बिलासपुर… न्यायालय ने फैसला सुना दिया, होटल खाली करने की समयसीमा भी तय कर दी और बकाया किराया चुकाने का आदेश भी दे दिया। इसके बावजूद होटल मालिक को अपने ही प्रतिष्ठान का कब्जा नहीं मिल पाया है। मंगला स्थित होटल ‘हरी चटनी’ का यह मामला अब जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। सवाल यह है कि जब न्यायालय का आदेश स्पष्ट है तो उसका पालन कराने में आखिर देरी क्यों हो रही है?

मामला मंगला चौक स्थित कुशलापुर ओवरब्रिज के पास। खसरा नंबर 4592/8, 4592/9 और 4592/10 की कुल 2554.5 वर्गफुट जमीन पर बने जी प्लस तीन व्यावसायिक होटल परिसर हरी चटनी का है। होटल मालिक मोतीलाल दयालानी ने होटल खाली कराने और बकाया किराया वसूलने के लिए भाड़ा नियंत्रण प्राधिकारी न्यायालय में मामला दायर किया था। दोनों पक्षों के दस्तावेजों और साक्ष्यों की जांच के बाद न्यायालय ने 24 सितंबर 2026 को होटल मालिक के पक्ष में आदेश पारित किया।

एक महीने में होटल खाली करने का आदेश

न्यायालय ने अपने आदेश में होटल परिसर का विधिक स्वामित्व मोतीलाल दयालानी का माना। साथ ही परिसर पर काबिज किरायेदार को आदेश की तारीख से एक महीने के भीतर होटल का रिक्त कब्जा मालिक को सौंपने का निर्देश दिया। इतना ही नहीं, अगस्त 2025 से वास्तविक कब्जा सौंपने तक तीन लाख रुपये प्रतिमाह की दर से जीएसटी सहित बकाया किराया चुकाने और बिजली के बकाया बिलों का भुगतान करने की जिम्मेदारी भी अनावेदक पर तय की गई। वाद व्यय का भुगतान भी उसी को करना है।

यानी न्यायालय ने होटल खाली करने से लेकर बकाया किराया और बिजली बिल तक की जिम्मेदारी स्पष्ट कर दी। इसके बावजूद होटल मालिक को अपने प्रतिष्ठान का कब्जा नहीं मिल पाने की स्थिति कई सवाल खड़े कर रही है।

आदेश के बाद भी कब्जा नहीं, इंतजार कर रहा है?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल जिला प्रशासन की भूमिका को लेकर है। न्यायालय ने जब होटल खाली करने की समयसीमा तय कर दी तो उसके बाद आदेश के पालन की स्थिति क्या है? यदि आदेश का पालन नहीं हुआ है तो संबंधित पक्ष के खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई हुई? होटल मालिक को राहत दिलाने के लिए प्रशासन ने क्या कदम उठाए हैं?

आखिर एक व्यक्ति को न्यायालय का आदेश हाथ में लेकर अपने ही होटल के कब्जे के लिए भटकना क्यों पड़ रहा है? क्या प्रशासन को इस मामले की जानकारी नहीं है या फिर जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है? पीड़ित की परेशानी और न्यायालय के आदेश के बीच बनी यह दूरी प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है।

रसूख के आगे न्यायालय का आदेश बेअसर?

होटल ‘हरी चटनी’ का मामला अब केवल मालिक और किरायेदार के बीच का विवाद नहीं रह गया है। न्यायालय के आदेश के बावजूद कब्जा नहीं मिलने की स्थिति ने प्रशासन की भूमिका को सवालों के घेरे में ला दिया है। यदि आदेश के पालन के लिए अलग कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी है तो उसकी स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए। लेकिन जिला प्रशासन की ओर से अब तक क्या कार्रवाई हुई, यह बताना जरूरी है।

अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं। क्या होटल मालिक को न्यायालय के आदेश के अनुरूप उसका प्रतिष्ठान मिल पाएगा या फिर ‘हरी चटनी’ का यह मामला भी उन मामलों में शामिल हो जाएगा, जहां फैसला अदालत में होता है, लेकिन राहत पाने के लिए पीड़ित को दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं?