछले 10-12 वर्षों की बात करें तो देश की राजधानी में किसान आंदोलन और पहलवानों के आंदोलन की चर्चा खूब रही। लेकिन उस दौरान सरकार का रुख ऐसा नहीं था जैसा छात्र आंदोलन के दौरान नजर आया।


यहां भी लीक से हटकर चलने की बड़ी वजह यही है कि शिक्षा और पेपर लीक से जुड़े मुद्दे का देश के सभी परिवारों से भी इसका सीधा रिश्ता है।
हालांकि जब यह आंदोलन शुरू हुआ तो पिछले कुछ आंदोलनों की तरह इसे भी पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और चीनी – विदेशी फंडिंग जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर बदनाम करने की कोशिश की गई। लेकिन इस मुहिम से जुड़े लोगों के साथ यह बात चिपक नहीं सकी। आंदोलन से जुड़े हुए ट्रिगर प्वाइंट कई जगह नजर आए । जब सबसे पहले नौजवानों को कॉकरोच कहा गया तब एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए कॉकरोच जनता पार्टी का नाम पहली बार सामने आया।

जिससे लाखों लोग जुड़ गए। इसके बाद सोनम वांगचुक जैसी हस्ती का जुड़ना भी एक ट्रिगर प्वाइंट था। फिर जिस तरह सोनम वांगचुक को सफेद चादर में लपेटकर आंदोलन स्थल से उठाया गया उसने भी ट्रिगर प्वाइंट का काम किया। फिर 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान बड़ी भीड़ इकट्ठा हुई और जब भीड़ पर बर्बरता से लाठी चली तो एक और ट्रिगर प्वाइंट बन गया।

इसके बाद तो पूरा आंदोलन परवान चढ़ता गया। इस आंदोलन के दौरान यह बात भी कही गई कि – “अतीत कभी भविष्य से नहीं लड़ सकता….”। देश के भविष्य के रूप में हम सबके बीच मौजूद छात्रों – नौजवानों की पीढ़ी अपनी मांग पर अड़ी रही और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ ही मुआवजा देने और प्रकरण वापसी की तीनों मांगे सरकार को माननी पड़ी। यह इस आंदोलन का सबसे बड़ा हासिल है।
आंदोलन को शुरू में अनदेखा किया गया ।

फिर इसे बदनाम करने की कोशिश हुई और आखिर में दबाव ऐसा बना की लीक से हटकर सरकार को वह सब करना पड़ा जो उसकी अब तक की पहचान में शामिल नहीं है। आंदोलन के दौरान सरकार की ओर से यह बात भी आई की फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए मामलों का निपटारा किया जाएगा।

सरकार की यह बात आने वाले समय में जमीन पर उतरेगी। लेकिन सोशल मीडिया के जरिए खड़े हुए एक संगठन ने महज 36 दिन के भीतर बड़ी जीत हासिल कर यह बता दिया कि आंदोलन भी फास्ट ट्रैक हो सकता है। इस आंदोलन ने देश भर में लोगों के बीच सोचने के लिए कई मुद्दे दिए हैं। हाल के वर्षों में जिस तरह लच्छेदार भाषण, नैरेटिव और लोगों के बीच खाई पैदा करने की रणनीति को पॉलिटिक्स का अहम हिस्सा माना जाता रहा है।

वहां एक बड़े आंदोलन ने इन तमाम ट्रिक को बेअसर साबित किया। खास बात यह भी रही कि सीजेपी के अभिजीत दीपके सहित उनकी टीम के अहम हिस्सा रहे सौरव दास और– आशुतोष रांका ने पूरी परिपक्वता के साथ आंदोलन की डोर को एक सिरे से संभाल रखा था । आखिर में अभिजीत दीपके की यह बात भी गौर करने लायक है कि- “ इस जीत के लिए मुझे हीरो मत बनाना। एक इंसान को तो हीरो बनाने के कारण देश का कबाड़ा हुआ है……”।

इस तरह की खूबियों के साथ पेपर लीक से शुरू हुआ या आंदोलन लीक से हटकर कई नतीजों और कई संदेशों के साथ खत्म हो गया। क्या देश में आने वाले समय में भी इसका असर होगा….. जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को जवाबदेह बनाने के लिए सवाल इसी तरह से उठाए जाएंगे, सिस्टम के खिलाफ लड़ाई में लोग निडर होकर सामने आएंगे ….। इसे जानने के लिए आने वाले वक्त का इंतजार करना ही बेहतर होगा।।